भारत और रूस के बीच हुई शिखर वार्ता ऐतिहासिक है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ऐसे समय में भारत यात्रा पर आए हैं, जब पूरी दुनिया में तनाव-दबाव की स्थिति है। स्वयं रूस अनेक देशों के निशाने पर है, यूक्रेन से चल रहा उसका युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। ध्यान रहे, पुतिन बहुत आवश्यक होने पर ही विदेश यात्रा करते हैं और उनकी यह यात्रा न केवल दोनों देशों के संबंधों को बढ़ाएगी, दुनिया को यह संदेश भी देगी कि भारत और रूस हर हाल में साथ खड़े हैं। दोनों देशों की मित्रता तात्कालिक नहीं, स्थायी है। संबंधों की नींव में दशकों की मेहनत और ईमानदारी शामिल है। शिखर वार्ता के बाद दोनों देशों के नेताओं की प्रेस वार्ता भी खास रही है, जिसमें खुद पुतिन ने कहा है कि उनके देश और भारत के बीच गहरे आर्थिक संबंध पूरी तरह स्वाभाविक हैं। स्पष्ट संकेत है, दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ने वाला है। वार्ता का एक बड़ा फलित यह भी है कि दोनों देशों ने साल 2030 तक के लिए अपना आर्थिक कार्यक्रम तय कर लिया है।
जहां दोनों देशों के बीच मित्रता की सहजता या स्वाभाविकता फिर स्पष्ट हुई है, वहीं दोनों देशों ने दुनिया को यह भी संदेश दिया है कि उनके परस्पर संबंध स्वतंत्र हैं। उनके निशाने पर कोई देश नहीं है। यह संदेश विशेष रूप से उन देशों तक पहुंचना चाहिए, जिनकी भारत संबंधी नीतियों में प्रतिकूलता का भाव है। कुछ देश तो भारत पर विशेष रूप से दबाव बनाते हैं कि रूस के साथ अपने संबंधों पर भारत लगाम लगाए। ऐसे में, नई दिल्ली की शिखर वार्ता ने साफ कर दिया है कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र रहेगी। भारत अपने हित में आर्थिक और कूटनीतिक फैसले लेता रहेगा। मतलब, भारत का रूस से तेल खरीदना जारी रहेगा। स्वयं रूसी राष्ट्रपति ने सवाल उठाया है कि यदि अमेरिका को रूसी ईंधन खरीदने का अधिकार है, तो भारत को ऐसी सुविधा क्यों नहीं मिलनी चाहिए? यह तर्क प्रशंसनीय है। दरअसल, कुछ देश भारत के साथ अपने रवैये को पूरी तरह नहीं बदल पा रहे हैं। दूसरी तरफ, भारत के बदलाव को महसूस करते हुए ही पुतिन ने कहा है कि यह 77 साल पुराना भारत नहीं है। पुतिन के ये शब्द उन नेताओं और देशों तक जरूर पहुंचने चाहिए, जो भारत संबंधी अपनी नीतियों को बदलना नहीं चाहते।
अंतत: भारत को यह तो देखना ही होगा कि उसके साथ कौन लगातार खड़ा है। दुनिया के कुछ नेता भारत की अर्थव्यवस्था को मृत बता चुके हैं, जबकि पुतिन ने भारत की धरती से फिर दोहराया है कि रूसी उद्यम भी मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विनिर्माण में भाग लेंगे। रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों का कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते रहना जरूरी है। दोनों के बीच परमाणु, ऊर्जा, तकनीक, सूचना, सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ध्यान रहे, रूस की ओर से ऐसा कोई दबाव नहीं है कि भारत केवल उसके साथ व्यापार बढ़ाए और ऐसा भी नहीं है कि भारत ने वार्ता में अपनी बात मुखरता से न रखी हो। भारतीय प्रधानमंत्री ने यह तो कह ही दिया है कि भारत तटस्थ नहीं है, भारत का एक रुख है और वह शांति के पक्ष में है। यह बयान अपने आप में पर्याप्त है कि रूस को युद्ध रोकने के लिए प्रयास बढ़ाने चाहिए। स्वयं रूस को यह अनुभव होना चाहिए कि लगातार चल रहे युद्ध की वजह से उसका विकास प्रभावित हो रहा है। यहां तक कि भारत को भी रक्षा व अन्य प्रकार के उत्पाद मिलने में देरी हो रही है। एक शांत-विकसित रूस एक शांत-विकसित भारत के लिए जरूरी है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (व्लाद्जिमीर पूत्चिन) की भारत यात्रा इस सदी की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में एक मानी जा सकती है। ऐसे वक्त में, जब रूस से संबंध आगे न बढ़ाने को लेकर भारत पर अमेरिका के साथ-साथ यूरोप के कई देशों का दबाव था, तब नई दिल्ली ने न सिर्फ गर्मजोशी के साथ राष्ट्रपति पुतिन की अगवानी की, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद प्रोटोकॉल तोड़कर उनका स्वागत करने के लिए पालम हवाईअड्डे पर पहुंचे। यह मेजबानी उन देशों को आईना दिखा रही थी, जो भारत-रूस दोस्ती पर सवाल उठा रहे थे। यह उनको संदेश था कि आज का भारत वह नहीं है, जो किसी दूसरे देश के दबाव में आकर अपनी दिशा तय करेगा।
शुक्रवार को हुई भारत-रूस 23वीं शिखर बैठक में कई जरूरी समझौते हुए। स्वास्थ्य, मेडिकल शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, समुद्री सहयोग, खाद, कृषि, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज आदि क्षेत्रों में हुए समझौते तो खासा महत्वपूर्ण हैं। असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। भारत ने जहां आलू और अनार के निर्यात को बढ़ाने की मंशा जताई, तो रूसी सेब में भी दिलचस्पी दिखाई है। इसके अलावा, एमएसएमई और शोध-कार्यों में भी पारस्परिक रूप से आगे बढ़ने पर बात बनी है। वीजा नियमों को आसान बनाने और जन-शक्ति समझौते के अनुरूप बेहतर अवसर की तलाश में रूस जाने वाले भारतीयों की मुश्किलों को दूर करने, उनकी सुरक्षा और सुविधाओं पर भी सार्थक चर्चा हुई। इस शिखर बैठक में नए समझौते तो हुए ही, पूर्व की सहमतियों पर किस तरह आगे बढ़ा जाए, उस पर भी चर्चा हुई।
राष्ट्रपति पुतिन की इस यात्रा में एक अच्छी बात यह भी रही कि वह अकेले नहीं आए। उनके साथ बड़ी संख्या में रूसी नागरिक, व्यापारी भी भारत पहुंचे, जो यहां से जुड़ना चाहते हैं और अपना कारोबार बढ़ाना चाहते हैं। यह बताता है कि रूस ‘पीपुल-टु-पीपुल कॉन्टेक्ट’ यानी लोगों के आपसी जुड़ाव को बढ़ाना चाहता है। भारत ने भी उसे निराश नहीं किया। राजधानी दिल्ली में ही गुरुवार और शुक्रवार को तमाम तरह के आयोजन हुए, जो संकेत है कि भारत ने रूसियों का खुले दिल से स्वागत किया है।
भारत-रूस संबंध में ऊर्जा एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। यह ऐसा मसला है, जिस पर पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका की भवें तन जाती हैं। उनकी आपत्ति मॉस्को से तेल खरीदने को लेकर है। गौरतलब है कि अमेरिका स्वयं रूस से तेल, खाद और अन्य चीजें खरीदता है, लेकिन दूसरे देशों पर आपत्ति जताता है। भारत सबसे अधिक तेल रूस से ही खरीदता है। हालांकि, पिछले दिनों इस आयात में कुछ कमी आई है, जिसे पश्चिम के देश अपने दबाव का नतीजा बता रहे हैं, लेकिन यह समझना चाहिए कि आपसी व्यापार बहुत हद तक जरूरतों के हिसाब से चलता है। तेल भी अपवाद नहीं है।
अगर भारत और रूस में कोई विवाद होता, तो रूस उन भारतीय रुपयों को भारत में निवेश करने की पहल नहीं करता, जो उसे तेल के बदले मिले हैं। जो लोग नहीं जानते, उनको बता दूं कि भारत अपनी मुद्रा, यानी रुपये में ही रूस से तेल खरीदता है। इसलिए, इस रिश्ते में यदि कोई छोटी-मोटी दिक्कतें होंगी भी, तो वे इस मुलाकात से दूर हो चुकी हैं।
शिखर बैठक के बाद जब राष्ट्रपति पुतिन बयान दे रहे थे, तब उन्होंने रुपये और रूबल (रूस की मुद्रा) में व्यापार बढ़ाने पर खासा जोर दिया। उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ में सहयोग करने और नया लॉजिस्टिक मार्ग बनाने की भी बात कही। यह बताता है कि भारत की आर्थिक जरूरतों को रूस बखूबी समझता है और बंद कमरे में जब दोनों शीर्ष नेता मिले, तो उन्होंने इस पर सार्थक बातचीत की है। हालांकि, रूस की जरूरतों से भारत भी गाफिल नहीं है।
इस मुलाकात में विजन 2030 की चर्चा भी की गई। यह भारत और रूस के बीच आर्थिक और व्यापार सहयोग से जुड़ा दस्तावेज है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच व्यापार और पूंजी निवेश बढ़ाने के साथ-साथ आवागमन व उद्योग सहित तमाम संबद्ध क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाना है। आज दोनों देशों के बीच करीब 65 अरब डॉलर का कारोबार होता है। इसे एक साल में 100 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। निवेश हो या निर्यात, सहमति यही बनी है कि साल 2030 तक आर्थिक व व्यापारिक सहयोग के बड़े लक्ष्य हासिल कर लिए जाएंगे। इसके लिए दोनों देश मिलकर प्रयास करेंगे।
इस यात्रा में वीजा पर बनी सहमति भी महत्वपूर्ण है। शिखर वार्ता में यह भी तय हुआ कि जल्द ही रूस और भारत में 30 दिनों के लिए ‘टूरिस्ट ग्रुप वीजा’ नि:शुल्क उपलब्ध होगी। व्यक्तिगत पर्यटक वीजा के नियमों को भी और सरल किया जाएगा। शिक्षा, पर्यटन, होटल जैसे तमाम क्षेत्रों में आपसी संपर्क बढ़ाने पर भी भारत और रूस सहमत हुए हैं। भारत यात्रा के दौरान ही राष्ट्रपति पुतिन ने नया रूसी समाचार चैनल ‘आरटी इंडिया’ लॉन्च किया। उन्होंने कहा कि यह चैनल ‘केवल पश्चिमी’ खबरों का विकल्प होगा। अभी तक भारत में अधिकतर खबरें पश्चिम से पहुंचती हैं। यह वैसा ही है, जैसे हॉलीवुड फिल्मों में अक्सर रूस को विलेन और पश्चिमी देशों को हीरो दिखाया जाता है।
कुल मिलाकर, यह यात्रा लोगों के आपसी जुड़ाव को नई ऊंचाई देता दिखा है। कई एमओयू पर हुए दस्तख्त भी इसकी तस्दीक कर रहे हैं।







