पाकिस्तान के हाथ से बलूचिस्तान फिसल रहा है. अब बलूचिस्तान पर पाकिस्तान का कंट्रोल खत्म होता जा रहा है. आसिम मुनीर की सेना से भी अधिक हाईटेक हो गई है बलूच आर्मी. खुद पाकिस्तानी रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने यह कबूल किया है. जी हां, पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में स्वीकार किया है कि बलूच विद्रोही पाकिस्तानी सेना से ज्यादा एडवांस और महंगे हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि हर एक बलूच विद्रोही लगभग 20,000 डॉलर के पूरे कॉम्बैट गियर पैकेज से लैस है. डर के मारे उन्होंने बलूचिस्तान में और ज्यादा पाकिस्तानी सेना की तैनाती की मांग की है. पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के कबूलनामे से पीएम मोदी और अजित डोभाल की बलूचिस्तान पर वो भविष्यवाणी याद आ रही है. जब साल 2016 में पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बलूचिस्तान का जिक्र किया था और कहा था कि भारत बलूचिस्तान के मुद्दे को ग्लोबल स्टेज पर ले जाएगा. वहीं, उससे दो साल पहले यानी साल 2014 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने हुंकार भरते हुए पाकिस्तान को चेताया था कि भारत की रणनीति अगर शिफ्ट हुई तो पाकिस्तान बलूचिस्तान खो देगा.
दरअसल, ख्वाजा आसिफ ने संसद में अपनी लाचारी और बेबसी का रोना रोया. उन्होंने पाकिस्तानी संसद में कहा कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 40 प्रतिशत से अधिक है. इतने बड़े और विशाल क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण करना सेना के लिए नामुमकिन जैसा हो गया है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में माना कि हमारे सैनिक वहां तैनात तो हैं, लेकिन इतने बड़े इलाके की गश्त और रखवाली करने में वे ‘शारीरिक रूप से अक्षम’ हैं. घनी आबादी वाले शहरों की तुलना में इस बंजर और पहाड़ी इलाके को संभालना पाकिस्तानी सेना के बस से बाहर हो चुका है.पाक रक्षा मंत्री ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया कि बलूच विद्रोहियों के पास पाकिस्तानी सेना से कहीं अधिक एडवांस और महंगे हथियार हैं.
हर विद्रोही लगभग 20 लाख रुपये की राइफल
- उनके अनुसार, हर विद्रोही लगभग 20 लाख रुपये की राइफल, 4,000 से 5,000 डॉलर के थर्मल और लेजर सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है.
- एक-एक लड़ाके के पास करीब 20,000 डॉलर (लगभग 17 लाख भारतीय रुपये) का पूरा कॉम्बैट गियर पैकेज है.
- आधुनिक तकनीक और भारी फंडिंग के कारण विद्रोही पाकिस्तानी फौज पर भारी पड़ रहे हैं, जिससे पाकिस्तान के टूटने का खतरा और बढ़ गया है.
जब PM मोदी ने किया बलूचिस्तान का ज़िक्र
साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बलूचिस्तान का उल्लेख करना एक कूटनीतिक संकेत था कि भारत अब पाकिस्तान के आंतरिक मुद्दों को वैश्विक पटल पर उजागर करेगा. भारत के स्वतंत्रता दिवस भाषण में पीएम मोदी ने बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन की कड़ी निंदा की. इस कदम को राजनीतिक रूप में सराहा गया. इसे पाकिस्तान के कश्मीर पर ध्यान केंद्रित करने की प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया.
साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में बलूचिस्तान का उल्लेख करना एक कूटनीतिक संकेत था कि भारत अब पाकिस्तान के आंतरिक मुद्दों को वैश्विक पटल पर उजागर करेगा. भारत के स्वतंत्रता दिवस भाषण में पीएम मोदी ने बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन की कड़ी निंदा की. इस कदम को राजनीतिक रूप में सराहा गया. इसे पाकिस्तान के कश्मीर पर ध्यान केंद्रित करने की प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया.

बलूचिस्तान में पाकिस्तान की मुश्किलों के बीच ख्वाजा आसिफ का बड़ा कबूलनामा
एनएसए डोभाल की हुंकार
वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार NSA अजित डोभाल का भी एक पुरानाव वीडियो है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की रणनीति शिफ्ट हो जाएगी और आप बलूचिस्तान खो देंगे. इस वीडियो में अजीत डोभाल साफ चेतावनी देते नजर आ रहे हैं कि अगर पाकिस्तान ने 26/11 मुंबई हमले जैसी घटना दोहराई तो भारत की रणनीति शिफ्ट हो जाएगी और आप बलूचिस्तान खो देंगे. वीडियो में डोभाल आगे कहते हैं कि पाकिस्तान की कमजोरियां भारत की तुलना में कहीं अधिक हैं. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान समझता है कि भारत ने रक्षात्मक से आक्रामक रक्षा की ओर रुख किया है तो उनके लिए इसे सहन करना असंभव हो जाएगा. आप एक मुंबई कर सकते हैं लेकिन आप बलूचिस्तान खो सकते हैं. इसमें न तो परमाणु युद्ध की जरूरत होगी और न ही सैनिकों की सीधी तैनाती. अगर वे चालें जानते हैं तो हम भी जानते हैं.
वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार NSA अजित डोभाल का भी एक पुरानाव वीडियो है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की रणनीति शिफ्ट हो जाएगी और आप बलूचिस्तान खो देंगे. इस वीडियो में अजीत डोभाल साफ चेतावनी देते नजर आ रहे हैं कि अगर पाकिस्तान ने 26/11 मुंबई हमले जैसी घटना दोहराई तो भारत की रणनीति शिफ्ट हो जाएगी और आप बलूचिस्तान खो देंगे. वीडियो में डोभाल आगे कहते हैं कि पाकिस्तान की कमजोरियां भारत की तुलना में कहीं अधिक हैं. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान समझता है कि भारत ने रक्षात्मक से आक्रामक रक्षा की ओर रुख किया है तो उनके लिए इसे सहन करना असंभव हो जाएगा. आप एक मुंबई कर सकते हैं लेकिन आप बलूचिस्तान खो सकते हैं. इसमें न तो परमाणु युद्ध की जरूरत होगी और न ही सैनिकों की सीधी तैनाती. अगर वे चालें जानते हैं तो हम भी जानते हैं.
पाकिस्तान अब तक बलूचिस्तान को कुचलता रहा है
1948 से अब तक बलूचिस्तान, पाकिस्तान की सैन्य दमन नीति का शिकार रहा है. पाकिस्तान ने बलूच जनता के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को न केवल छीना है बल्कि हर आवाज को बेरहमी से दबाया है. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, बलूचिस्तान में पिछले दो दशकों में हज़ारों लोग लापता हुए हैं. पाकिस्तान की Inter-Services Intelligence (ISI) पर बलूच छात्रों, लेखकों और कार्यकर्ताओं को अगवा करने और ‘एनकाउंटर’ में मारने के आरोप हैं. कई बार सामूहिक कब्रें भी मिली हैं. वहां न स्वास्थ्य सेवाएं हैं, न शिक्षा का ढांचा और न ही मूलभूत सुविधाएं। प्राकृतिक संसाधनों जैसे गैस, कोयला और खनिजों से भरपूर होने के बावजूद बलूच लोग गरीबी में जी रहे हैं, जबकि इन संसाधनों से बाकी पाकिस्तान समृद्ध हो रहा है.
1948 से अब तक बलूचिस्तान, पाकिस्तान की सैन्य दमन नीति का शिकार रहा है. पाकिस्तान ने बलूच जनता के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को न केवल छीना है बल्कि हर आवाज को बेरहमी से दबाया है. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, बलूचिस्तान में पिछले दो दशकों में हज़ारों लोग लापता हुए हैं. पाकिस्तान की Inter-Services Intelligence (ISI) पर बलूच छात्रों, लेखकों और कार्यकर्ताओं को अगवा करने और ‘एनकाउंटर’ में मारने के आरोप हैं. कई बार सामूहिक कब्रें भी मिली हैं. वहां न स्वास्थ्य सेवाएं हैं, न शिक्षा का ढांचा और न ही मूलभूत सुविधाएं। प्राकृतिक संसाधनों जैसे गैस, कोयला और खनिजों से भरपूर होने के बावजूद बलूच लोग गरीबी में जी रहे हैं, जबकि इन संसाधनों से बाकी पाकिस्तान समृद्ध हो रहा है.
बलूचिस्तान का इतिहास
बलूचिस्तान का इतिहास 9,000 साल पुराना माना जाता है. यह क्षेत्र प्राचीन काल में मकरान और गंधार सभ्यता का भाग था। सिकंदर भी इस क्षेत्र से होकर भारत आया था. समय के साथ यह क्षेत्र अफ़ग़ानों, ईरानियों और बाद में अंग्रेजों के नियंत्रण में आया. बलूच लोग अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के लिए सदियों से संघर्ष करते आए हैं। 17वीं और 18वीं शताब्दी में यहां कालात राज्य का गठन हुआ, जिसने कई दशकों तक शासन किया. हालांकि, ब्रिटिश साम्राज्य ने धीरे-धीरे इसे अधीन कर लिया.
बलूचिस्तान का इतिहास 9,000 साल पुराना माना जाता है. यह क्षेत्र प्राचीन काल में मकरान और गंधार सभ्यता का भाग था। सिकंदर भी इस क्षेत्र से होकर भारत आया था. समय के साथ यह क्षेत्र अफ़ग़ानों, ईरानियों और बाद में अंग्रेजों के नियंत्रण में आया. बलूच लोग अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के लिए सदियों से संघर्ष करते आए हैं। 17वीं और 18वीं शताब्दी में यहां कालात राज्य का गठन हुआ, जिसने कई दशकों तक शासन किया. हालांकि, ब्रिटिश साम्राज्य ने धीरे-धीरे इसे अधीन कर लिया.
बलूचिस्तान कभी भारत का हिस्सा था
इतिहास में बलूचिस्तान सीधे तौर पर ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था. 1876 में ब्रिटिश राज ने ‘खान ऑफ कालात’ के साथ एक संधि कर बलूचिस्तान को एक रियासत के रूप में अधीनस्थ बना लिया था. यह रियासत भारतीय उपमहाद्वीप के नक्शे पर स्थित थी और इसे ब्रिटिश इंडिया की प्रोटेक्टर स्टेट माना जाता था. यह क्षेत्र भले ही स्वतंत्र रूप से शासित था लेकिन इसकी विदेशी नीति और सुरक्षा पर ब्रिटिश कंट्रोल था. इसलिए जब 1947 में भारत विभाजन हुआ, बलूचिस्तान की स्थिति भी अन्य रियासतों की तरह थी या तो भारत में विलय हो या पाकिस्तान में.
इतिहास में बलूचिस्तान सीधे तौर पर ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था. 1876 में ब्रिटिश राज ने ‘खान ऑफ कालात’ के साथ एक संधि कर बलूचिस्तान को एक रियासत के रूप में अधीनस्थ बना लिया था. यह रियासत भारतीय उपमहाद्वीप के नक्शे पर स्थित थी और इसे ब्रिटिश इंडिया की प्रोटेक्टर स्टेट माना जाता था. यह क्षेत्र भले ही स्वतंत्र रूप से शासित था लेकिन इसकी विदेशी नीति और सुरक्षा पर ब्रिटिश कंट्रोल था. इसलिए जब 1947 में भारत विभाजन हुआ, बलूचिस्तान की स्थिति भी अन्य रियासतों की तरह थी या तो भारत में विलय हो या पाकिस्तान में.
बलूचिस्तान भारत से कैसे अलग हुआ?
1947 में भारत विभाजन के समय बलूचिस्तान की रियासत ‘खान ऑफ कालात’ ने खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया. 15 अगस्त 1947 को कालात राज्य ने स्वतंत्रता की घोषणा की और पाकिस्तान में शामिल होने से इनकार कर दिया. हालांकि, पाकिस्तान ने खान पर भारी दबाव डाला और 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान की सेना ने बलूचिस्तान पर हमला कर उसे जबरन मिला लिया. इसे बलूच राष्ट्रवादियों ने ‘बलूचिस्तान पर कब्जा’ बताया और यहीं से स्वतंत्रता संग्राम की नींव पड़ी.
1947 में भारत विभाजन के समय बलूचिस्तान की रियासत ‘खान ऑफ कालात’ ने खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया. 15 अगस्त 1947 को कालात राज्य ने स्वतंत्रता की घोषणा की और पाकिस्तान में शामिल होने से इनकार कर दिया. हालांकि, पाकिस्तान ने खान पर भारी दबाव डाला और 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान की सेना ने बलूचिस्तान पर हमला कर उसे जबरन मिला लिया. इसे बलूच राष्ट्रवादियों ने ‘बलूचिस्तान पर कब्जा’ बताया और यहीं से स्वतंत्रता संग्राम की नींव पड़ी.
पाकिस्तान ने कैसे बलूचिस्तान पर कब्जा किया?
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने पहले बलूचिस्तान को एक स्वायत्त राज्य के रूप में मान्यता दी थी लेकिन कालात राज्य के स्वतंत्र रहने की घोषणा के बाद जिन्ना और पाकिस्तान की सेना ने राजनीतिक दबाव के साथ-साथ सैन्य हस्तक्षेप शुरू कर दिया. 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को जबरन अपने साथ मिला लिया. खान ऑफ कालात ने इस विलय का विरोध किया लेकिन अंततः उन्हें मजबूरन पाकिस्तान में विलय स्वीकार करना पड़ा. इसके बाद बलूच नेताओं और जनजातियों में असंतोष फैल गया और विद्रोह शुरू हुआ.
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने पहले बलूचिस्तान को एक स्वायत्त राज्य के रूप में मान्यता दी थी लेकिन कालात राज्य के स्वतंत्र रहने की घोषणा के बाद जिन्ना और पाकिस्तान की सेना ने राजनीतिक दबाव के साथ-साथ सैन्य हस्तक्षेप शुरू कर दिया. 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को जबरन अपने साथ मिला लिया. खान ऑफ कालात ने इस विलय का विरोध किया लेकिन अंततः उन्हें मजबूरन पाकिस्तान में विलय स्वीकार करना पड़ा. इसके बाद बलूच नेताओं और जनजातियों में असंतोष फैल गया और विद्रोह शुरू हुआ.
बलूचिस्तान का मौजूदा स्वतंत्रता आंदोलन
बलूचिस्तान में अब तक पांच बड़े विद्रोह हो चुके हैं. 1948, 1958, 1963, 1973 और अब 2004 से जारी चल रहा सबसे लंबा और संगठित आंदोलन है. बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA), बलूच रिपब्लिकन आर्मी (BRA), और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) जैसे संगठन इस संघर्ष को चला रहे हैं. इनका मकसद है बलूचिस्तान की स्वतंत्रता. ये संगठन पाकिस्तान के आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक ढांचों को निशाना बना रहे हैं. खासकर चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का जबरदस्त विरोध है क्योंकि बलूच राष्ट्रवादियों का मानना है कि यह परियोजना उनकी ज़मीन पर विदेशी कब्जे को मजबूत कर रही है. 2021 में यूनाइटेड नेशंस और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने बलूचिस्तान की स्थिति पर चिंता जताई थी. भारत में भी कई बार इन आंदोलनकारियों को नैतिक समर्थन दिए जाने की आवाज़ उठी है.







