अमेरिकी टैरिफ के चलते वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंकाओं के बीच एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 के लिए विकास पूर्वानुमान को अपने पूर्ववर्ती अनुमान 6.5 से बढ़ाकर 7.2 फीसदी करने के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में जो सकारात्मक बातें कही हैं, वे उत्साहजनक हैं।
एडीबी की रिपोर्ट में दक्षिण एशिया की विकास दर के अनुमान को 5.9 फीसदी से बढ़ाकर 6.5 फीसदी किया गया है, जिसके पीछे मुख्य वजह रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था के शानदार प्रदर्शन को बताया गया है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के भय, भू-राजनीतिक तनाव और अन्य कई संकटों से जूझ रही है, तब भारत का यह स्थिर व तेज विकास कई देशों के लिए प्रेरणा बन सकता है। ऐसे में एडीबी का यह इशारा उचित ही है कि भारत अब क्षेत्रीय विकास का इंजन बन चुका है।
उल्लेखनीय है कि सितंबर में समाप्त हुई दूसरी तिमाही के दौरान, भारत ने छह तिमाहियों में सबसे अधिक 8.2 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर्ज की, जबकि पहली तिमाही में यह 7.8 फीसदी थी। परिणामस्वरूप, भारत ने चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में आठ प्रतिशत की विकास दर हासिल की है। इसमें संदेह नहीं कि यह वृद्धि मुख्य रूप से हालिया जीएसटी सुधारों से समर्थित मजबूत घरेलू खपत के कारण हुई है। पर यह भी सच है कि डिजिटल इंडिया मिशन, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया व सेमीकंडक्टर मिशन जैसी योजनाओं ने भारत को वैश्विक तकनीकी मूल्य शृंखला में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना दिया है।
इसी कारण आज दुनिया की बड़ी-बड़ी तकनीकी कंपनियां भारत को सिर्फ सॉफ्टवेयर सेवा केंद्र नहीं, बल्कि अनुसंधान, विकास और विनिर्माण का केंद्र मान रही हैं। एपल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और सैमसंग जैसी कंपनियां भारत में अपने उत्पादन आधार को बढ़ा रही हैं। नहीं भूलना चाहिए कि भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है और यूनिकॉर्न कंपनियों की संख्या में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी और असमानता अब भी चुनौतियां पेश कर रहे हैं, लेकिन जीएसटी जैसे संरचनात्मक सुधारों से संकेत मिला है कि भारत इन सबसे पार पाने का माद्दा रखता है। कुल मिलाकर एडीबी की रिपोर्ट कोरे आंकड़े नहीं पेश करती, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसा जगाती है, जो न सिर्फ अपने लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए उम्मीद बन रही है।
फिर रसातल में रुपया……………
भारतीय रुपये की कमजोरी लगातार गहराती जा रही है और यह गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है. यूएस फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती किए जाने के बावजूद रुपये को कोई सहारा नहीं मिल पाया है. हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन यानी शुक्रवार को रुपये में एक बार फिर भारी गिरावट दर्ज की गई और यह 24 पैसे टूटकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90.56 रुपये प्रति डॉलर के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया.
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बनी अनिश्चितता और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार निकासी ने रुपये पर गहरा दबाव डाला है, जिसके चलते निवेशकों की धारणा कमजोर बनी हुई है.
रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना-चांदी जैसी कीमती धातुओं के दाम में तेज उछाल आया है, जिससे आयातकों की ओर से डॉलर की मांग अचानक बढ़ गई. आयात महंगा होने पर कंपनियां अधिक डॉलर खरीदती हैं, जिसके कारण घरेलू मुद्रा और दबाव में आ जाती है. इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में शुक्रवार को रुपया 90.43 पर खुला, लेकिन जल्द ही फिसलकर 90.56 पर पहुंच गया. यह पिछले बंद भाव से 24 पैसे की कमजोरी दर्शाता है.
गुरुवार को भी रुपये में 38 पैसे की बड़ी गिरावट आई थी और वह अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 90.32 पर बंद हुआ था. वहीं, डॉलर इंडेक्स—जो छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती को दर्शाता है—हल्की बढ़त के साथ 98.37 पर पहुंच गया, जिससे रुपए पर अतिरिक्त दबाव बना.
घरेलू शेयर बाजार में आज शुरुआती कारोबार सकारात्मक रहा. सेंसेक्स 170 अंकों की तेजी के साथ 84,988 पर और निफ्टी लगभग 98 अंकों की बढ़त के साथ 25,997 के स्तर पर पहुंच गया. मजबूत शुरुआती बाजार के बावजूद रुपये पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
मिराए एसेट शेयरखान के विश्लेषक अनुज चौधरी का कहना है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर चल रही अनिश्चितता रुपये की गिरावट का सबसे बड़ा कारण है. हालांकि घरेलू बाजार की तेजी और कमजोर अमेरिकी डॉलर ने गिरावट को सीमित करने की कोशिश की, लेकिन निवेशकों की सतर्कता अभी भी कायम है. चौधरी के अनुसार, आने वाले दिनों में रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रहने की आशंका है, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते में देरी से निवेशकों के मन में आशंका बढ़ सकती है. उनका अनुमान है कि डॉलर-रुपया विनिमय दर निकट अवधि में 90.10 से 90.75 के दायरे में रह सकती है. केंद्रीय बैंक द्वारा किसी भी तरह का हस्तक्षेप रुपये को निचले स्तर पर सहारा दे सकता है.
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत 0.67 प्रतिशत बढ़कर 61.69 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई. वहीं, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने गुरुवार को 2,020 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिक्री की, जिससे बाजार पर बिकवाली का दबाव और बढ़ा तथा रुपये पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा.







