बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक वीडियो सामने आया है जो कि काफी वायरल हो रहा है. सीएम नीतीश ने विधान परिषद में बिहार सरकार के पूर्व मंत्री, राजद नेता और वर्तमान एमएलसी अब्दुल बारी सिद्दीकी को टोपी उतारने के लिए कह दिया. इस पूरे वाकये का वीडियो सामने आया तो यह अब राजनीति का मुद्दा भी बन गया है. कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार अब एनडीए के साथ हैं और उनपर बीजेपी की राजनीति का प्रभाव है. यही कारण है कि नीतीश कुमार टोपी पहनने, टोपी ट्रांसफर करने से लेकर उतरवाने तक पर उतर आए हैं. लेकिन क्या यही सच है? पहले पूरा प्रकरण समझते हैं कि बिहार विधान मंडल में आखिर हुआ क्या जो इतना विवाद हो रहा है?
विधान परिषद में आखिर हुआ क्या?
दरअसल, बजट सत्र में चर्चा के दौरान बीते 5 फरवरी को बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और राजद के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी अपना वक्तव्य विधान परिषद में दे रहे थे. इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी वहां उपस्थित थे. विधान परिषद में टोपी पहनकर आए राजद एमएलसी अब्दुल बारी सिद्दीकी से सीएम नीतीश ने कहा कि “यह टोपी क्यों पहने हैं? हटाइये न.” इस पर अब्दुल बारी सिद्दीकी ने अपनी टोपी उतार दी और कहा- “लीजिए आपका हुकुम सर आंखों पर, मैं अपनी टोपी उतार देता हूं. वैसे टोपी उतरवाना एक मुहावरा है.” बस यहीं से यह छोटा सा वाकया बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया और बिहार की सियासत गर्म हो उठी है.
वीडियो वायरल और सियासत गर्म
एक बार फिर से टोपी उतरवाने की चर्चा करते हुए सीएम नीतीश कुमार को विपक्षी दल अपने निशाने पर ले रहे हैं. उनकी राजनीति में बदलाव से जोड़कर इसे देखा जा रहा है और भाजपा की संगत का असर कहा जा रहा है. लेकिन, क्या यह बात पूरी तरह सत्य है? अब जब बात खुली है और टोपी की सियासत को हवा दे दी गई है तो टीका लगाने से नीतीश कुमार के इनकार करने का वाकया भी जान लीजिए. ऐसा बीते वर्ष हुआ था और वह भी सीतामढ़ी में माता जानकी से जुड़े एक कार्यक्रम में.
टीका लगाने से इनकार की पुरानी घटना
नीतीश कुमार ने सीतामढ़ी में 8 अगस्त 2025 को मंदिर में पूजा के दौरान ‘टीका’ (तिलक) लगाने से इनकार किया था. अवसर था सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में मां जानकी मंदिर की पुनर्विकास परियोजना के शिलान्यास और भूमि पूजन का कार्यक्रम. वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जब पुजारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को तिलक लगाने आए तो उन्होंने अपना सिर पीछे कर लिया और तिलक लगवाने से मना कर दिया. खास बात यह कि इस कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद थे.इससे आगे बढ़िये तो एक और वाकया है टोपी पहनने से इनकार करने का.
मदरसा कार्यक्रम और टोपी पहनने से इनकार
दरअसल, सीतमढ़ी में टीका लगाने से इनकार करने की घटना के कुछ ही दिनों बाद, 21 अगस्त 2025 को पटना के एक मदरसा कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने मुस्लिम टोपी पहनने से भी इनकार कर दिया था. पहले सलीम परवेज और फिर मंत्री जमा खान ने टोपी पहनाने की कोशिश की, लेकिन नीतीश ने टोपी लेकर जमा खान को ही पहना दी. इस पर तो विरोधी दलों ने बखेड़ा ही खड़ा कर दिया था. चर्चा उनके उस बयान की होने लगी जो उन्होंने 2013 में दिया था. विपक्षी दलों और सोशल मीडिया पर इन दोनों घटनाओं को नीतीश कुमार के पुराने स्टैंड (2013) से जोड़कर देखा गया.
नीतीश कुमार का 2013 का बयान फिर चर्चा में
यह मामला कुछ यूं है…20 सितंबर 2013 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा आयोजित एक व्याख्यान था. इसी कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि “देश चलाने के लिए कभी टोपी भी पहननी पड़ेगी और कभी तिलक भी लगाना पड़ेगा”. उनके इस बयान को तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के संदर्भ में जोड़कर देखा गया था. इसकी पृष्ठभूमि साल 2011 में गुजरात के एक वाकये से जुड़ती है जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम टोपी पहनने से मना कर दिया था और इस वाकये को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था.







