कोलकाता: पश्चिम बंगाल देश के उन गिने-चुने बड़े राज्यों में जाना जाता रहा है जहां की राजनीति में वंशवाद के कम ही उदाहरण मिलते हैं. 2026 के बंगाल चुनाव में यह धारणा बदलती दिख रही है. बंगाल के नेता दशकों तक उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की वंशवाद की राजनीति का मजाक उड़ाते रहे. इस राज्य में ज्यादातर युवा कॉलेज, यूनिवर्सिटी या गली-मोहल्लों में सामाजिक कार्यों या अलग-अलग यूनियनों से जुड़कर राजनीति में आते रहे हैं. इस बार के चुनाव में पश्चिम बंगाल में सक्रिय लगभग सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने वंशवाद की साफ झलक दिखती है.
इस बार पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस से लेकर कांग्रेस और वामदलों के प्रत्याशी पुराने राजनीतिक परिवारों से सीधे लॉन्च हुए हैं. राजनीति के जानकार मानते हैं 2026 का चुनाव एक ऐसा पल है जब पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा वंशवाद के उदाहरण दिख रहे हैं.
राजनीति में वंशवाद के रूप में बदलाव बंगाल के अतीत के बिल्कुल उलट है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्जी तक और कांग्रेस के नेताओं सोमेन मित्रा और प्रिया रंजन दासमुंशी से लेकर वामपंथी दिग्गज बिमान बोस तक बंगाल के ये प्रतिष्ठित नेता पारिवारिक विरासत के बल पर नहीं, बल्कि ज़मीनी राजनीति के ज़रिए आगे बढ़े थे. हालांकि वह संस्कृति अब साफ तौर पर बदल रही है.
तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले सबसे ज़्यादा उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन यह रुझान सभी विचारधाराओं में देखने को मिल रहा है. यहां तक कि वे पार्टियां भी, जिन्होंने कभी वंशवाद की राजनीति की आलोचना की थी, अब जाने-पहचाने उपनामों का सहारा ले रही हैं.
कोलकाता के एक राजनीतिक विश्लेषक ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा- यह चुनाव दिखाता है कि बंगाल धीरे-धीरे अपनी खासियत खो रहा है. वंशवादी राजनीति को कभी ऐसी चीज़ माना जाता था जो कहीं और होती थी. अब बंगाल की हर बड़ी पार्टी इसे अपना रही है. हालांकि कोई भी इसे खुलकर स्वीकार नहीं करना चाहता.
उन्होंने आगे कहा कि बंगाल की राजनीतिक नर्सरी कैंपस, यूनियन और सड़क पर होने वाले आंदोलन अब पहले की तरह बड़े पैमाने पर नेता पैदा नहीं कर रहे हैं. इसके बजाय, पार्टियां अब ऐसे उम्मीदवारों की ओर ज़्यादा झुक रही हैं जिनके परिवार का नाम मतदाताओं के बीच पहले से ही जाना-माना है. यह बदलाव ज़मीनी स्तर पर साफ़ दिखाई दे रहा है.
ममता बनर्जी की पार्टी में परिवारवाद के कुछ उदाहरण
- पश्चिम बर्दवान में, तृणमूल कांग्रेस ने आसनसोल उत्तर से पूर्व मंत्री मलय घटक को मैदान में उतारा है, जबकि उनके भाई अभिजीत घटक पड़ोसी कुल्टी से चुनाव लड़ रहे हैं.
- दक्षिण में, मौजूदा बेहला पूर्व विधायक रत्ना चट्टोपाध्याय को बेहला पश्चिम भेज दिया गया है, जबकि उनके भाई सुभाशीष दास को महेशतला से उम्मीदवार बनाया गया है. यह वह सीट है जिस पर कभी उनके पिता दुलाल दास का कब्ज़ा था.
- सिंगूर से बेचाराम मन्ना और उनकी पत्नी कराबी हरिपाल से. बेचाराम ने अपनी उम्मीदवारी पर दावा किया- ‘मुख्यमंत्री के आशीर्वाद और लोगों के समर्थन से, हम फिर से जीतेंगे.’
- चार बार के सांसद कल्याण बनर्जी के बेटे सिरसन्या बंद्योपाध्याय उत्तरपारा से चुनाव लड़ रहे हैं.
- एंटाली में, अनुभवी विधायक स्वर्ण कमल साहा ने अपने बेटे संदीपान के लिए जगह बनाई है, जबकि पानीहाटी में मौजूदा विधायक निर्मल घोष के बेटे तीर्थंकर घोष चुनाव लड़ेंगे.
- मानिकतला में पार्टी ने दिवंगत मंत्री साधन पांडे और मौजूदा विधायक सुप्ति पांडे की बेटी श्रेया पांडे को मैदान में उतारा है.
- बागदा से मधुपरना ठाकुर
- पूर्वस्थली उत्तर से वसुंधरा गोस्वामी
- बनगांव दक्षिण से रितुपर्ना आध्या
ये सभी अपने परिवारों की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
राजनीति में परिवारवाद पर क्या सोचती है टीएमसी
पार्टी के भीतर के वरिष्ठ नेता इस बदलाव को स्वीकार करते हैं. तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने पीटीआई से बातचीत में कहा-‘लोग वंशवादी राजनीति की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन चुनाव आखिरकार जीतने की क्षमता के बारे में ही होते हैं. अगर किसी उम्मीदवार की जड़ें अपने परिवार के ज़रिए पहले से ही उस निर्वाचन क्षेत्र में गहरी जमी हुई हैं, तो पार्टी इसे एक फ़ायदे के तौर पर देखती है. एक और नेता ने इसे और भी साफ़ शब्दों में कहा- ‘अब उम्मीदवार अपने साथ एक बनी-बनाई संस्था, कार्यकर्ता और पहचान लेकर आते हैं.’
बीजेपी भी परिवारवाद से अछूती नहीं
परिवारवाद पर हमले करने के बावजूद, BJP भी इस मामले में पीछे नहीं है.
- पूर्वी मेदिनीपुर में, एगरा से दिब्येंदु अधिकारी की उम्मीदवारी उनके परिवार के बढ़ते प्रभाव में एक और अध्याय जोड़ती है.
- भाटपारा में, पूर्व सांसद अर्जुन सिंह के बेटे पवन सिंह चुनावी मैदान में हैं, जबकि अर्जुन खुद नोआपारा से चुनाव लड़ रहे हैं.
- पार्टी का मतुआ चेहरा, सुब्रत ठाकुर भी एक जाने-माने राजनीतिक परिवार से आते हैं. वहीं उनकी रिश्तेदार सोमा, जो बागदा से चुनाव लड़ रही हैं, का सीधा मुकाबला तृणमूल कांग्रेस की अपनी भाभी मधुपरना ठाकुर से है.
- बारानगर में, BJP उम्मीदवार सजल घोष पूर्व कांग्रेस नेता प्रदीप घोष की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
बंगाल में परिवारवाद पर क्या है बीजेपी की सोच?
एक वरिष्ठ BJP नेता ने कहा- ‘बंगाल की राजनीति अब पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा व्यक्ति-केंद्रित हो गई है. ऐसी स्थिति में, जिन परिवारों का पहले से ही कोई राजनीतिक आधार होता है, उन्हें ज़्यादा अहमियत मिलती है.’
कांग्रेस भी परिवारवाद से खुद को रोक नहीं पाई
इस बार के बंगाल चुनाव में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस संघर्ष कर रही है. वह भी जानी-मानी राजनीतिक विरासत वाले नामों पर ही भरोसा कर रही है.
- पूर्व सांसद मौसम नूर, जो कांग्रेस के दिग्गज नेता ABA ग़नी ख़ान चौधरी की भतीजी हैं, तृणमूल कांग्रेस से लौटने के बाद मालतीपुर से चुनाव लड़ रही हैं. अपनी वापसी को भावुक घर वापसी बताते हुए, मौसम ने कहा कि वह परिवार को एकजुट करना और ग़नी ख़ान चौधरी की विरासत को मज़बूत करना चाहती हैं.
- बागमुंडी में, पार्टी ने पूर्व सांसद देवेंद्र महतो के बेटे नेपाल महतो को मैदान में उतारा है.
- सोमेन मित्रा के बेटे रोहन मित्रा बालीगंज से चुनाव लड़ रहे हैं. उत्तरी बंगाल में, अली इमरान रमज़, जिन्हें ‘विक्टर’ भी कहा जाता है, गोलपोखर से एक और राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
- कुछ दिन पहले ही कांग्रेस में आए काजी अब्दुल रहीम 24 परगना जिले की बदुरिया सीट से उम्मीदवार हैं. उनके पिता अब्दुल गफ्फार काजी 1967 से 2011 तक इसी सीट से चुनाव जीतते रहे.
वामदल भी परिवारवाद से खुद को बचा नहीं पाई
- पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल भी राजनीतिक परिवारवाद से खुद को अछूते नहीं रख पाए.
- सीपीएम ने पूर्व मंत्री गौतम देब के बेटे सप्तर्षि देब को राजारहाट-न्यू टाउन से मैदान में उतारा है.
- युवा नेता दीप्शिता धर, जो पूर्व विधायक पद्म निधि धर की पोती हैं, दम दम उत्तर से चुनाव लड़ रही हैं.
बंगाल की राजनीति में परिवारवाद पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य इस बदलाव को एक गहरे संरचनात्मक परिवर्तन से जोड़ते हैं. वह कहते हैं- ‘एक समय था जब कोई ज़िला स्तरीय नेता या छात्र कार्यकर्ता भी MLA बनने का सपना देख सकता था. अब वह सीढ़ी कमज़ोर पड़ गई है. उसकी जगह, राजनीतिक दल अब ज़्यादा से ज़्यादा वंशवादी नेताओं को चुन रहे हैं.’
उन्होंने आगे कहा कि जब कैंपस की राजनीति कमज़ोर पड़ती है, तो वंशवादी राजनीति का उदय होता है. बंगाल के विश्वविद्यालय अब राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी तैयार नहीं कर पा रहे हैं, जिससे एक ऐसा खालीपन पैदा हो गया है जिसे अब प्रभावशाली परिवार भर रहे हैं.







