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ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल प्रक्षेपण- इतिहास में एक और पन्ना, वैश्विक पहचान का नया पहलू

UB India News by UB India News
December 26, 2025
in अंतरिक्ष, संपादकीय
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ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल प्रक्षेपण- इतिहास में एक और पन्ना, वैश्विक पहचान का नया पहलू
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय तब जुड़ गया, जब उसने अपने बाहुबली कहे जाने वाले प्रक्षेपण यान एलवीएम-3 एम6 के जरिये अमेरिकी संचार उपग्रह ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया, जो भारत से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। गौरतलब है कि इसरो द्वारा विकसित करीब 640 टन वजनी तीन चरणीय लॉन्च व्हीकल एलवीएम-3 अपने गौरवशाली इतिहास में इससे पहले चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और वनवेब मिशनों में भी सफलतापूर्वक अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा था।

2023 के बाद यह दूसरा वर्ष है, जब इसरो ने एक ही वर्ष में दो एलवीएम-3 मिशनों का संचालन किया है, जो भारी उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में भारत की बढ़ती गति, क्षमता व विश्वास को रेखांकित करता है। दूसरी ओर, ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 इसरो की व्यावसायिक इकाई न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के समझौते का हिस्सा है। इस उपग्रह का वजन लगभग 6,100 किलोग्राम है और इसमें एक 223 वर्ग मीटर फेज्ड ऐरे एंटीना लगा हुआ है, जिसकी मदद से बगैर मोबाइल टावरों के हिमालय, रेगिस्तान, महासागर या आपदाग्रस्त जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भी मोबाइल फोन पर 4जी और 5जी वॉयस कॉल, वीडियो, टेक्स्ट और डाटा का इस्तेमाल करना संभव हो सकेगा। इस कामयाबी का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत-अमेरिकी अंतरिक्ष सहयोग भी है।

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पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच तकनीकी साझेदारी, डाटा साझाकरण व संयुक्त शोध में तेजी आई है। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का प्रक्षेपण इस सहयोग को एक ठोस व्यावहारिक रूप देता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि भारत केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि तकनीकी भागीदार बनने की क्षमता भी रखता है। ऐसे वक्त में, जब अंतरिक्ष को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है, यह विश्वास व पारदर्शिता दोनों देशों के बीच रणनीतिक रूप से लाभकारी है। यह मिशन भारत के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है। वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में प्रतिस्पर्धा तीव्र है, जहां स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियां आक्रामक रणनीतियों के साथ मौजूद हैं।

इसके बावजूद, इसरो की विश्वसनीयता, अपेक्षाकृत कम लागत और कामयाब ट्रैक रिकॉर्ड उसे विशिष्ट स्थान दिलाते हैं। ताजा कामयाबी से भारत के लिए भविष्य में अधिक वाणिज्यिक अनुबंध मिलने की संभावना बढ़ेगी। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक मील का पत्थर है। अगर इस गति को दूरदर्शी नीतियों, निजी भागीदारी और वैश्विक सहयोग के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में महज एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि निस्संदेह नेतृत्वकारी राष्ट्र के रूप में पहचाना जाएगा।

एलवीएम3-एम6 मिशन की शानदार सफलता ने भारत के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के प्रति भरोसे को और मजबूत कर दिया है। इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने कहा कि लगातार नौ सफल एलवीएम3 लॉन्च ने यह साबित कर दिया है कि भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा है।

बुधवार को एलवीएम3-एम6 रॉकेट के जरिए ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। इस मिशन को खास बताते हुए नारायणन ने कहा कि एलवीएम3 वही मानव-रेटेड लॉन्च व्हीकल है, जिसे गगनयान मिशन के लिए चुना गया है। ऐसे में इसकी निरंतर सफलता बेहद अहम है।

अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट भारत की धरती से लॉन्च

उन्होंने बताया कि इस मिशन में सैटेलाइट को बेहद सटीकता के साथ तय कक्षा में पहुंचाया गया। लक्ष्य 520 किलोमीटर की वृत्ताकार कक्षा था, जबकि सैटेलाइट को 518.5 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया, जो अब तक भारतीय लॉन्चरों की सबसे बेहतरीन सटीकता मानी जा रही है। इस मिशन की एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि यह भारत की धरती से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट था। करीब 5,908 किलोग्राम वजनी इस सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाकर इसरो ने एक नया कीर्तिमान रचा। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 8:55 बजे हुई। यह मिशन न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड और अमेरिका की AST स्पेसमोबाइल के बीच हुए कॉमर्शियल समझौते का हिस्सा है।

नारायणन ने बताया कि एलवीएम3 रॉकेट ने इस मिशन में 100 प्रतिशत विश्वसनीयता का प्रदर्शन किया। साथ ही पहली बार एस200 सॉलिड मोटर कंट्रोल सिस्टम में एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया। पहले जहां इलेक्ट्रो-हाइड्रो एक्ट्यूएटर का उपयोग होता था, वहीं अब स्वदेशी रूप से विकसित शक्तिशाली इलेक्ट्रो-मैकेनिकल एक्ट्यूएटर लगाया गया है, जिससे रॉकेट की पेलोड क्षमता लगभग 150 किलोग्राम तक बढ़ गई है।

तो मोबाइल नेटवर्क के लिए नहीं लगेंगे टावर?

भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) इस साल के अपने आखिरी मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर इतिहास रच दिया । 24 दिसंबर (बुधवार) को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेस मोबाइल के एक अहम सैटेलाइट को अंतरिक्ष में लॉन्च कर दिया है।  एलवीएम3-एम6 मिशन के जरिए अमेरिकी कंपनी के कम्युनिकेशन सैटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जाना है। यह इस रॉकेट की छठी ऑपरेशनल उड़ान (एलवीएम3-एम6) है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर इसरो का ये मिशन क्या है? कैसे भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि बनेगा? जिस मिशन का भारत ने बीड़ा उठाया है, वह सैटेलाइट क्यों खास है? कैसे इसरो की मदद से आने वाले समय में अमेरिकी कंपनी मोबाइल नेटवर्क का पूरा स्वरूप बदल सकती है और स्टारलिंक जैसी कंपनियों के लिए चुनौती बन सकती है? आइये जानते हैं…
पहले जानें- क्या है इसरो का मिशन, क्या इतिहास बनाने की तैयारी?
इसरो के इस मिशन का नाम एलवीएम3-एम6 ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 (LVM3-M6 / BlueBird Block-2) है। यह पूरी तरह से कॉमर्शियल लॉन्चिंग है। यह मिशन अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 संचार उपग्रह को पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लोअर अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए है। इसरो इसकी लॉन्चिंग के लिए अपने एलवीएम3 रॉकेट का इस्तेमाल करेगा, जो कि इस लॉन्च व्हीकल की छठवीं उड़ान होगी और वाणिज्यिक मिशन के लिए तीसरी। भारत के इस लॉन्च व्हीकल को पहले ही इसकी क्षमताओं के लिए ‘बाहुबली’ नाम दिया जा चुका है।

कैसे भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बनेगा यह मिशन?
भारत के लिए यह एक अहम मिशन है, क्योंकि लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3) रॉकेट की छठी उड़ान सफल होने से कमर्शियल स्पेस सेक्टर में भारत की पकड़ और मजबूत होगी। ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 उपग्रह का वजन लगभग 6,500 किलोग्राम है। भारतीय लॉन्च व्हीकल अगर इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देता है तो यह पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित होने वाला सबसे बड़ा वाणिज्यिक संचार उपग्रह होगा।

भारत अपने एलवीएम3 लॉन्च व्हीकल के जरिए चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और वैश्विक स्तर पर सैटेलाइट इंटरनेट मुहैया कराने वाली- वन वेब के सैटेलाइट लॉन्चिंग मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है। वन वेब मिशन में इसरो ने एलवीएम से दो बार में कुल 72 सैटेलाइट्स पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित की थीं।

 मिशन में शामिल सैटेलाइट क्यों खास, दुनिया को क्या हासिल होगा?

1. बिना टावर की रेंज में आए भी मिलता रहेगा सिग्नल
ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 उपग्रह एक अगली पीढ़ी (नेक्स्ट जेन) की प्रणाली का हिस्सा है। अगर यह उपग्रह सही कक्षा में स्थापित हो जाता है और कंपनी के परीक्षण सफल होते हैं तो इसके जरिए 4जी और 5जी स्मार्टफोन पर सीधे सेल्युलर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी। उपभोक्ता को किसी अतिरिक्त एंटीना या कस्टमाइज्ड हार्डवेयर की जरूरत नहीं होगी। फिलहाल सेलफोन को 4जी या 5जी नेटवर्क हासिल करने के लिए मोबाइल टावर की जरूरत होती है, लेकिन इस उपग्रह के सफल होने के बाद टावर का काम खत्म हो सकता है।

2. दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच

चूंकि उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाने के साथ कुछ सबसे दूरस्थ स्थानों जैसे हिमालय, महासागरों और रेगिस्तानों तक मोबाइल सेवा पहुंचा सकता है, ऐसे में इन क्षेत्रों में 4जी-5जी नेटवर्क सुविधा पहुंचाना आसान हो जाएगा। इससे वैश्विक स्तर पर डिजिटल असमानता को कम भी किया जा सकता है। यह ग्रामीण क्षेत्रों, खुले पानी और उड़ानों के दौरान नेटवर्क कवरेज की खामियों को खत्म कर सकता है। आमतौर पर इन क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और यहां पहुंच न होने की वजह से पारंपरिक सेल्युलर नेटवर्क यहां फेल हो जाते हैं। इतना ही नहीं आपदा की स्थिति में जब टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर तूफान, बाढ़, भूकंप, भूस्खलन या दूसरी प्राकृतिक आपदाओं में तबाह हो जाते हैं, तब भी सैटेलाइट नेटवर्क बेहतर रहता है। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेश यूनियन डाटा के मुताबिक, 2025 तक दुनियाभर में 200 करोड़ लोग अब भी इंटरनेट या नेटवर्क कवरेज के बिना रहने को मजबूर हैं।

3. बेहतर स्पीड और क्षमता 
इस उपग्रह को 5,600 से ज्यादा व्यक्तिगत सिग्नल सेल बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह 120 मेगाबाइट्स प्रति सेकंड तक की अधिकतम गति (पीक स्पीड) मुहैया कराने में सक्षम है। यह स्पीड वॉइस कॉलिंग, मैसेजिंग, तेज डाटा ट्रांसफर और बिना रुकावट की वीडियो स्ट्रीमिंग के लिए काफी है।

लॉन्च सफल हुआ तो आगे क्या संभावनाएं?

अगर इसरो इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देता है तो इसके आगे सैटेलाइट कंपनी ऑपरेशनल टेस्टिंग को अंजाम देगी। इसके बाद वैश्विक सेवाओं की शुरुआत होगी और अलग-अलग देशों से लाइसेंस हासिल करने की प्रक्रिया शुरू होगी।

1. परीक्षण का चरण
लॉन्च के सफल होने और उपग्रह के स्थापित होने के बाद उपग्रह को पृथ्वी की निचली कक्षा में टेस्ट किया जाएगा। सबसे पहले उपग्रह अपने एंटीना को खोलेगा, जो कि 223 वर्ग मीटर (2400 वर्ग फीट) का होगा। यह पृथ्वी की निचली कक्षा में सबसे बड़ा वाणिज्यिक संचार एंटीना होगा, जिससे बड़े क्षेत्र में डायरेक्ट सिग्नल मुहैया कराए जा सकेंगे। उपग्रह का सही स्थिति में संचालन शुरू होने के बाद वाणिज्यिक सेवाएं शुरू होने से पहले इसका परीक्षण किया जाएगा। इसके लिए कुछ मोबाइल नेटवर्क पहले से तय किए गए हैं।

2. नेटवर्क फैलाने की शुरुआत
कंपनी सबसे पहले अमेरिका में चुनिंदा मोबाइल हैंडसेट में यह सुविधा मुहैया कराने का लक्ष्य रख रही है। हालांकि, बाद में अलग-अलग देशों के नियामकों से मंजूरी मिलने के बाद इसे वैश्विक स्तर पर लॉन्च किया जा सकता है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय तब जुड़ गया, जब उसने अपने बाहुबली कहे जाने वाले प्रक्षेपण यान एलवीएम-3 एम6 के जरिये अमेरिकी संचार उपग्रह ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया, जो भारत से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी उपग्रह है। गौरतलब है कि इसरो द्वारा विकसित करीब 640 टन वजनी तीन चरणीय लॉन्च व्हीकल एलवीएम-3 अपने गौरवशाली इतिहास में इससे पहले चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और वनवेब मिशनों में भी सफलतापूर्वक अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा था।

2023 के बाद यह दूसरा वर्ष है, जब इसरो ने एक ही वर्ष में दो एलवीएम-3 मिशनों का संचालन किया है, जो भारी उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में भारत की बढ़ती गति, क्षमता व विश्वास को रेखांकित करता है। दूसरी ओर, ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 इसरो की व्यावसायिक इकाई न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के समझौते का हिस्सा है। इस उपग्रह का वजन लगभग 6,100 किलोग्राम है और इसमें एक 223 वर्ग मीटर फेज्ड ऐरे एंटीना लगा हुआ है, जिसकी मदद से बगैर मोबाइल टावरों के हिमालय, रेगिस्तान, महासागर या आपदाग्रस्त जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भी मोबाइल फोन पर 4जी और 5जी वॉयस कॉल, वीडियो, टेक्स्ट और डाटा का इस्तेमाल करना संभव हो सकेगा। इस कामयाबी का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत-अमेरिकी अंतरिक्ष सहयोग भी है।

पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच तकनीकी साझेदारी, डाटा साझाकरण व संयुक्त शोध में तेजी आई है। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का प्रक्षेपण इस सहयोग को एक ठोस व्यावहारिक रूप देता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि भारत केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि तकनीकी भागीदार बनने की क्षमता भी रखता है। ऐसे वक्त में, जब अंतरिक्ष को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है, यह विश्वास व पारदर्शिता दोनों देशों के बीच रणनीतिक रूप से लाभकारी है। यह मिशन भारत के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है। वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में प्रतिस्पर्धा तीव्र है, जहां स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियां आक्रामक रणनीतियों के साथ मौजूद हैं।

इसके बावजूद, इसरो की विश्वसनीयता, अपेक्षाकृत कम लागत और कामयाब ट्रैक रिकॉर्ड उसे विशिष्ट स्थान दिलाते हैं। ताजा कामयाबी से भारत के लिए भविष्य में अधिक वाणिज्यिक अनुबंध मिलने की संभावना बढ़ेगी। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 का सफल प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक मील का पत्थर है। अगर इस गति को दूरदर्शी नीतियों, निजी भागीदारी और वैश्विक सहयोग के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में महज एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि निस्संदेह नेतृत्वकारी राष्ट्र के रूप में पहचाना जाएगा।

एलवीएम3-एम6 मिशन की शानदार सफलता ने भारत के महत्वाकांक्षी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के प्रति भरोसे को और मजबूत कर दिया है। इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने कहा कि लगातार नौ सफल एलवीएम3 लॉन्च ने यह साबित कर दिया है कि भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा है।

बुधवार को एलवीएम3-एम6 रॉकेट के जरिए ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। इस मिशन को खास बताते हुए नारायणन ने कहा कि एलवीएम3 वही मानव-रेटेड लॉन्च व्हीकल है, जिसे गगनयान मिशन के लिए चुना गया है। ऐसे में इसकी निरंतर सफलता बेहद अहम है।

अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट भारत की धरती से लॉन्च

उन्होंने बताया कि इस मिशन में सैटेलाइट को बेहद सटीकता के साथ तय कक्षा में पहुंचाया गया। लक्ष्य 520 किलोमीटर की वृत्ताकार कक्षा था, जबकि सैटेलाइट को 518.5 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया, जो अब तक भारतीय लॉन्चरों की सबसे बेहतरीन सटीकता मानी जा रही है। इस मिशन की एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि यह भारत की धरती से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट था। करीब 5,908 किलोग्राम वजनी इस सैटेलाइट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाकर इसरो ने एक नया कीर्तिमान रचा। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 8:55 बजे हुई। यह मिशन न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड और अमेरिका की AST स्पेसमोबाइल के बीच हुए कॉमर्शियल समझौते का हिस्सा है।

नारायणन ने बताया कि एलवीएम3 रॉकेट ने इस मिशन में 100 प्रतिशत विश्वसनीयता का प्रदर्शन किया। साथ ही पहली बार एस200 सॉलिड मोटर कंट्रोल सिस्टम में एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया। पहले जहां इलेक्ट्रो-हाइड्रो एक्ट्यूएटर का उपयोग होता था, वहीं अब स्वदेशी रूप से विकसित शक्तिशाली इलेक्ट्रो-मैकेनिकल एक्ट्यूएटर लगाया गया है, जिससे रॉकेट की पेलोड क्षमता लगभग 150 किलोग्राम तक बढ़ गई है।

तो मोबाइल नेटवर्क के लिए नहीं लगेंगे टावर?

भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) इस साल के अपने आखिरी मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च कर इतिहास रच दिया । 24 दिसंबर (बुधवार) को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेस मोबाइल के एक अहम सैटेलाइट को अंतरिक्ष में लॉन्च कर दिया है।  एलवीएम3-एम6 मिशन के जरिए अमेरिकी कंपनी के कम्युनिकेशन सैटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जाना है। यह इस रॉकेट की छठी ऑपरेशनल उड़ान (एलवीएम3-एम6) है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर इसरो का ये मिशन क्या है? कैसे भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि बनेगा? जिस मिशन का भारत ने बीड़ा उठाया है, वह सैटेलाइट क्यों खास है? कैसे इसरो की मदद से आने वाले समय में अमेरिकी कंपनी मोबाइल नेटवर्क का पूरा स्वरूप बदल सकती है और स्टारलिंक जैसी कंपनियों के लिए चुनौती बन सकती है? आइये जानते हैं…
पहले जानें- क्या है इसरो का मिशन, क्या इतिहास बनाने की तैयारी?
इसरो के इस मिशन का नाम एलवीएम3-एम6 ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 (LVM3-M6 / BlueBird Block-2) है। यह पूरी तरह से कॉमर्शियल लॉन्चिंग है। यह मिशन अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 संचार उपग्रह को पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लोअर अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए है। इसरो इसकी लॉन्चिंग के लिए अपने एलवीएम3 रॉकेट का इस्तेमाल करेगा, जो कि इस लॉन्च व्हीकल की छठवीं उड़ान होगी और वाणिज्यिक मिशन के लिए तीसरी। भारत के इस लॉन्च व्हीकल को पहले ही इसकी क्षमताओं के लिए ‘बाहुबली’ नाम दिया जा चुका है।

कैसे भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बनेगा यह मिशन?
भारत के लिए यह एक अहम मिशन है, क्योंकि लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3) रॉकेट की छठी उड़ान सफल होने से कमर्शियल स्पेस सेक्टर में भारत की पकड़ और मजबूत होगी। ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 उपग्रह का वजन लगभग 6,500 किलोग्राम है। भारतीय लॉन्च व्हीकल अगर इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देता है तो यह पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित होने वाला सबसे बड़ा वाणिज्यिक संचार उपग्रह होगा।

भारत अपने एलवीएम3 लॉन्च व्हीकल के जरिए चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और वैश्विक स्तर पर सैटेलाइट इंटरनेट मुहैया कराने वाली- वन वेब के सैटेलाइट लॉन्चिंग मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है। वन वेब मिशन में इसरो ने एलवीएम से दो बार में कुल 72 सैटेलाइट्स पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित की थीं।

 मिशन में शामिल सैटेलाइट क्यों खास, दुनिया को क्या हासिल होगा?

1. बिना टावर की रेंज में आए भी मिलता रहेगा सिग्नल
ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 उपग्रह एक अगली पीढ़ी (नेक्स्ट जेन) की प्रणाली का हिस्सा है। अगर यह उपग्रह सही कक्षा में स्थापित हो जाता है और कंपनी के परीक्षण सफल होते हैं तो इसके जरिए 4जी और 5जी स्मार्टफोन पर सीधे सेल्युलर ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिलेगी। उपभोक्ता को किसी अतिरिक्त एंटीना या कस्टमाइज्ड हार्डवेयर की जरूरत नहीं होगी। फिलहाल सेलफोन को 4जी या 5जी नेटवर्क हासिल करने के लिए मोबाइल टावर की जरूरत होती है, लेकिन इस उपग्रह के सफल होने के बाद टावर का काम खत्म हो सकता है।

2. दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच

चूंकि उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाने के साथ कुछ सबसे दूरस्थ स्थानों जैसे हिमालय, महासागरों और रेगिस्तानों तक मोबाइल सेवा पहुंचा सकता है, ऐसे में इन क्षेत्रों में 4जी-5जी नेटवर्क सुविधा पहुंचाना आसान हो जाएगा। इससे वैश्विक स्तर पर डिजिटल असमानता को कम भी किया जा सकता है। यह ग्रामीण क्षेत्रों, खुले पानी और उड़ानों के दौरान नेटवर्क कवरेज की खामियों को खत्म कर सकता है। आमतौर पर इन क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और यहां पहुंच न होने की वजह से पारंपरिक सेल्युलर नेटवर्क यहां फेल हो जाते हैं। इतना ही नहीं आपदा की स्थिति में जब टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर तूफान, बाढ़, भूकंप, भूस्खलन या दूसरी प्राकृतिक आपदाओं में तबाह हो जाते हैं, तब भी सैटेलाइट नेटवर्क बेहतर रहता है। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेश यूनियन डाटा के मुताबिक, 2025 तक दुनियाभर में 200 करोड़ लोग अब भी इंटरनेट या नेटवर्क कवरेज के बिना रहने को मजबूर हैं।

3. बेहतर स्पीड और क्षमता 
इस उपग्रह को 5,600 से ज्यादा व्यक्तिगत सिग्नल सेल बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह 120 मेगाबाइट्स प्रति सेकंड तक की अधिकतम गति (पीक स्पीड) मुहैया कराने में सक्षम है। यह स्पीड वॉइस कॉलिंग, मैसेजिंग, तेज डाटा ट्रांसफर और बिना रुकावट की वीडियो स्ट्रीमिंग के लिए काफी है।

लॉन्च सफल हुआ तो आगे क्या संभावनाएं?

अगर इसरो इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देता है तो इसके आगे सैटेलाइट कंपनी ऑपरेशनल टेस्टिंग को अंजाम देगी। इसके बाद वैश्विक सेवाओं की शुरुआत होगी और अलग-अलग देशों से लाइसेंस हासिल करने की प्रक्रिया शुरू होगी।

1. परीक्षण का चरण
लॉन्च के सफल होने और उपग्रह के स्थापित होने के बाद उपग्रह को पृथ्वी की निचली कक्षा में टेस्ट किया जाएगा। सबसे पहले उपग्रह अपने एंटीना को खोलेगा, जो कि 223 वर्ग मीटर (2400 वर्ग फीट) का होगा। यह पृथ्वी की निचली कक्षा में सबसे बड़ा वाणिज्यिक संचार एंटीना होगा, जिससे बड़े क्षेत्र में डायरेक्ट सिग्नल मुहैया कराए जा सकेंगे। उपग्रह का सही स्थिति में संचालन शुरू होने के बाद वाणिज्यिक सेवाएं शुरू होने से पहले इसका परीक्षण किया जाएगा। इसके लिए कुछ मोबाइल नेटवर्क पहले से तय किए गए हैं।

2. नेटवर्क फैलाने की शुरुआत
कंपनी सबसे पहले अमेरिका में चुनिंदा मोबाइल हैंडसेट में यह सुविधा मुहैया कराने का लक्ष्य रख रही है। हालांकि, बाद में अलग-अलग देशों के नियामकों से मंजूरी मिलने के बाद इसे वैश्विक स्तर पर लॉन्च किया जा सकता है।
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