अपने दूसरे कार्यकाल के बमुश्किल नौ महीने पूरे होने पर ट्रंप ने ऐसे तीन फैसले लिए हैं, जो अदूरदर्शी राष्ट्रवाद और घरेलू दिखावे से प्रेरित नीति-निर्माण को उजागर करते हैं। एच-1बी वीजा शुल्क को बढ़ाकर, चाबहार बंदरगाह पर भारतीय संचालन की छूट को रद्द कर, और सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौते को मौन स्वीकृति देकर ट्रंप घरेलू मतदाताओं को आकर्षित कर राष्ट्रवादी रुख का संकेत दे रहे हैं, पर वह अमेरिकियों के हितों को ठेस भी पहुंचा रहे हैं। ये कार्रवाइयां दशकों की रणनीतिक योजना, क्षेत्रीय प्रभाव और भारत-अमेरिका साझेदारी के लिए खतरा हैं।
हरेक एच-1बी आवेदन पर एक लाख डॉलर शुल्क लगाने का ट्रंप का फैसला हथौड़े जैसा है। इसे ‘अमेरिकी कामगारों की सुरक्षा’ कहकर प्रचारित किया जा रहा है, पर इससे अमेरिकी नवाचारों के नष्ट होने और भारत-अमेरिका संबंधों के निचले स्तर पर जाने का खतरा है। भारत पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। अमेरिका में लगभग तीन लाख भारतीय पेशेवर हैं, जिनके सामने रोजगार का खतरा पैदा हो सकता है। अमेरिका में नौकरी की योजना बना रहे लोगों को अपने कॅरिअर में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। भारत स्वास्थ्य और अनुसंधान एवं विकास में छूट पर बातचीत करने, वाशिंगटन में कॉर्पोरेट लॉबिंग का लाभ उठाने तथा यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया से साझेदारी करने का विकल्प चुन सकता है। भारत को स्टार्ट-अप्स का विस्तार, अनुसंधान और विकास को मजबूत करने, और वहां से वापस लौटने वाली प्रतिभाओं के लिए मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र बनाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। एच-1बी शुल्क भले ही अमेरिका को वित्तीयम लाभ प्रदान करे, लेकिन वैश्विक प्रतिभाओं पर कर लगाकर अमेरिका अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है। भारत को इस झटके को रणनीतिक आत्मनिर्भरता के अवसर में बदलना होगा।
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रियाद में हुए रक्षा समझौते ने दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को झटका दिया है। इससे पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था और सैन्य स्थिति को मजबूती मिलेगी, साथ ही यह चीन की पश्चिम एशियाई रणनीति से मेल खाता है।
नई दिल्ली ने सावधानीपूर्वक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए माना है कि उसे इस समझौते के बारे में पता था। यह संयम भारत के संतुलनकारी रवैये को दर्शाता है। सऊदी अरब भारत का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ता होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार भी है। इस समझौते के बाद सऊदी अरब का समर्थन पाकिस्तान को सीमा पार से प्रायोजित आतंकवादी समूहों को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए उकसा सकता है, जबकि इस्लामी एकजुटता का दिखावा चरमपंथी नेटवर्क को सक्रिय कर सकता है।
यह समझौता पिछले पांच वर्षों में सऊदी अरब के साथ विकसित हुए भारत के संबंधों को और जटिल बना देता है। चीन को इससे चुपचाप लाभ मिल रहा है, क्योंकि यह समझौता सीपीईसी को मजबूत कर रहा है और खाड़ी क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ा रहा है, जिससे यह क्षेत्र अमेरिकी प्रभुत्व से दूर हो रहा है। भारत के सामने खाड़ी देशों के साथ अपनी साझेदारी बनाए रखने, आतंकवाद-रोधी समन्वय को मजबूत करने और अमेरिका, रूस और इस्राइल के साथ बहुध्रुवीय कूटनीति का लाभ उठाने की चुनौती है।
चाबहार बंदरगाह पर भारत के संचालन के लिए अमेरिकी छूट को रद्द करने का ट्रंप का फैसला हमारी क्षेत्रीय रणनीति के लिए एक गंभीर झटका है। तेहरान पर ‘अधिकतम दबाव’ बनाने के तहत उठाए गए इस कदम से भारत के 12 करोड़ डॉलर का निवेश खतरे में पड़ गया है और भारत को अफगानिस्तान, रूस और मध्य एशिया से जोड़ने वाला गलियारा भी ठप हो गया है। चाबहार महज एक बंदरगाह ही नहीं, बल्कि यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए एक जीवनरेखा है, चीन के ग्वादर का प्रतिकार है, और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे में एक महत्वपूर्ण स्थल है। यानी चाबहार का रणनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है। बीजिंग ईरान के साथ अपने 400 अरब डॉलर के रणनीतिक समझौते और मध्य एशियाई गलियारों में प्रभुत्व का लाभ उठाकर इस शून्य को भरने के लिए तैयार है। भारत को इस झटके को एक अधिक लचीली क्षेत्रीय रणनीति के अवसर के रूप में बदलना चाहिए।
भारत के सामने तिहरी चुनौती है-अमेरिका में अपनी प्रतिभा और आर्थिक हितों की रक्षा करना, प्रतिबंधों और चीनी अतिक्रमण से क्षेत्रीय संपर्क को सुरक्षित रखना, तथा पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव के बीच खाड़ी संबंधों का प्रबंधन करना। रणनीतिक धैर्य, सक्रिय कूटनीति और घरेलू लचीलापन इससे निपटने की कुंजी हैं। भारत को इन चुनौतियों को अवसरों में बदलना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि ट्रंप के फैसले अंततः उसकी क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिति को कमजोर करने के बजाय मजबूत करें।







