अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों ने ईरान के रणनीतिक ठिकानों को झकझोर दिया है. दक्षिण-पूर्वी ईरान में स्थित चाबहार पोर्ट सिटी (जहां भारत एक अहम टर्मिनल का ऑपरेट कर रहा है) भी इस हमले की चपेट में आया. रिपोर्टों के मुताबिक, बंदरगाह शहर में कुछ घंटों के भीतर दो जोरदार विस्फोट हुए, जिससे पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई. चाबहार पोर्ट ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित है और यहां ईरानी नौसेना के अड्डे के साथ हवाई ठिकाने भी मौजूद हैं. हमलों के समय ईरान की नौसेना का 103वां बटालियन 100 दिन की समुद्री तैनाती पूरी कर यहीं लौटा था. चाबहार में अटैक से पूरी शहर में अफरा-तफरी का आलम है. आमलोग दहशत में हैं. साथ ही कमर्शियल सिटी में व्यापार संबंधी गतिविधियां ठप पड़ गई हैं. यह शहर रणनीतिक और व्यापारिक तौर पर महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित है. अटैक के बाद ईरान ने इस जलडमरूमध्य को व्यापारिक पोतों (Commercial Ships) के लिए बंद कर दिया है.
भारत के लिए चाबहार पोर्ट का सबसे अहम हिस्सा शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल है, जिसे 2024 में हुए 10 साल के समझौते के तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ऑपरेट कर रही है. यह टर्मिनल अंतरराष्ट्रीय नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर (INSTC) का महत्वपूर्ण हिस्सा है और भारत के लिए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंच का वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है. बताया जाता है कि चाबहार में दो धमाके की आवाजें सुनाई पड़ी हैं. हमलों के तुरंत बाद ईरान ने बहरीन, कुवैत, यूएई और कतर में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी एयरस्ट्राइक की. यूएई में एक व्यक्ति की मौत मिसाइल के छर्रे लगने से होने की खबर है. इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में सैन्य अलर्ट बढ़ा दिया गया है.
चाबहार पर अटैक के साइड इफेक्ट
इस बीच, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) पर आरोप है कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को रेडियो संदेश भेजकर चेतावनी दी है कि कोई जहाज आगे नहीं बढ़े. इस कदम ने वैश्विक शिपिंग और तेल बाजार में चिंता बढ़ा दी है. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्ग माना जाता है. सऊदी अरब, ईरान, इराक और यूएई जैसे प्रमुख तेल निर्यातक देशों का कच्चा तेल इसी रास्ते से वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है. यदि यहां आवाजाही बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों और शिपिंग लागत पर सीधा असर पड़ सकता है. अटैक के बाद ईरान की ओर से उठाए गए कदम से इस मैरीटाइम कॉरिडोर से व्यापार का काम फिलहाल ठप है.
होर्मुज स्ट्रेट इसलिए है अहम
- होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक रणनीतिक समुद्री मार्ग है. इसके बंद होने की खबरें उस समय सामने आईं जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के शहरों पर हवाई हमले किए हैं. इसके जवाब में ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी और दुबई, कतर की राजधानी दोहा और सऊदी अरब की राजधानी रियाद पर कई मिसाइलें दागीं. मध्य पूर्व के इन देशों में अमेरिकी सेना के सैन्य ठिकाने मौजूद हैं.
- ईरान ने पिछले महीने चेतावनी दी थी कि यदि अमेरिका या कोई अन्य देश उस पर हमला करता है, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर देगा. हालांकि, नाकेबंदी की बार-बार चेतावनी देने के बावजूद तेहरान ने कभी वास्तव में ऐसा कदम नहीं उठाया. हाल ही में सैन्य अभ्यास के दौरान उसने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए जलडमरूमध्य के एक हिस्से को थोड़े समय के लिए बंद किया था.
- हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) फारस की खाड़ी को हिंद महासागर से जोड़ता है और यह ईरान तथा ओमान के मुसंदम एक्सक्लेव के बीच स्थित है, जो एक प्रायद्वीप के सिरे पर स्थित है. इसकी चौड़ाई लगभग 50 किलोमीटर है और इसकी गहराई अधिकतम 60 मीटर तक है. अपनी संकीर्णता और उथले जल के कारण यह सैन्य रूप से बंद किए जाने के लिए संवेदनशील माना जाता है.
- यह जलडमरूमध्य तेल संपन्न खाड़ी क्षेत्र को एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अन्य बाज़ारों से जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों (चोकपॉइंट्स) में से एक है.
- ईआईए (Energy Information Administration) के अनुसार, वर्ष 2024 में वैश्विक तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कुल खपत का लगभग 5वां हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरा, जो औसतन प्रतिदिन 2 करोड़ बैरल के बराबर था. इसके अलावा 2024 में वैश्विक एलएनजी व्यापार का भी लगभग 5वां हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरा, जो मुख्य रूप से क़तर से आपूर्ति किया गया था.
भारत की रणनीतिक चिंता
चाबहार परियोजना को कभी भारत ने गोल्डन गेट बताया था. अमेरिका ने अक्टूबर में इस पोर्ट को छह महीने की प्रतिबंध छूट दी थी, जो अप्रैल में समाप्त होनी है. मौजूदा सैन्य टकराव से वॉशिंगटन का तेहरान पर प्रतिबंध दबाव और बढ़ सकता है, जिससे भारत की निवेश योजनाएं जटिल हो सकती हैं. दिलचस्प बात यह है कि इसी साल के बजट में भारत ने चाबहार परियोजना के लिए आवंटित 100 करोड़ रुपये की वार्षिक राशि में कटौती की है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या नई दिल्ली इस प्रोजेक्ट को लेकर सतर्क रुख अपना रही है. फिलहाल चाबहार में वास्तविक नुकसान का आकलन जारी है. लेकिन इतना तय है कि यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक रणनीति के लिए भी बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती तनातनी का असर अब सीधे नई दिल्ली की रणनीतिक गणनाओं पर पड़ता दिख रहा है.







