महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के ठीक एक साल बाद बीएमसी समेत नगर निगमों के चुनाव में हुई भारी जीत पर यदि भाजपा-शिंदे सेना गठबंधन फूला नहीं समा रहा, तो इसे समझा जा सकता है, क्योंकि जिन 29 स्थानीय निकायों में मतदान हुए, उनमें से अधिकांश में महायुति ने जीत दर्ज कर जमीनी स्तर पर अपना दबदबा दिखाते हुए ठाकरे बंधुओं और पवार की योजना पर पानी फेर दिया है। हैरान करने वाला प्रदर्शन तो असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम का रहा, जिसने न सिर्फ समाजवादी पार्टी को पीछे छोड़ दिया, बल्कि कई जगहों पर कांग्रेस को भी भारी नुकसान पहुंचाया है।
भाजपा और शिवसेना के 227 सदस्यों वाली बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में जीत का मतलब है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) 25 वर्षों में पहली बार इस नगर निकाय की सत्ता में नहीं होगी। इन नतीजों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा ने महाराष्ट्र की राजनीति में न केवल अपना सिक्का जमा लिया है, बल्कि विपक्ष को भी किनारे लगा दिया है, जो 2024 के विधानसभा चुनावों में मिली हार से अब तक उबर नहीं सका था। भाजपा के इस दबदबे का मतलब है कि अब उसका प्रभाव केवल नागपुर या कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में फैल गया है।
ये नतीजे न केवल विपक्ष को आत्ममंथन करने का संदेश देते हैं, बल्कि उसके सहयोगियों के लिए भी संकेत है कि अब उन्हें भाजपा को अपना बड़ा भाई मानने से कोई संकोच नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में, जब ठाकरे बंधुओं और पुणे व पिंपरी-चिंचवड़ में पवार एवं उनके भतीजे की एकजुटता भी काम नहीं कर पाई, तो विपक्ष के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि अब उनकी रणनीति क्या होगी। इन नतीजों से यह भी स्पष्ट है कि मराठी वोट बैंक ठाकरे बंधुओं के हाथ से निकल गया है, जिनके समर्थक अक्सर उत्तर भारतीय लोगों के साथ दुर्व्यवहार पर उतर आते थे।
देश के सबसे समृद्ध नगर निगम पर जिस दल का नियंत्रण होता है, वही मुंबई की राजनीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाता है और अक्सर राज्य की राजनीति की दिशा को भी प्रभावित करता है। इस लिहाज से महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों ने भाजपा को राज्य की राजनीति में महारथी बना दिया है। नतीजों से निस्संदेह ठाकरे बंधुओं और पवार परिवार की रणनीति की कमजोरियां उजागर हुई हैं और मतदाताओं के साथ उनके जमीनी जुड़ाव पर प्रश्नचिह्न भी लगा है।
महाराष्ट्र की शहरी सत्ता में फडणवीस युग की निर्णायक एंट्री
देश की सबसे अमीर और सबसे प्रभावशाली महानगरपालिका बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) अब निर्णायक रूप से सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ चुकी है।
भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए, जिसे महाराष्ट्र में महायुति के नाम से जाना जाता है, ने शहरी राजनीति में ऐसा दबदबा कायम किया है, जिसने दशकों से चले आ रहे राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। बीएमसी में 1997 के बाद शिवसेना के ढाई दशक से अधिक समय तक चले शासन का अंत हो गया है।
अपने 12 साल के सक्रिय राजनीतिक जीवन में महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे और पवार परिवार के वर्चस्व को खत्म करने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का यह ऐलान कि इस चुनाव के बाद भाजपा के 25 मेयर शपथ लेने जा रहे हैं, महज एक संख्या नहीं बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए युग के आरंभ का संकेत है।
29 में से 25 महानगरपालिकाओं पर विजय हासिल कर भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी अब पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, प्रशासन और नेतृत्व की विश्वसनीयता के हाथों में है।
यही कारण है कि ‘मराठी मानूस’ की विरासत के सबसे बड़े दावेदार माने जाने वाले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक मंच पर आना भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सका। फडणवीस के नेतृत्व में चली विकास की तेज़ आंधी ने ठाकरे समेत समूचे विपक्ष की न केवल रणनीतियों को बिखेर दिया, बल्कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति की दिशा भी स्थायी रूप से बदल दी।
महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिकाओं के लिए आम चुनाव हुए थे। आज इन नतीजों की मतगणना जारी है और लगभग 2,869 सीटों के लिए फैसला हो चुका है। इन महानगरपालिकाओं में बीएमसी सबसे महत्वपूर्ण है।
यह सिर्फ मुंबई शहर की निकाय नहीं, बल्कि राजनीतिक पैमाने पर राज्य की राजनीति का ‘मिनी विधानसभा’ भी मानी जाती है। अब तक मिले नतीजों से साफ है कि बीएमसी समेत राज्य की कम से कम 25 महानगरपालिकाओं में भाजपा अपना मेयर बनाने जा रही है।
वैसे बीएमसी का चुनाव जीतना किसी भी दल के लिए सिर्फ एक महानगरपालिका जीतना नहीं होता, बल्कि यह सत्ता, संसाधन और राजनीतिक भविष्य पर पकड़ बनाने जैसा होता है। लगभग 75 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली बीएमसी लंबे समय तक अविभाजित शिवसेना का गढ़ रही है।
यह वही किला था, जहां से ठाकरे परिवार की राजनीति को आर्थिक, संगठनात्मक और प्रतीकात्मक ताकत मिलती रही। लेकिन इस बार तस्वीर पूरी तरह बदल गई। महायुति ने बीएमसी में सिर्फ बहुमत नहीं बनाया, बल्कि यह संदेश दे दिया कि मुंबई जैसे महानगर में अब भावनात्मक नारे नहीं, ठोस प्रशासनिक रिकॉर्ड वोट दिलाता है।
इन नतीजों के केंद्र में यदि कोई एक चेहरा उभरता है, तो वह हैं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस। यह जीत सिर्फ भाजपा की संगठनात्मक सफलता नहीं, बल्कि फडणवीस की राजनीतिक स्वीकार्यता की मुहर है।
शहरी मतदाता, विशेषकर मुंबई, पुणे, नागपुर और नासिक जैसे शहरों में, अब उस नेतृत्व को प्राथमिकता देता दिखा है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर, मेट्रो, सड़क, निवेश और प्रशासनिक स्थिरता की बात करता है। फडणवीस ने खुद को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित किया है, जो भावनाओं से ज्यादा नीतियों पर चुनाव जीतता है।
दरअसल, फडणवीस ने 2014-19 के अपने पहले कार्यकाल में इतनी परियोजनाओं की आधारशिला रख दी थी कि उन पर काम अब तक जारी है। बीच में छह साल उनके सत्ता से बाहर रहने के दौरान विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ गई थी।
इसी वजह से बहुसंख्यक मतदाताओं ने देवेंद्र फडणवीस के विकास मॉडल को वोट दिया। इस चुनाव में मेट्रो, कोस्टल रोड, अटल सेतु और समृद्धि एक्सप्रेसवे के निर्माण ने बहुत अहम भूमिका अदा की।
इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि ‘मराठी मानुस’ की राजनीति अब शहरी महाराष्ट्र में अपने प्रभाव की सीमा पर पहुंच चुकी है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ आना इस बात का स्वीकार था कि अकेले-अकेले दोनों की राजनीतिक धार कुंद हो चुकी है। लेकिन मतदाताओं ने इस गठजोड़ को भी नकार दिया।
कारण साफ है, मुंबई और अन्य महानगरों में रहने वाला मतदाता आज रोजगार, ट्रैफिक, बाढ़, सफाई, हाउसिंग और निवेश से जुड़े सवाल पूछ रहा है। वह यह जानना चाहता है कि शहर कैसे चलेगा, न कि शहर किस पहचान से जाना जाएगा।
बीएमसी में हार शिवसेना (यूबीटी) के लिए सिर्फ एक चुनावी पराजय नहीं है, बल्कि यह पार्टी के अस्तित्व पर उठता सबसे बड़ा सवाल है। जिस बीएमसी को शिवसेना अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला मानती थी, वही हाथ से निकल जाना बताता है कि पार्टी का शहरी आधार तेजी से कमजोर हुआ है।
यह हार यह भी दिखाती है कि विभाजन के बाद उद्धव ठाकरे जिस नैरेटिव के सहारे भाजपा से मुकाबला करना चाहते थे, वह जमीन पर असरदार साबित नहीं हुआ।
यह चुनाव निःसंदेह महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे को आईना दिखाने वाला साबित हुआ। आक्रामक भाषण, मराठी मुद्दा और सांस्कृतिक राजनीति के बावजूद एमएनएस शहरी सत्ता के केंद्र तक पहुंचने में असफल रही।
यह चुनाव बताता है कि शहरी मतदाता अब विरोध की राजनीति नहीं, समाधान की राजनीति चाहता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि 2014 के बाद फडणवीस का काम राज्य में हर जगह नजर आ रहा है। ऐसे में इसे कैसे झुठलाया जा सकता है।
महायुति की सफलता का एक बड़ा कारण यह रहा कि भाजपा, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी ने जमीनी स्तर पर सीटों का समझदारी से बंटवारा किया। स्थानीय नेतृत्व को महत्व दिया गया और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं को सीधे मतदाताओं से जोड़ा गया।
कई जगह स्थानीय नेताओं के कारण गठबंधन नहीं हो सका, लेकिन वह उसी नगर तक सीमित रह गया। इसका नतीजा यह हुआ कि शहरी निकाय चुनाव, जो अक्सर स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहते हैं, इस बार नेतृत्व और शासन मॉडल पर जनमत संग्रह बन गए।
29 महानगरपालिकाओं के नतीजे आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों का ट्रेलर माने जा सकते हैं। यह साफ संकेत है कि यदि विपक्ष अपनी राजनीति को सिर्फ भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दों तक सीमित रखेगा, तो शहरी महाराष्ट्र में उसके लिए राह और कठिन होती जाएगी। भाजपा ने इन नतीजों के जरिए यह भी दिखा दिया है कि वह ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुकी है।
बीएमसी समेत 25 महानगरपालिकाओं पर महायुति की जीत यह घोषित करती है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। यह चरण नारों का नहीं, प्रदर्शन का है; पहचान का नहीं, प्रशासन का है।
देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि यदि सत्ता के साथ स्पष्ट विज़न और स्थिर नेतृत्व हो, तो सबसे पुराने राजनीतिक किले भी ढहाए जा सकते हैं। बीएमसी की यह लड़ाई, दरअसल मुंबई की नहीं थी, बल्कि महाराष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई थी, और इसमें बाज़ी साफ तौर पर महायुति के हाथ लगी है।
इस चुनाव में एकनाथ शिंदे की शिवसेना को बड़ा झटका लगा है, खासकर मुंबई में। जिस मुंबई को बाल ठाकरे की राजनीति की कर्मभूमि माना जाता है, वहीं शिंदे गुट का प्रदर्शन उनके दावों के अनुरूप नहीं रहा।
मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) ने लगभग 60 सीटें जीतकर यह संकेत दे दिया कि पारंपरिक शिवसेना मतदाता आज भी ठाकरे परिवार के साथ खड़ा है, जबकि शिंदे की शिवसेना को इसकी आधी सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। यह नतीजे सीधे तौर पर एकनाथ शिंदे के उस दावे को कमजोर करते हैं, जिसमें वे खुद को बाल ठाकरे की राजनीति का “असली वारिस” बताते रहे हैं।
पुणे की दोनों महानगरपालिकाओं, पुणे और पिंपरी-चिंचवड़, के नतीजे भाजपा के शहरी विस्तार की सबसे ठोस मिसाल बनकर उभरे हैं। एनसीपी के दोनों गुटों ने अप्रत्याशित रूप से यहां गठबंधन किया था, इसके बावजूद शिक्षा, आईटी, ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र माने जाने वाले इन दोनों शहरों में मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से विकास और प्रशासनिक क्षमता को प्राथमिकता दी।
दोनों महानगरपालिकाओं में भाजपा की जीत ने यह संकेत दिया कि परंपरागत रूप से कांग्रेस-एनसीपी प्रभाव वाले इस क्षेत्र में अब राजनीतिक धुरी बदल चुकी है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के ठीक एक साल बाद बीएमसी समेत नगर निगमों के चुनाव में हुई भारी जीत पर यदि भाजपा-शिंदे सेना गठबंधन फूला नहीं समा रहा, तो इसे समझा जा सकता है, क्योंकि जिन 29 स्थानीय निकायों में मतदान हुए, उनमें से अधिकांश में महायुति ने जीत दर्ज कर जमीनी स्तर पर अपना दबदबा दिखाते हुए ठाकरे बंधुओं और पवार की योजना पर पानी फेर दिया है। हैरान करने वाला प्रदर्शन तो असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम का रहा, जिसने न सिर्फ समाजवादी पार्टी को पीछे छोड़ दिया, बल्कि कई जगहों पर कांग्रेस को भी भारी नुकसान पहुंचाया है।
भाजपा और शिवसेना के 227 सदस्यों वाली बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में जीत का मतलब है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) 25 वर्षों में पहली बार इस नगर निकाय की सत्ता में नहीं होगी। इन नतीजों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा ने महाराष्ट्र की राजनीति में न केवल अपना सिक्का जमा लिया है, बल्कि विपक्ष को भी किनारे लगा दिया है, जो 2024 के विधानसभा चुनावों में मिली हार से अब तक उबर नहीं सका था। भाजपा के इस दबदबे का मतलब है कि अब उसका प्रभाव केवल नागपुर या कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में फैल गया है।
ये नतीजे न केवल विपक्ष को आत्ममंथन करने का संदेश देते हैं, बल्कि उसके सहयोगियों के लिए भी संकेत है कि अब उन्हें भाजपा को अपना बड़ा भाई मानने से कोई संकोच नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में, जब ठाकरे बंधुओं और पुणे व पिंपरी-चिंचवड़ में पवार एवं उनके भतीजे की एकजुटता भी काम नहीं कर पाई, तो विपक्ष के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि अब उनकी रणनीति क्या होगी। इन नतीजों से यह भी स्पष्ट है कि मराठी वोट बैंक ठाकरे बंधुओं के हाथ से निकल गया है, जिनके समर्थक अक्सर उत्तर भारतीय लोगों के साथ दुर्व्यवहार पर उतर आते थे।
देश के सबसे समृद्ध नगर निगम पर जिस दल का नियंत्रण होता है, वही मुंबई की राजनीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाता है और अक्सर राज्य की राजनीति की दिशा को भी प्रभावित करता है। इस लिहाज से महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों ने भाजपा को राज्य की राजनीति में महारथी बना दिया है। नतीजों से निस्संदेह ठाकरे बंधुओं और पवार परिवार की रणनीति की कमजोरियां उजागर हुई हैं और मतदाताओं के साथ उनके जमीनी जुड़ाव पर प्रश्नचिह्न भी लगा है।
महाराष्ट्र की शहरी सत्ता में फडणवीस युग की निर्णायक एंट्री
देश की सबसे अमीर और सबसे प्रभावशाली महानगरपालिका बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) अब निर्णायक रूप से सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ चुकी है।
भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए, जिसे महाराष्ट्र में महायुति के नाम से जाना जाता है, ने शहरी राजनीति में ऐसा दबदबा कायम किया है, जिसने दशकों से चले आ रहे राजनीतिक समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। बीएमसी में 1997 के बाद शिवसेना के ढाई दशक से अधिक समय तक चले शासन का अंत हो गया है।
अपने 12 साल के सक्रिय राजनीतिक जीवन में महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे और पवार परिवार के वर्चस्व को खत्म करने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का यह ऐलान कि इस चुनाव के बाद भाजपा के 25 मेयर शपथ लेने जा रहे हैं, महज एक संख्या नहीं बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए युग के आरंभ का संकेत है।
29 में से 25 महानगरपालिकाओं पर विजय हासिल कर भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता की चाबी अब पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, प्रशासन और नेतृत्व की विश्वसनीयता के हाथों में है।
यही कारण है कि ‘मराठी मानूस’ की विरासत के सबसे बड़े दावेदार माने जाने वाले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक मंच पर आना भी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सका। फडणवीस के नेतृत्व में चली विकास की तेज़ आंधी ने ठाकरे समेत समूचे विपक्ष की न केवल रणनीतियों को बिखेर दिया, बल्कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति की दिशा भी स्थायी रूप से बदल दी।
महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिकाओं के लिए आम चुनाव हुए थे। आज इन नतीजों की मतगणना जारी है और लगभग 2,869 सीटों के लिए फैसला हो चुका है। इन महानगरपालिकाओं में बीएमसी सबसे महत्वपूर्ण है।
यह सिर्फ मुंबई शहर की निकाय नहीं, बल्कि राजनीतिक पैमाने पर राज्य की राजनीति का ‘मिनी विधानसभा’ भी मानी जाती है। अब तक मिले नतीजों से साफ है कि बीएमसी समेत राज्य की कम से कम 25 महानगरपालिकाओं में भाजपा अपना मेयर बनाने जा रही है।
वैसे बीएमसी का चुनाव जीतना किसी भी दल के लिए सिर्फ एक महानगरपालिका जीतना नहीं होता, बल्कि यह सत्ता, संसाधन और राजनीतिक भविष्य पर पकड़ बनाने जैसा होता है। लगभग 75 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली बीएमसी लंबे समय तक अविभाजित शिवसेना का गढ़ रही है।
यह वही किला था, जहां से ठाकरे परिवार की राजनीति को आर्थिक, संगठनात्मक और प्रतीकात्मक ताकत मिलती रही। लेकिन इस बार तस्वीर पूरी तरह बदल गई। महायुति ने बीएमसी में सिर्फ बहुमत नहीं बनाया, बल्कि यह संदेश दे दिया कि मुंबई जैसे महानगर में अब भावनात्मक नारे नहीं, ठोस प्रशासनिक रिकॉर्ड वोट दिलाता है।
इन नतीजों के केंद्र में यदि कोई एक चेहरा उभरता है, तो वह हैं मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस। यह जीत सिर्फ भाजपा की संगठनात्मक सफलता नहीं, बल्कि फडणवीस की राजनीतिक स्वीकार्यता की मुहर है।
शहरी मतदाता, विशेषकर मुंबई, पुणे, नागपुर और नासिक जैसे शहरों में, अब उस नेतृत्व को प्राथमिकता देता दिखा है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर, मेट्रो, सड़क, निवेश और प्रशासनिक स्थिरता की बात करता है। फडणवीस ने खुद को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित किया है, जो भावनाओं से ज्यादा नीतियों पर चुनाव जीतता है।
दरअसल, फडणवीस ने 2014-19 के अपने पहले कार्यकाल में इतनी परियोजनाओं की आधारशिला रख दी थी कि उन पर काम अब तक जारी है। बीच में छह साल उनके सत्ता से बाहर रहने के दौरान विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ गई थी।
इसी वजह से बहुसंख्यक मतदाताओं ने देवेंद्र फडणवीस के विकास मॉडल को वोट दिया। इस चुनाव में मेट्रो, कोस्टल रोड, अटल सेतु और समृद्धि एक्सप्रेसवे के निर्माण ने बहुत अहम भूमिका अदा की।
इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि ‘मराठी मानुस’ की राजनीति अब शहरी महाराष्ट्र में अपने प्रभाव की सीमा पर पहुंच चुकी है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ आना इस बात का स्वीकार था कि अकेले-अकेले दोनों की राजनीतिक धार कुंद हो चुकी है। लेकिन मतदाताओं ने इस गठजोड़ को भी नकार दिया।
कारण साफ है, मुंबई और अन्य महानगरों में रहने वाला मतदाता आज रोजगार, ट्रैफिक, बाढ़, सफाई, हाउसिंग और निवेश से जुड़े सवाल पूछ रहा है। वह यह जानना चाहता है कि शहर कैसे चलेगा, न कि शहर किस पहचान से जाना जाएगा।
बीएमसी में हार शिवसेना (यूबीटी) के लिए सिर्फ एक चुनावी पराजय नहीं है, बल्कि यह पार्टी के अस्तित्व पर उठता सबसे बड़ा सवाल है। जिस बीएमसी को शिवसेना अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला मानती थी, वही हाथ से निकल जाना बताता है कि पार्टी का शहरी आधार तेजी से कमजोर हुआ है।
यह हार यह भी दिखाती है कि विभाजन के बाद उद्धव ठाकरे जिस नैरेटिव के सहारे भाजपा से मुकाबला करना चाहते थे, वह जमीन पर असरदार साबित नहीं हुआ।
यह चुनाव निःसंदेह महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के मुखिया राज ठाकरे को आईना दिखाने वाला साबित हुआ। आक्रामक भाषण, मराठी मुद्दा और सांस्कृतिक राजनीति के बावजूद एमएनएस शहरी सत्ता के केंद्र तक पहुंचने में असफल रही।
यह चुनाव बताता है कि शहरी मतदाता अब विरोध की राजनीति नहीं, समाधान की राजनीति चाहता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि 2014 के बाद फडणवीस का काम राज्य में हर जगह नजर आ रहा है। ऐसे में इसे कैसे झुठलाया जा सकता है।
महायुति की सफलता का एक बड़ा कारण यह रहा कि भाजपा, शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार गुट की एनसीपी ने जमीनी स्तर पर सीटों का समझदारी से बंटवारा किया। स्थानीय नेतृत्व को महत्व दिया गया और केंद्र-राज्य सरकार की योजनाओं को सीधे मतदाताओं से जोड़ा गया।
कई जगह स्थानीय नेताओं के कारण गठबंधन नहीं हो सका, लेकिन वह उसी नगर तक सीमित रह गया। इसका नतीजा यह हुआ कि शहरी निकाय चुनाव, जो अक्सर स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहते हैं, इस बार नेतृत्व और शासन मॉडल पर जनमत संग्रह बन गए।
29 महानगरपालिकाओं के नतीजे आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों का ट्रेलर माने जा सकते हैं। यह साफ संकेत है कि यदि विपक्ष अपनी राजनीति को सिर्फ भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दों तक सीमित रखेगा, तो शहरी महाराष्ट्र में उसके लिए राह और कठिन होती जाएगी। भाजपा ने इन नतीजों के जरिए यह भी दिखा दिया है कि वह ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन चुकी है।
बीएमसी समेत 25 महानगरपालिकाओं पर महायुति की जीत यह घोषित करती है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। यह चरण नारों का नहीं, प्रदर्शन का है; पहचान का नहीं, प्रशासन का है।
देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि यदि सत्ता के साथ स्पष्ट विज़न और स्थिर नेतृत्व हो, तो सबसे पुराने राजनीतिक किले भी ढहाए जा सकते हैं। बीएमसी की यह लड़ाई, दरअसल मुंबई की नहीं थी, बल्कि महाराष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई थी, और इसमें बाज़ी साफ तौर पर महायुति के हाथ लगी है।
इस चुनाव में एकनाथ शिंदे की शिवसेना को बड़ा झटका लगा है, खासकर मुंबई में। जिस मुंबई को बाल ठाकरे की राजनीति की कर्मभूमि माना जाता है, वहीं शिंदे गुट का प्रदर्शन उनके दावों के अनुरूप नहीं रहा।
मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) ने लगभग 60 सीटें जीतकर यह संकेत दे दिया कि पारंपरिक शिवसेना मतदाता आज भी ठाकरे परिवार के साथ खड़ा है, जबकि शिंदे की शिवसेना को इसकी आधी सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। यह नतीजे सीधे तौर पर एकनाथ शिंदे के उस दावे को कमजोर करते हैं, जिसमें वे खुद को बाल ठाकरे की राजनीति का “असली वारिस” बताते रहे हैं।
पुणे की दोनों महानगरपालिकाओं, पुणे और पिंपरी-चिंचवड़, के नतीजे भाजपा के शहरी विस्तार की सबसे ठोस मिसाल बनकर उभरे हैं। एनसीपी के दोनों गुटों ने अप्रत्याशित रूप से यहां गठबंधन किया था, इसके बावजूद शिक्षा, आईटी, ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र माने जाने वाले इन दोनों शहरों में मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से विकास और प्रशासनिक क्षमता को प्राथमिकता दी।
दोनों महानगरपालिकाओं में भाजपा की जीत ने यह संकेत दिया कि परंपरागत रूप से कांग्रेस-एनसीपी प्रभाव वाले इस क्षेत्र में अब राजनीतिक धुरी बदल चुकी है।