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दीवानी कानून में सुधार की दरकार……………….

UB India News by UB India News
July 14, 2026
in कानून, खास खबर
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आखिर उन धमाकों का गुनहगार कौन था?
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आज कहा जाता है कि दीवानी वाद बाप मरे, बेटा लड़े और पोता भुगते। तारीख पर तारीख मिलना इसकी सबसे बड़ी पहचान है। दीवानी मुकदमेबाजी सर्वविदित रूप से वक्त लेने वाली, अक्षम, महंगी व अप्रत्याशित होती है।

सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी), 1908 भारत की सिविल न्याय प्रणाली की रीढ़ है। फिर भी, इसका सदी पुराना ढांचा आज के जटिल व तकनीक पर आधारित विवादों की जरूरतों को पूरा करने में संघर्षरत है। हालांकि, आपराधिक कानून में सुधार पर तो राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिया गया है, पर एक जरूरी मुद्दे को काफी हद तक नजरअंदाज किया गया है, वह है ‘कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1908’ (सीपीसी) को रद्द करना और उसकी जगह नया कानून लाने की तत्काल जरूरत।

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सीपीसी में कई ऐसे प्रावधान हैं, जो भले ही निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए थे, लेकिन अब वे बहुत ज्यादा सख्त और समय लेने वाले हो गए हैं। अदालतें अक्सर प्रक्रिया की बारीकियों का सख्ती से पालन करती हैं, जिससे बेवजह देरी होती है। समन तामील करना (प्रकरण की सूचना संबंधित व्यक्ति तक पहुंचाना) सबसे ज्यादा समय लेता है। इसके कारण अदालतों को बार-बार सुनवाई स्थगित करनी पड़ती है। इसके अलावा, सबूत दर्ज करने में भी काफी समय लगता है, क्योंकि इसमें भौतिक दस्तावेजों, पेपर बुक्स और अदालत में मौखिक बयानों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इसका एक बहुत साफ उदाहरण सीपीसी का ‘ऑर्डर XXI’ है, जो डिक्री (अदालत के फैसले) को लागू करने की कार्यवाही से जुड़ा है। लेकिन, असल में ‘ऑर्डर XXI’ अक्सर मुकदमेबाजी के एक और दौर में बदल जाता है। आपत्तियां, विरोध की अर्जियां, कब्जे को लेकर विवाद, तीसरे पक्ष के दावे, बार-बार जारी होने वाले वारंट, स्टे (रोक) की अर्जियां और अन्य कार्यवाहियां अक्सर डिक्री लागू करने की प्रक्रिया को एक ‘मिनी ट्रायल’ (छोटे मुकदमे) जैसा बना देती हैं। नतीजतन, कोई मुकदमेबाज डिक्री पाने में वर्षों लगा सकता है और फिर उसे लागू करवाने की कोशिश में और भी कई साल निकल जाते हैं। न्याय देने वाली ऐसी व्यवस्था से न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कम होने का खतरा रहता है। इसलिए, डिक्री लागू करने वाले कानून में बड़े बदलाव की जरूरत है। आधुनिक सिस्टम में सख्त समय-सीमा, डिजिटल संपत्ति की जानकारी देने, जब्त की जा सकने वाली संपत्तियों की तुरंत पहचान करने और सीमित आपत्तियों की अनुमति देने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि डिक्री असल में लागू हो सकें।

आज की दुनिया में, सिविल वाद 1908 में सोचे गए विवादों की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल, ज्यादा मूल्य वाले और समय के प्रति संवेदनशील हैं। व्यावसायिक लेन-देन, डिजिटल कॉन्ट्रैक्ट, बौद्धिक संपदा से जुड़े विवाद और सीमा-पार विवादों में तेजी और सटीकता की जरूरत होती है। देरी न केवल मुकदमेबाजों को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित करती है, बल्कि इससे व्यापारिक भरोसे, आर्थिक विकास और न्यायपालिका में सामाजिक विश्वास पर भी असर पड़ता है। ई-फाइलिंग, समन की इलेक्ट्रॉनिक सर्विस, ऑनलाइन केस ट्रैकिंग, सुनवाई के लिए वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग और सबूतों को इलेक्ट्रॉनिक रूप में सुरक्षित रखने जैसी प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने से प्रशासनिक काम का बोझ काफी कम हो सकता है और इन्सानी गलतियों या देरी को खत्म किया जा सकता है।

सिविल न्याय में देरी का सीधा असर आर्थिक भरोसे पर पड़ता है। अगर संस्थानों के बुनियादी ढांचे को समय-समय पर आधुनिक नहीं बनाया जाए, तो उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है। हालांकि, सीपीसी बुनियादी और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, पर इसकी प्रक्रियात्मक संरचना में सुधार करना बहुत जरूरी है, ताकि न्याय देने की प्रक्रिया पुराने तरीकों में फंसी न रहे। एक पुनर्गठित और आधुनिक सीपीसी भारत के कानून के राज वाले इकोसिस्टम को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगी। यह न केवल न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा बढ़ाएगी, बल्कि न्यायिक दक्षता व कानूनी बुनियादी ढांचे के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को भी बेहतर बनाएगी।

आखिरकार, इन सुधारों का लक्ष्य एक ऐसी सिविल न्याय प्रणाली बनाना है, जो न केवल नतीजों में निष्पक्ष हो, बल्कि तेज, सुलभ और आज की वास्तविकताओं के अनुरूप भी हो। भारत ने अपनी न्याय प्रणाली के आधे हिस्से को आधुनिक बना लिया है, बाकी आधे हिस्से को अब और इंतजार नहीं कराया जा सकता। -लेखक पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।

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