बिहार विधानसभा चुनाव में फर्स्ट फेज की 121 सीटों पर 6 नवंबर को वोटिंग होनी है। इस दौरान तिरहुत, शाहाबाद और अंग की कुल 63 सीटों पर वोटिंग होगी। इन सीटों में महागठबंधन के CM कैंडिडेट तेजस्वी यादव की सीट राघोपुर का फैसला भी होना है।
इसके अलावा लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव महुआ से, रघुनाथपुर से शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब, तारापुर सीट से डिप्टी CM सम्राट चौधरी, सीवान सीट से JDU लीडर और मंत्री मंगल पांडे भी मैदान में हैं।
रुझानों की खास बातें 1. महागठबंधन को फर्स्ट फेज में तिरहुत, शाहाबाद और अंग की 63 सीटों पर 17-18 सीटों का नुकसान होता नजर आ रहा है। RJD को 6, कांग्रेस को 5 और CPI-ML को दो सीटों का नुकसान होता नजर आ रहा है। 2020 के चुनाव में महागठबंधन के पास इन 63 में से 39 सीटें थीं, जो अब घटकर 22-23 होने का रुझान है।
2. NDA इन 63 सीटों पर फायदे में नजर आ रहा है। JDU की वापसी हो रही है, लेकिन LJP-R को नुकसान हो रहा है। BJP को 5 और JDU को 10 सीटों का फायदा नजर आ रहा है। NDA इन 63 सीटों में से 38-39 पर आगे है। 2020 में उसे 24 सीटें मिली थीं।
फेज-1 की सभी 121 सीटों के रुझानों की खास बातें
1. पहले फेज की 121 सीटों में महागठबंधन को 19 से 21 सीटों का नुकसान होता दिख रहा है। सबसे ज्यादा नुकसान RJD को हो सकता है। 2020 के मुकाबले उसकी 9-10 सीटें घट सकती हैं। कांग्रेस को 6, VIP को 4, CPI-MLको 3 और CPI-CPM को 1-1 सीट का नुकसान होता दिख रहा है।
2. इन 121 सीटों पर NDA को 17-19 सीटों का फायदा दिख रहा है। JDU 12 सीटों पर आगे दिख रही है। BJP में 9 से 10 सीटों का फायदा होता दिख रहा है। LJP पिछले चुनाव की तरह एक सीट पर आगे दिख रही है। दो सीटों अन्य के खाते में जाते दिख रही हैं।
रुझानों पर एक्सपर्ट्स क्या कह रहे
1. महिलाओं ने करा दी JDU की वापसी अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ के बिहार हेड अमरनाथ तिवारी के मुताबिक, ‘नीतीश के आगे होने का सीधा सा कारण इस बार उनकी DBT यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम्स हैं। इनके जरिए सरकार लोगों के खाते में पैसा पहुंचा रही हैं।’
अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के बिहार हेड संतोष सिंह भी इस बात से इत्तफाक रखते हैं। वे कहते हैं, ‘जमीन पर नीतीश कुमार का असर है। BJP का संगठन उसकी ताकत है। महिला वोट NDA और नीतीश के साथ बना हुआ है।’
सेफोलॉजिस्ट और वोट वाइब के फाउंडर अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘महिला वोट नीतीश के साथ है। सरकार ने 1.21 करोड़ महिलाओं को 10-10 हजार रुपए डिस्ट्रीब्यूट किए हैं। ये बिहार की कुल महिला वोटर का 35% हैं।’
भारत में एक परिवार में तीन वोटर माने जाते हैं। 1.21 करोड़ महिलाओं के हिसाब से देखें, तो ये योजना 3.63 करोड़ वोटर्स पर असर करेगी। बिहार में कुल 7.4 करोड़ वोटर हैं, यानी ये स्कीम आधे वोटर बेस को इम्पैक्ट करती है।
2. नीतीश की DBT स्कीम्स करा रहीं NDA को फायदा न्यूज एजेंसी ANI के बिहार हेड मुकेश सिंह चुनाव में NDA और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर मानते हैं। वे कहते हैं, ‘रिजल्ट आखिर में 15 से 20 सीटों के अंतर पर जाकर टिकेगा। 2020 के चुनाव की तरह ही इस बार भी करीबी मामला है। इस करीबी लड़ाई के पीछे नीतीश की योजनाओं का ग्राउंड पर असर है।’
‘10 हजार रुपए सीधे अकाउंट में जा रहे हैं, फ्री बिजली का असर भी लोगों में दिख रहा है। इसमें दो राय नहीं कि कहीं न कहीं वोटर प्रभावित हुए हैं। उनके मन में एक डर भी है कि नीतीश या NDA की सरकार नहीं आएगी, तो 10 हजार रुपए मिलना बंद हो जाएंगे।’
हालांकि सेफोलॉजिस्ट योगेंद्र यादव इस तरह की स्कीम्स को घातक बताते हैं। वे कहते हैं, ‘अब सब जगह पर घूस की परंपरा बन गई है। ये पहले मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में हुआ, अब बिहार में भी वही दिख रहा है। चुनाव से पहले सीधे लोगों को पैसा ट्रांसफर कर देते हैं। इससे हर चुनाव में सत्ताधारी दल को ही फायदा होगा। वे चुनाव से कुछ दिन पहले घूस दे देंगे। ये चिंताजनक स्थिति है।’
हालांकि, योगेंद्र ये मानते हैं कि बिहार की DBT स्कीम्स खासकर जीविका से चुनाव में रूलिंग पार्टी यानी NDA को फायदा होता नजर आ रहा है।
3. चिराग से NDA मजबूत, सहनी का वोट नहीं लौटा पटना यूनिवर्सिटी के पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन विभाग की डायरेक्टर प्रो. शेफाली रॉय NDA को मजबूत स्थिति में मानती हैं। वे कहती हैं, ‘गठबंधनों के जातिगत कॉम्बिनेशन में NDA इस बार बेहतर है। महागठबंधन में कास्ट बेस वाले वोटर्स बहुत सीमित सीटों पर हैं, लेकिन JDU और BJP काफी डायवर्सिफाइड हैं। इसमें अपर कास्ट से लेकर शहरी वोटर फिर कुशवाहा और मंडल तक शामिल हैं। इसलिए NDA आगे दिख रहा है। चिराग के आने से फायदा होता दिख रहा है।’
न्यूज एजेंसी ANI के बिहार हेड मुकेश सिंह भी प्रो. शेफाली रॉय की बात से इत्तफाक रखते हैं। वे कहते हैं, ‘चिराग पासवान के आने से NDA को फायदा होगा, लेकिन दूसरी तरफ मुकेश सहनी के महागठबंधन में आने के बावजूद उनका वोटबैंक वापस आता नहीं दिख रहा। ये साफ है कि चिराग जिधर, सारे पासवान वोट उधर ट्रांसफर हो जाएंगे।’
‘मुकेश सहनी की गलती से उनके वोटबैंक का बड़ा हिस्सा NDA में शिफ्ट हो चुका है। मिथिलांचल में निषाद NDA को वोट कर रहे हैं। मुकेश सहनी के महागठबंधन में जाने से कुछ हिस्सा टूटकर उनके साथ आ सकता है, लेकिन 50-50 का मामला है।’
4. महागठबंधन के लिए कांग्रेस कमजोर कड़ी सेफोलॉजिस्ट और वोट वाइब के फाउंडर अमिताभ तिवारी के मुताबिक, ‘2020 में NDA में JDU और महागठबंधन में कांग्रेस कमजोर कड़ी थी। इस बार का पूरा चुनाव 55 सीटों पर निर्भर नजर आ रहा है। इन पर कांग्रेस BJP और JDU के खिलाफ लड़ रही हैं।’
‘पिछली बार JDU और कांग्रेस का सबसे खराब स्ट्राइक रेट था। कांग्रेस और JDU के बीच मुकाबले वाली सीटों पर JDU ने अच्छा परफॉर्म किया था। महागठबंधन का पूरा चुनाव कांग्रेस के परफॉर्मेंस पर निर्भर करेगा।’
प्रो. शेफाली रॉय भी महागठबंधन में कांग्रेस को कमजोर कड़ी मानती हैं। उनके मुताबिक कांग्रेस डबल डिजिट से भी नीचे आकर 9 सीटों पर सिमट सकती है। इसके पीछे वे फ्रेंडली फाइट और खराब टिकट डिस्ट्रीब्यूशन को कारण बताती हैं।
वे कहती हैं, ’कांग्रेस ने शुरू से ही CM फेस घोषित नहीं किया, इससे असमंजस की स्थिति बनी। सीट डिस्ट्रीब्यूशन में भी नाराजगी रही। हालत ये है कि 8 जगह फ्रेंडली फाइट है। इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना होगा। कांग्रेस डबल डिजिट में चली जाए, तो बड़ी बात है।’
बड़ी सीटों के रुझान
1. राघोपुर में तेजस्वी के सामने कोई चैलेंज नहीं
वैशाली जिले की राघोपुर सीट पर इस बार भी महागठबंधन के CM कैंडिडेट तेजस्वी यादव बड़े अंतर से आगे नजर आ रहे हैं। दूसरे नंबर पर यहां BJP के सतीश यादव हैं। यहां से जन सुराज के चंचल सिंह और जनशक्ति जनता दल के प्रेम यादव भी मैदान में हैं। हालांकि इससे तेजस्वी पर फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है।
वजह 1. राघोपुर सीट पर करीब 35% यादव वोटर्स हैं। इसके बाद करीब 18% दलित और इतने ही सवर्ण वोटर्स हैं। यादव वोटर्स की वजह से 1998 के बाद से यहां RJD का दबदबा रहा है। इस सीट पर 5% मुस्लिम वोटर्स भी हैं।
2. तेजस्वी ने यहां सिक्स लेन पुल, अस्पताल का रेनोवेशन जैसे काम कराए हैं। इससे लोग खुश हैं। हालांकि उम्मीद के मुताबिक काम न होने से काफी लोगों में नाराजगी भी है। सरकार बनने के बाद माई-बहन योजना लागू करने के वादे का भी असर है।
3. BJP के सतीश यादव 2010 में इस सीट पर राबड़ी देवी को हरा चुके हैं। दलित, राजपूत अगर संगठित होकर वोट करेंगे, सिर्फ तभी NDA इस सीट को जीत सकता है।
पिछला हिसाब-किताब पहली बार जनता दल के टिकट पर लालू ने 1995 में ये सीट जीती थी। 1998 में उपचुनाव हुए, तो राजगीर चौधरी विधायक बने। साल 2000 में फिर लालू यहां से जीते, लेकिन चारा घोटाले में आरोप तय होने के बाद उन्हें ये सीट छोड़नी पड़ी। फिर अगले 10 साल राबड़ी देवी विधायक रहीं।
2010 में सतीश यादव ने राबड़ी देवी को हरा दिया। तब वे JDU में थे। 2015 में तेजस्वी ने सतीश यादव को हराकर ये सीट जीत ली। तब से वही यहां के विधायक हैं।
2. महुआ में तेजप्रताप बड़े अंतर से आगे
वैशाली जिले की महुआ सीट पर लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल (JJD) की तरफ से मैदान में हैं। RJD ने उनके सामने मौजूदा विधायक मुकेश रौशन को उतारा है।
NDA से LJP(R) के संजय कुमार सिंह और जन सुराज से इंद्रजीत प्रधान कैंडिडेट हैं। JDU से टिकट न मिलने पर आसमां परवीन निर्दलीय चुनाव मैदान में हैं। हालांकि इस सीट से तेजप्रताप बड़े अंतर से आगे नजर आ रहे हैं।
वजह 1. महुआ RJD की मजबूत सीट है, जिसका सीधा फायदा तेजप्रताप को मिल रहा है। यहां लोग पार्टी नहीं, लालू के बेटे को वोट कर सकते हैं। तेजप्रताप इस इलाके में काफी पॉपुलर भी हैं।
2. तेजप्रताप ने यहां मेडिकल कॉलेज बनाया है। इसके अलावा सड़क और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का काम भी कराया है, जिससे लोग काफी खुश हैं।
3. RJD का वोट बैंक भी तेजप्रताप के फेवर में है। NDA की तरफ से मैदान में उतरे LJP-R कैंडिडेट संजय सिंह दूसरे नंबर पर चल रहे हैं।
पिछला हिसाब-किताब महुआ विधानसभा सीट पर RJD का लंबे समय से दबदबा रहा है। 2010 को छोड़कर 2000 से अब तक यहां RJD ही जीती है। 2015 के चुनाव में तेज प्रताप यादव जीते थे। 2020 में RJD के मुकेश कुमार रौशन जीते। 1977 के बाद से इस सीट पर कभी कांग्रेस या BJP नहीं जीती।
3. तारापुर में सम्राट चौधरी आगे
मुंगेर जिले की तारापुर सीट से BJP नेता और डिप्टी CM सम्राट चौधरी मैदान में हैं। महागठबंधन में शामिल VIP के कैंडिडेट सकलदेव बिंद ने आखिरी मौके पर BJP का समर्थन कर सम्राट चौधरी को और मजबूत बना दिया है। सम्राट के मुकाबले में यहां RJD के अरुण कुमार साव हैं।
वजह 1. ये सीट पहले कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी, लेकिन बीते 15 साल से इस सीट पर JDU का कब्जा रहा है। इसका सीधा फायदा सम्राट चौधरी को हो रहा है।
2. इस सीट पर कुशवाहा वोटर्स की आबादी सबसे ज्यादा है, ये BJP और JDU का वोटबैंक है।
3. RJD कैंडिडेट अरुण साव, सम्राट को कड़ी टक्कर दे सकते हैं, लेकिन चिराग और उपेंद्र कुशवाहा का साथ होना सम्राट के लिए फायदेमंद साबित होगा।
पिछला हिसाब-किताब इस सीट पर आजादी के बाद से 19 बार चुनाव हो चुका है, जिसमें दो उपचुनाव भी शामिल हैं। शुरुआत में कांग्रेस 5 बार जीती थी, लेकिन 1990 के बाद RJD ने 3 और JDU ने 4 बार जीत हासिल की है। 2021 के उपचुनाव में यहां JDU के राजीव कुमार ने RJD के अरुण साव को हराया था। 2020 में ये सीट JDU के मेवा लाल चौधरी ने जीती थी।
4. रघुनाथपुर में ओसामा को मिल रही कड़ी टक्कर
सीवान जिले की रघुनाथपुर सीट से इस बार बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब मैदान में हैं। ये RJD की मजबूत सीट है। लगातार दो बार से हरिशंकर यादव यहां से जीत रहे हैं। हरिशंकर के कहने पर ही यहां से ओसामा को टिकट मिला है। इस सीट पर JDU के जीशु सिंह कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
वजह 1. ओसामा को शहाबुद्दीन की लेगेसी का फायदा मिल सकता है। इसके अलावा RJD का मजबूत होना उनके पक्ष में है। ओसामा के उतारने से MY वोट बैंक और संगठित नजर आ रहा है।
2. रघुनाथपुर क्षेत्र के हुसैनगंज का प्रतापपुर शहाबुद्दीन परिवार का पुश्तैनी गांव है। यहां की सियासत पर शहाबुद्दीन परिवार की पकड़ है।
3. रघुनाथपुर विधानसभा सीट पर 23% मुस्लिम और 10% राजपूत वोटर हैं। 12% यादव वोटर्स भी हैं।
पिछला हिसाब-किताब रघुनाथपुर सीट पर 7 बार कांग्रेस का कब्जा रहा। साल 1952, 1962 और 1969 में कांग्रेस के रामानंद यादव जीते। इसके बाद रामदेव सिंह दो बार 1957 और 1967 में जीते और 1972 में श्रीनिवासन सिंह विधायक चुने गए। साल 1977 में विक्रम कुंवर यहां से जीते।
1980, 1985 और 1990 में जीत की हैट्रिक लगाने वाले कांग्रेस के विजय शंकर दुबे आखिरी बार 2000 में ये सीट जीते थे। 2005 में वे निर्दलीय जगमातो देवी से हार गए। 2010 में नए परिसीमन के बाद इस सीट पर BJP के विक्रम कुंवर जीते। 2015 में RJD से हरिशंकर यादव ने यहां जीत हासिल की और 2020 में भी वही चुने गए।
5. बक्सर में सुपरकॉप आनंद मिश्रा मजबूत
इस सीट से BJP ने आनंद मिश्रा को टिकट दिया है। असम-मेघालय कैडर के पूर्व IPS अधिकारी आनंद मिश्रा सुपरकॉप कहे जाते हैं। VRS लेकर 2024 में बक्सर से निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए थे। उनके सामने कांग्रेस के संजय कुमार तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी हैं। मुन्ना तिवारी लगातार दो बार से विधायक हैं। फिलहाल आनंद मिश्रा यहां आगे दिख रहे हैं।
वजह 1. आनंद मिश्रा युवाओं में पॉपुलर हैं, उनकी इमेज भी अच्छी है।
2. बक्सर में ब्राह्मण-यादव कम्युनिटी का दबदबा है। सवर्ण NDA के कोर वोटर हैं।
3. कांग्रेस में अंतर कलह है, 30-35% यादव वोट में भी नाराजगी दिख रही है।
पिछला हिसाब-किताब बक्सर सीट का चुनावी इतिहास बताता है कि ये सीट सिर्फ गठबंधन की लहर पर नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ पर चलती रही है। बाहुबली इमेज वाले कांग्रेस के संजय कुमार तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी इस सीट से विधायक हैं। 2015 और 2020 में उन्हें लगातार जीत मिली। 2020 में मुन्ना तिवारी ने BJP के परशुराम चौबे को 3892 वोट से हराया था।







