एक लोककथा है, जिसमें एक राजा या राक्षस की जान उसके तोते में बसती थी। तोते के जीवित रहते राजा या राक्षस की जान लेना संभव नहीं था। बंगाल में एसआईआर पर कोलकाता से लेकर दिल्ली तक मचे कोहराम के बीच यह लोककथा याद आई। मृत, फर्जी और घुसपैठियों से ‘समृद्ध’ बंगाल की मतदाता सूची ही वह तोता है, जिसके बूते ममता बनर्जी तीन बार चुनावी वैतरणी पार कर चुकी हैं व चौथी बार बंगाल जीतना चाहती हैं। एसएआई के कारण इस तोते पर जब खतरा आया है, तो वह दहाड़ती फिर रही हैं।
दरअसल दीदी की परेशानी तब बढ़ी थी, जब बांग्लादेश वापस जाने के लिए हजारों घुसपैठिये सीमा पर जमा हुए और चैनलों ने उनका साक्षात्कार दिखाना शुरू किया। जाते-जाते ये घुसपैठिये बता गए कि कैसे उन्हें बंगाल में घुसाया व बसाया गया, सारी सरकारी सुविधाएं दी गईं, ताकि वे वोट बैंक बने रहें। इस महापलायन को रोकने के लिए हर स्तर पर कोशिश हुई। धड़ाधड़ आवास व जन्म प्रमाणपत्र जारी किए गए, कई लोग असंख्य संतानों के पिता बना दिए गए। पर चुनाव आयोग ने इस घपले को पकड़ लिया। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर चुनाव आयोग ने सूचित किया कि बंगाल में छह से अधिक संतानों वाले दो लाख छह हजार से अधिक मामले मिले, वहीं 8,682 मामलों में 10 से अधिक संतानों का पता चला। 100 से अधिक संतानों के सात व 200 से अधिक संतानों के सात मामले सामने आए हैं।
इस मामले पर ममता बनर्जी के दिल्ली अभियान में कथित रूप से ‘एसआईआर के कारण मरे’ लोगों की विधवाएं व परिजन भी साथ थे। वह सीईओ ज्ञानेश कुमार मिलने गईं और बाहर आकर ज्ञानेश कुमार को घोर अशोभनीय संज्ञाओं से नवाजा। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू करने के लिए उन्होंने विपक्षी दलों से संपर्क करना भी शुरू कर दिया। सवाल है कि अब तक हुई 110 मौतें एसआईआर के कारण हुईं या किसी अन्य वजहों से, यह कैसे साबित होगा?
प. बंगाल में एसआईआर के पहले चरण में कुल 58.2 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जिनमें 24.16 लाख मृत, 19.88 लाख स्थानांतरित, 1.38 लाख डुप्लीकेट व 1,238 वोटर लापता श्रेणी के थे। यह आंकड़ा ममता के लिए जैसे ‘सहनीय’ था, पर जैसे ही चुनाव आयोग ने जमा प्रपत्रों में तार्किक विसंगति पाई और करीब एक करोड़ 30 लाख लोगों को सुनवाई के लिए नोटिस जारी करना शुरू किया, तो बवाल शुरू हो गया। इसके बाद फरक्का, चाकुलिया, बरासात सहित कई जगहों पर बीडीओ कार्यालय जलाए व तोड़े गए। एसआईआर में लगे कर्मचारियों को पीटा गया।
जमा किए गए दस्तावेजों की मिसालों पर गौर करें। उत्तर 24 परगना जिले के 10 साल पहले आया बांग्लादेशी करीम गाजी ने हिंगलगंज में सिद्दीकी गाजी को पिता बनाकर सारे भारतीय दस्तावेज बनवा लिए। सिद्दीकी गाजी पिछले छह साल से बार-बार इस फर्जीवाड़े को रोकने की गुहार लगा रहा था, पर उसका नाम नहीं काटा गया। गायघाटा के रामनगर पंचायत इलाके में तो मियां-बीवी, दोनों के अब्बा एक ही व्यक्ति हैं। हावड़ा की उलुबेड़िया निवासी संचिता प्रमाणिक का नाम 44 अलग-अलग बूथों/प्रविष्टियों) में पाए गए।
उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट, हिंगलगंज, नदिया के कालीगंज, नक्काशीपाड़ा और पलासीपाड़ा विधानसभा क्षेत्रों, मालदा व मुर्शिदाबाद जिले ‘तार्किक विसंगति’ के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। यहां सर्वाधिक संख्या ऐसे वोटरों की है, जिनके पूर्वज/पिता/माता एक ही व्यक्ति है। हालांकि ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी ने वास्तव में जीवित, मगर ड्राफ्ट सूची में मृत बताए गए कुछ लोगों से रैंप वॉक कराया। इस भूल के दोषी वहां के बीएलओ थे।
इस तरह की भूलों को सुधारने का अभी समय है। वैसे, विपक्ष का आरोप है कि कुछ गलतियां जान-बूझकर की गई हैं, ताकि हंगामा करके एसआईआर की प्रक्रिया को बाधित किया जा सके। उल्लेखनीय है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल को कुल 2,47,57,345 वोट और भाजपा को 2,30,28,517 वोट मिले थे। मतलब भाजपा को उससे केवल 17 लाख 28 हजार 828 वोट कम मिले। इस चुनाव में भाजपा की सीटें 18 से घटकर 12 पर आ गई, मगर 90 विधानसभा सीटों पर उसकी बढ़त दिखी।
एसआईआर के चलते अब तक करीब 58 लाख नाम कट चुके हैं। अगर वर्तमान में चल रही सुनवाई पूरी होने के बाद 20- 30 लाख वोटर और घट जाएं, तो यह आंकड़ा एक करोड़ के पास पहुंचता दिखता है। जिनके नाम कटे हैं, उनमें ज्यादातर तृणमूल के ही समर्पित वोटर माने जाते हैं। ममता के मौजूदा आंदोलन की मुख्य वजह यही है।
बिहार में छठ पर एक गीत गाया जाता है-सुगवा के मरबो धनुख से, सुगा गिरिहें मुरछाय। लोकतंत्र और सांविधानिक संस्थाओं की गरिमा को ‘जूठा’ कर रहे तोते पर चुनाव आयोग अगर एसआईआर का धनुष चला रहा है, तो वह अपने सांविधानिक दायित्व का पालन कर रहा है। चौथी बार की सत्ता के लोभ में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खतरनाक स्टंट कर रही हैं।







