हिंदी सिनेमा के ‘ही-मैन’ धर्मेंद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 89 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, और उनके साथ ही हिंदी फिल्म उद्योग के एक महत्वपूर्ण युग का भी अंत हो गया। वे लंबे समय से बीमार थे और कुछ दिन पहले ही उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सांस लेने में दिक्कत बढ़ने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। इस दौरान पूरा देओल परिवार मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में मौजूद रहा, और कई बॉलीवुड सितारे भी उनका हाल जानने पहुँचे। सलमान खान से लेकर शाहरुख खान तक कई बड़ी हस्तियां उनसे मिलने आईं। बाद में उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन घर पर भी वे लगातार डॉक्टरों की निगरानी में थे।
12 नवंबर को हॉस्पिटल से हुए थे डिस्चार्ज
दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र को 12 नवंबर को ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किया गया था। वो दो दिन वैंटिलेटर पर थे। धर्मेंद्र को सांस लेने में तकलीफ थी, जिसके चलते उन्हें मुंबई के कैंडी हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया था।
धर्मेंद्र को आखिरी विदाई देने पहुंचे आमिर खान
सुपरस्टार आमिर खान भी ही-मैन धर्मेंद्र को अंतिम विदाई देने के लिए श्मशान घाट पुहंचे।
श्मशान घाट पहुंचे अमिताभ बच्चन
धर्मेंद्र को अंतिम विदाई देने अमिताभ बच्चन भी श्मशान घाट पहुंचे। उनके साथ उनके बेटे और अभिनेता अभिषेक बच्चन भी साथ दिखाई दिए।
धर्मेंद्र का करियर
धर्मेंद्र ने 1960 में अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। उनकी पहली फिल्म “दिल भी तेरा हम भी तेरे” थी जो 1960 में रिलीज हुई थी। इसके बाद हीमैन 1961 में आई फिल्म “बॉय फ्रेंड” में सपोर्टिंग रोल में नजर आए। पूरे 65 साल तक एक्टिव रहते हुए धर्मेंद्र ने हिंदी सिनेमा को कई हिट, सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। अपने करियर में उन्होंने शोले (1975), चुपके-चुपके (1975), सीता और गीता (1972), धरमवीर (1977), फूल और पत्थर (1966), जुगनू (1973) और यादों की बारात (1973) जैसी यादगार फिल्मों में काम किया, जो आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हैं।
करण जौहर ने दी श्रद्धांजलि
फिल्ममेकर करण जौहर ने भी दिग्गज अभिनेता को श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने धर्मंद्र की एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो शेयर की और कैप्शन में लिखा- ‘एक युग का अंत… एक बडे़ मेगास्टार। मुख्यधारा के सिनेमा में एक नायक का अवतार… अविश्वसनीय रूप से सुंदर और सबसे रहस्यमय स्क्रीन उपस्थिति… वह भारतीय सिनेमा के एक वास्तविक किंवदंती हैं और हमेशा रहेंगे… सिनेमा के इतिहास के पन्नों में परिभाषित और समृद्ध रूप से मौजूद हैं… लेकिन सबसे बढ़कर वह सबसे अच्छे इंसान थे… उन्हें हमारे उद्योग में हर कोई बहुत प्यार करता था… उनके पास सभी के लिए केवल अपार प्रेम और सकारात्मकता थी।’
आधी सदी से ज्यादा के अपने करियर में धर्मेंद्र कम से कम दो पीढ़ियों के चेहेते स्टॉर रहे हैं. उनकी जिंदादिली ही थी जो गठीले और रौबदार पर्सनालिटी के बावजूद उन्हें रुमानियत के रोल में भी फिट कर देती थी. जबकि दूसरे भारी-भरकम पहलवान नुमा एक्टर्स पर ये इमेज ओढ़ी हुई दिखने लगती थी. हां, विनोद खन्ना और फिरोज खान के साथ रुमानियत फबती थी लेकिन इन दोनों पर कॉमेडी वाली भूमिकाएं उस तरह नहीं फबती थीं जैसी धर्मेंद्र पर.
कई जगहों पर धर्मेंद्र ने खुद कहा है कि वे ईमानदार शरारती थे. यानी हंसी मजाक की हद तक छेड़छाड़ उनके स्वभाव में था. पहले से प्रकाश कौर से शादी शुदा धर्मेंद की पसंदीदा हिरोइन मीना कुमारी थी. मीना कुमारी से उनकी नजदीकियों की चर्चाएं भी उस दौर में होती रहती थी. कमाल अमरोही पर एक बार एक सवाल का जबाव देते हुए धर्मेंद्र ने बड़ी सहजता से मान लिया था लोग जलने वाले होते हैं. कमाल अमरोही मीना कुमारी के पति थे. कहा जाता है कि उन्होंने धर्मेंद्र को एक फिल्म में मीना कुमारी और उनकी नजदीकियों के चलते ही नहीं शामिल किया था. ये भी धर्मेंद्र की शख्तियत का एक अहम पहलू था कि पहली बीबी के रहते दूसरी शादी हेमा मालिनी से की लेकिन प्रकाश कौर से भी निभाया. खुद प्रकाश कौर को उनसे शिकायत नहीं रही.
पंजाब की ठेढ तहजीब से निकल युवा धर्मेंद्र ने पर्दे पर सूटेड बूटेड जेंटल मैन के यादगार रोल तो किए ही. उन्होंने डकैतों की कहानियां पढ़ और सुन चुके सिनेमा दर्शकों को बागी और अपनी हूकूमत चलाने वाले डकैतों के दर्शन भी करा दिए. डैकेत के रोल में घोड़े पर बेहतरीन असलहे लेकर चलने वाले धर्मेंद्र को देख कर लोगों ने मान ही लिया कि पुराने वक्त के डकैत ऐसे ही होते रहे होंगे.
हालांकि इसके बाद सत्यकाम जैसी फिल्म धर्मेंद्र को मिली, जिसने उनकी लाजवाब एक्टिंग लोगों के दिलों को छू गई. फिल्म ने बहुत उल्लेखनीय व्यवसाय नहीं किया, लेकिन ये हिंदी फिल्मों के लिए मील का पत्थर साबित हुई. सत्यकाम की कहानी उस पीढ़ी और वक्त दोनों के संघर्ष की कहानी लगती है. आदर्शों – संस्कारों की कुटिया से निकल कर बाहरी दुनिया में कदम रखने वाले किसी आदर्शवादी युवा की परेशानी को फिल्म में बारीकी से उकेरा गया है. यहां तक कि अपने ही आदर्शों के चलते किरदार अपराधबोध तक पहुंच जाता है. दौर के साथ उसके उतार-चढ़ाव को आज भी लोग उसी शिद्दत से याद करते हैं.







