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अगर नई दिल्ली संप्रभुता पर मजबूत रहती है, कूटनीति में धैर्य रखती है तो ड्रेगन की चाल कामयाब नहीं होगी………………….

UB India News by UB India News
January 7, 2026
in संपादकीय
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भारत अपने आत्मसम्मान को अक्षुण्ण रखते और हितों की रक्षा करते हुए अपनी भूमिका को परिभाषित कर रहा  …………
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पेंटागन के ताजा आकलन ने भारत की रणनीतिक बहस में नई तेजी ला दी है। भले ही चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव कम करने के संकेत दे रहा है, लेकिन अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि बीजिंग विदेशों में सैन्य ठिकाने तलाश रहा है, खासकर म्यांमार और बांग्लादेश में, ताकि उसकी सैन्य पहुंच भारत व उसके पड़ोस तक बढ़ सके। इसलिए, सीमा पर जो शांति दिख रही है, वह सद्भावना का संकेत नहीं है। यह एक बड़े रणनीतिक बदलाव का हिस्सा है, जिसे एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को चीन के हित में पुनः आकार देने के लिए तैयार किया गया है।

भारत के लिए यह एक जटिल रणनीतिक चुनौती पैदा करता है। पहला, म्यांमार और बांग्लादेश में चीनी पहुंच से बंगाल की खाड़ी व पूर्वी समुद्री तट पर भारत का पारंपरिक लाभ कम हो जाएगा, जिससे बीजिंग शिपिंग लेन पर नजर रख पाएगा और भारतीय नौसेना के ऑपरेशंस को मुश्किल बना देगा। दूसरा, जिन सुविधाओं को व्यावसायिक बताया गया है, वे भी समय के साथ निगरानी, रिफ्यूलिंग और तेजी से सैन्य तैनाती में मदद कर सकती हैं। तीसरा, भारत के पूर्वोत्तर के करीब होने से बीजिंग की संकट के समय दबाव डालने की क्षमता बढ़ जाती है, जिसमें जानकारी, आर्थिक या सैन्य संकेत शामिल हैं। चौथा, बुनियादी ढांचों की कमी का सामना कर रहे दक्षिण एशियाई देशों को चीनी वित्तीय सहायता भारतीय वादों की तुलना में ज्यादा लचीली लग सकती है, जिससे धीरे-धीरे नई दिल्ली का दबदबा कम हो जाएगा। तकनीक, व्यवसाय और सुरक्षा के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। अगर इसे सुरक्षित न किया जाए, तो बंदरगाह, टेलीकॉम नेटवर्क, पावर ग्रिड और डिजिटल ढांचे सभी दबाव बढ़ाने का कारण बन सकते हैं।

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पेंटागन की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजिंग ‘शायद एलएसी पर कम हुए तनाव का फायदा उठाकर अमेरिका-भारत संबंधों को और गहरा होने से रोकना चाहता है।’ यानी चीन शांति का इस्तेमाल एक रणनीति के तौर पर कर रहा है, न कि रियायत के तौर पर। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में धीरे-धीरे संतुलन मजबूत होने से स्थिति बीजिंग के लिए अनुकूल नहीं रह गई थी। तनाव में अस्थायी कमी से उसके लिए गुंजाइश बढ़ जाती है। उसी रिपोर्ट में म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका में संभावित सैन्य ठिकाने बनाने की बात कही गई है, जबकि पाकिस्तान करीबी रक्षा सहयोग का एक अलग स्तंभ बना हुआ है। विदेशी सैन्य ठिकानों की ‘सीमित’ सुविधाएं भी समीकरण बदल देती हैं। वे उस ढांचे का निर्माण करती हैं, जिसे लंबे समय से ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ कहा जाता है: हिंद महासागर में फैले बंदरगाहों, पहुंच मार्गों और भागीदारी की एक शृंखला।

भारत ने पारंपरिक रूप से हिंद महासागर को अपनी मुख्य जिम्मेदारी का क्षेत्र माना है, इसलिए उसके लिए यह सिर्फ मुकाबला नहीं है, बल्कि प्रभाव, सोच और लंबे समय तक पहुंच के लिए एक प्रतियोगिता है। भारत के लिए न तो वाशिंगटन पर सहज विश्वास करने और न ही बीजिंग के साथ समय से पहले सुलह करने का कोई विकल्प है। इसके लिए एकमात्र कारगर रास्ता अनुशासित यथार्थवाद है: जहां जरूरी हो, बात करें, जहां जरूरत हो, रोकें, और कूटनीतिक माहौल की परवाह किए बिना क्षमताओं का निर्माण करें। इतिहास बताता है कि बीजिंग अक्सर पहले स्थिति को स्थिर करता है और बाद में धीरे-धीरे कदम उठाकर असलियत को बदल देता है। इसलिए भारत को टकराव दूर करने की बातचीत और कूटनीतिक चैनल जारी रखने चाहिए, लेकिन साथ ही लगातार बुनियादी ढांचे के विकास, आगे की तैयारी और गलतफहमी को रोकने का पक्का इरादा भी होना चाहिए।

भारत का रणनीतिक स्वायत्तता का सिद्धांत अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका स्वरूप बदल रहा है। आज स्वायत्तता का मतलब अकेले रहना नहीं, बल्कि भागीदारी से मजबूत हुई स्वायत्तता है। रक्षा तकनीक, समुद्री क्षेत्र की जानकारी, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष की जानकारी और खुफिया जानकारी साझा करने में सहयोगी परियोजनाएं भारत की स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता को बढ़ाती हैं। बीजिंग तर्क देता है कि सीमा विवाद को बड़े संबंधों से अलग रखा जाना चाहिए। भारत को इसका विरोध करना चाहिए। एलएसी पर शांति और सुकून के बिना असली सामान्य स्थिति मुमकिन नहीं है।

कुल मिलाकर, चीन का मौजूदा रवैया एक सोची-समझी रणनीति है: सीमा पर शांति बनाए रखना और भारत को उसके सहयोगी देशों के साथ करीब आने से रोकना, हिंद महासागर में अपना प्रभाव बढ़ाना, और सैन्य आधुनिकीकरण के लिए समय हासिल करना। जब भी चीन कोई टेंट हटाए या पेट्रोलिंग चौकी खाली करे, तो भारत को उसे अपनी जीत घोषित करने से बचना चाहिए। असली मुकाबला इस क्षेत्र की रणनीतिक दिशा को लेकर है। बीजिंग के साथ बातचीत जारी रहनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही तैयार भी रहना चाहिए। अगर नई दिल्ली संप्रभुता पर मजबूत रहती है, कूटनीति में धैर्य रखती है और सहयोग में आत्मविश्वास रखती है, तो चीन की चाल कामयाब नहीं होगी।

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