असम में विधानसभा का चुनावी बिगुल बज चुका है. सभी पार्टियों अब मैदान में हैं और अपनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को इस युद्ध के मैदान में उतार दिया है. 9 अप्रैल को असम में वोटिंग होना है. लेकिन कांग्रेस अपनी तैयारी शुरू करने से पहले ही अपने दो ‘सेनापति’ को खो चुकी है. चुनाव से ठीक पहले पार्टी के भीतर भगदड़ जैसे हालात हैं. एक के बाद एक बड़े चेहरे साथ छोड़ रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिना मजबूत नेतृत्व के कांग्रेस यह लड़ाई जीत पाएगी? प्रियंका गांधी जिन्हें इस बार असम में रणनीतिक कमान सौंपी गई थी, अब सबसे कठिन परीक्षा का सामना कर रही हैं. यह सिर्फ नेताओं के जाने की कहानी नहीं है. यह संगठन की कमजोरी और नेतृत्व की चुनौती की कहानी है. लोकसभा सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा का बीजेपी में जाना पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार प्रियंका गांधी के लिए यह मुकाबला सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं था. यह उनकी राजनीतिक क्षमता की अग्निपरीक्षा माना जा रहा था. लेकिन चुनाव से पहले ही जो हालात बने हैं, उन्होंने पूरे प्लान को झटका दे दिया है. वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना, अंदरूनी असंतोष और नेतृत्व पर सवाल ये सब मिलकर कांग्रेस के अभियान को कमजोर कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि क्या प्रियंका इस संकट को संभाल पाएंगी या असम भी उनके लिए एक और असफल प्रयोग बन जाएगा.
अंदरूनी कलह और चुनावी असर
- असम में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका दो वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने से लगा है. लोकसभा सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा का बीजेपी में जाना पार्टी के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है. ये दोनों नेता चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभा रहे थे. ऐसे में उनके जाने से न सिर्फ संगठन कमजोर हुआ है, बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिरा है.
- पार्टी के अंदर भी असंतोष गहराता जा रहा है. कई नेता मानते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई की कार्यशैली से नाराजगी बढ़ी है. उन पर एकतरफा फैसले लेने और भरोसे की कमी के आरोप लग रहे हैं. उम्मीदवार चयन से लेकर कैंपेन मैनेजमेंट तक, कई फैसलों को लेकर सवाल उठ रहे हैं. इससे साफ है कि कांग्रेस की समस्या सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी है.
कांग्रेस में नेताओं के पलायन की सबसे बड़ी वजह क्या है?
सबसे बड़ी वजह संगठन के भीतर असंतोष और नेतृत्व को लेकर भरोसे की कमी मानी जा रही है. कई नेताओं को लगता है कि फैसले पारदर्शी नहीं हैं और उनकी राय को महत्व नहीं दिया जा रहा. इसके अलावा मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर असमंजस और गुटबाजी ने भी स्थिति को बिगाड़ा है.
प्रियंका गांधी की भूमिका इस पूरे संकट में कितनी अहम है?
प्रियंका गांधी इस बार असम चुनाव में केंद्रीय भूमिका निभा रही हैं. उम्मीदवार चयन से लेकर रणनीति तक, कई अहम फैसले उनके नेतृत्व में लिए जा रहे हैं. ऐसे में मौजूदा संकट उनकी राजनीतिक क्षमता की परीक्षा बन गया है. अगर पार्टी प्रदर्शन खराब करती है, तो इसका सीधा असर उनकी छवि पर पड़ेगा.
क्या बीजेपी को इस स्थिति का फायदा मिलेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरी का सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है. मजबूत संगठन और स्पष्ट नेतृत्व के मुकाबले कांग्रेस बिखरी हुई नजर आ रही है. ऐसे में चुनावी मुकाबला असंतुलित हो सकता है.
क्या संभल पाएगी कांग्रेस की रणनीति?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस इस संकट से उबर पाएगी. पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि संगठन को एकजुट रखने की भी है. अगर समय रहते नेतृत्व ने हालात नहीं संभाले, तो असम चुनाव कांग्रेस के लिए एक और बड़ा झटका साबित हो सकता है.







