यमन से भारतीय नर्स निमिषा प्रिया के मामले में बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, पता चला है कि यमन के स्थानीय अधिकारियों ने निमिषा प्रिया को मिलने वाली फांसी की सजा को स्थगित कर दिया है। आपको बता दें कि इससे पहले यमन में निमिषा प्रिया को बुधवार 16 जुलाई, 2025 को फांसी की सजा देने का फैसला किया गया था।
सूत्रों के मुताबिक निमिषा मामले में ग्रांड मुफ्ती अबूबकर पीड़ित अब्दो महदी के परिवार से बात कर रहे हैं. पहले दिन की बातचीत सकारात्मक रही, जिसके कारण आगे भी बातचीत की गुंजाइश बची है. इसे देखते हुए यह फांसी टालने का फैसला किया गया है.
यमन के न्याय विभाग ने इससे पहले जेल ऑथोरिटी से 16 जुलाई को निमिषा प्रिया के सजा ए मौत पर अमल लाने के लिए कहा था. निमिषा पर अपने बिजनेस पार्टनर अब्दो महदी की हत्या का आरोप है.
निमिषा को फांसी से बचाने के लिए आगे आने वाले मुस्लिम धर्मगुरु कौन हैं?
भारत के ग्रांड मुफ्ति कंठपुरम एपी अबूबकर मुसलियार आगे आए हैं और निमिषा को बचाने के लिए अपनी कोशिशें तेज की. ग्रांड मुफ्ती के अनुरोध पर यमन में निमिषा को माफी देने पर विचार-विमर्श चल रहा है. जिसका नेतृत्व यमन के प्रसिद्ध सूफी विद्वान शेख हबीब उमर कर रहे हैं. शेख हबीब के प्रतिनिधि हबीब अब्दुर्रहमान अली मशहूर ने उत्तरी यमन में सोमवार को यमनी सरकार के प्रतिनिधि, आपराधिक न्यायालय के सर्वोच्च न्यायाधीश, तलाल के भाई और आदिवासी नेताओं से मुलाकात की है. जिसके बाद हर कोई जनना चाह रहा है कि ग्रांड मुफ्ति कंठपुरम एपी अबूबकर मुसलियार कौन हैं?
कौन हैं भारत के ग्रांड मुफ्ती अबूबकर?
शेख अबूबकर अहमद, जिन्हें कंठपुरम एपी अबूबकर मुसलियार के नाम से भी जाना जाता है, भारत के दसवें ग्रांड मुफ्ती हैं, जो भारत में सुन्नी मुस्लिम समुदाय के एक प्रमुख लोगों में से एक हैं. अबूबकर अहमद का जन्म केरल के कोझिकोड में 22 मार्च, 1931 को हुआ था. उन्हें 24 फरवरी, 2019 को अखिल भारतीय तंज़ीम उलेमाए इस्लाम की ओर से नई दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित गरीब नवाज़ शांति सम्मेलन में ग्रांड मुफ्ती चुना गया. उन्होंने ये पद जुलाई 2018 में 9वें ग्रांड मुफ्ती, मुहम्मद अख्तर रजा खान कादरी के निधन के बाद ग्रहण है. वह इस पद के लिए दक्षिण भारत से आने वाले पहले मौलवी हैं.
क्या काम करते हैं भारत के ग्रांड मुफ्ती?
भारत के ग्रांड मुफ्ती देश ही नहीं बल्कि दुनिया में एक खास अहमियत रखते हैं. उनकी भूमिका फतवे (इस्लामी कानूनी राय) जारी करने और धार्मिक एवं सामाजिक मामलों पर मार्गदर्शन प्रदान करने से संबंधित है. शेख अबू बक्र शांति के मुखर समर्थक रहे हैं, उन्होंने 2014 में ISIS के खिलाफ शुरुआती फतवे जारी किए थे और भारत के विविध समाज में सेक्यूलर भावना को बढ़ावा देते रहे हैं.
दुनिया भर में बनाई है पहचान
अबूबकर अहमद ने अरबी, उर्दू और मलयालम में 60 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं और 12 हजार से ज़्यादा प्राथमिक विद्यालयों, 11 हजार माध्यमिक विद्यालयों और 638 कॉलेजों सहित कई शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों का संचालन किया है.
उन्हें सामजित काम के लिए 2021 में UAE के गोल्डन वीजा, 2023 में मलेशिया के तोकोह माल हिजरा पुरस्कार और 2008 में सऊदी अरब के इस्लामिक हेरिटेज पुरस्कार जैसे पुरस्कार से नवाजा गया है. वह दुनिया के 500 इंफ्यूलेंसर मुस्लिम की सूची में भी रह चुके हैं. साथ ही उन्होंने कई वैश्विक सम्मेलनों में भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधित्व किया है, जिनमें पोप फ्रांसिस जैसी हस्तियों के साथ बैठकें और शेख जायद अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन जैसे कार्यक्रम शामिल हैं. जिससे उनके कद का अंदाजा लगाया जा सकता है.
यमन में मौत की सज़ा किन अपराधों पर दी जाती है?
यमन में सज़ा-ए-मौत सिर्फ हत्या तक सीमित नहीं है. वहां का दंड संहिता कई तरह के अपराधों पर मृत्युदंड की सज़ा देती है, जिनमें कई ऐसे भी हैं जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के खिलाफ माने जाते हैं. इनमें शामिल हैं:
- किसी मुसलमान की हत्या
- आगजनी या बम धमाके
- सार्वजनिक संचार या परिवहन को नुकसान
- धर्मत्याग (apostasy)
- लूटपाट या डकैती
- व्यभिचार (adultery)
- समलैंगिकता
- वेश्यावृत्ति
- देशद्रोह
यमन में सजा एक मौत के फरमान को सुबह और दोपहर के बीच के समय में अमल में लाया जाता है. ताकि स्पष्ट रूप से गवाह मौजूद रहे. शुक्रवार को छोड़कर बाकी दिनों में इसे अमल में लाया जाता है.
गोली से दिल पर वार, यमन की क्रूर सजा
यमन की दंड संहिता में सजा-ए-मौत के चार तरीके दर्ज हैं. गोली मारना, फांसी देना, सिर कलम करना और पत्थर से मारना. हालांकि इनमें से सबसे ज्यादा इस्तेमाल गोली मारने का होता है. इस प्रक्रिया में कैदी को जमीन पर उल्टा लिटाया जाता है, उसके हाथ बांध दिए जाते हैं, और एक डॉक्टर दिल का स्थान तय करता है. एक अकेला एक्जीक्यूशनर ऑटोमैटिक राइफल से दिल पर लगातार पांच गोलियां दागता है. इस प्रक्रिया में कैदी को आखिरी इच्छा पूछने या किसी विशेष भोजन की अनुमति तक नहीं मिलती. 2014 के बाद यमन के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी हिस्से हौथी विद्रोहियों के कब्जे में हैं. इन इलाकों में मौत की सजा और ज्यादा तेजी से दी जा रही है.
वहीं फांसी कम मामलों में दी जाती है, लेकिन कानूनन संभव है. हालांकि यमन में सालों से फांसी की प्रक्रिया नहीं हुई है. सिर कलम करने जैसी क्रूर सजाएं ऐतिहासिक रूप से कुछ मामलों में दी जाती है, खासकर से Hudud अपराधों में. वहीं पत्थर मारकर मारना (रेजिंग/stoning) बहुत दुर्लभ है.
क्या बच्चों को भी दी जाती है फांसी?
हां, और यही सबसे गंभीर बात है. 1994 में यमन के दंड संहिता में बदलाव कर यह प्रावधान जोड़ा गया था कि 18 साल से कम उम्र वालों को मौत की सज़ा नहीं दी जाएगी, लेकिन देश में जन्म प्रमाणपत्र की प्रणाली बेहद कमजोर है. इसी कारण कई बार नाबालिगों को भी मृत्युदंड दे दिया जाता है, जैसा कि 2007 में आदिल अल-मआमारी के केस में हुआ. 2007 में आदिल अल-मआमारी नाम के युवक को फांसी दे दी गई, जबकि उसका दावा था कि अपराध करते वक्त वो सिर्फ 16 साल का था. न उसके पास वकील था, न ही उम्र का सही प्रमाण और पुलिस ने जबरदस्ती कबूलनामा करवाया था. इस घटना के बाद भी कम से कम 18 नाबालिग कैदी आज यमन की डेथ रो (मृत्युदंड सूची) में हैं.
दुनिया की नजरें और आलोचना
मानवाधिकार समूह लंबे समय से यमन की मौत की सज़ा की प्रणाली की आलोचना करते आ रहे हैं. 2023 में यमन में 13 से ज्यादा आधिकारिक फांसी दी गईं, लेकिन असल संख्या इससे कहीं ज्यादा मानी जाती है. पब्लिक एक्ज़ीक्यूशन, क्रॉस पर शव टांगना और स्टोनिंग जैसे पुराने तरीकों का इस्तेमाल अब भी कभी-कभी होता है. 2021 में बच्चों के साथ रेप के दोषियों को गोली मारने के बाद शवों को सार्वजनिक रूप से क्रॉस पर लटका दिया गया था.







