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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब के दौरे पर………..

UB India News by UB India News
May 14, 2025
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब के दौरे पर………..
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साल 1977 से 1981 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जिम्मी कार्टर के आदेश पर अमेरिका ने इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल बनाकर देशों में मानवाधिकार हनन पर रिपोर्ट जारी करना शुरू किया. इस संस्था का निशाना ज्यादातर वो देश रहे, जहां तानाशाही थी. लेकिन ऐसे अमेरिकी संस्थानों के लिए सऊदी अरब हमेशा से अपवाद ही रहा. अमेरिका ने कई देशों में डेमोक्रेसी लाने और तानाशाही को खत्म करने के लिए सैन्य अभियान चलाए और वहां के शासकों का तख्तापलट तक करवा दिया लेकिन सऊदी अरब अपने सख्त कानूनों, महिला और मानव अधिकारों के हनन के बावजूद अमेरिका का खास बना रहा.

सऊदी अरब और अमेरिका की दोस्ती कई रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक कारणों से मजबूत है, जो इजराइल के साथ अमेरिकी गठजोड़ और मानव अधिकारों के हनन के बावजूद बरकरार रहती है. सऊदी अरब तालिबान, अल नुसरा और अल-कायदा जैसे चरमपंथी और कट्टर इस्लामी समूहों को भी फंड करता रहा है. फिर भी इसका अमेरिका के साथ टकराव देखने को नहीं मिला.

1932 में सऊदी अरब की अधिकारिक स्थापना के एक साल बाद 1933 से ही अमेरिका और सऊदी अरब के बीच रिश्ते स्थापित हो गए थे. इसी साल सऊदी अरब ने कच्चा तेल निकालने के लिए स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया के साथ डील साइन की, जिसने दोनों देशों के रिश्तों की बुनियाद डाली.

Trump Saudi Visit (4)

सऊदी और स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया के बीच डील 1933 में हुई.

इनमें अहम मोड़ तब आया जब 1938 में सऊदी के दमाम प्रांत में विशाल तेल भंडार की खोज हुई. जिसने सऊदी के शाही परिवार को अपार ताकत दी और यहीं से सऊदी और अमेरिकी रिश्तों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 21वीं सदी आते-आते दोनों देशों का ये गठजोड़ इतना गहरा हो गया कि मध्य पूर्व के साथ-साथ पूरी दुनिया में अपना प्रभाव रखने लगा.

2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने कुर्सी संभालने के बाद अपनी पहली यात्रा में कनाडा या मैक्सिको की बजाय सऊदी अरब का दौरा किया. जिसने दुनिया को ये दिखाया कि आज के समय में अमेरिका के लिए सऊदी अरब कितना खास है. 13 मई 2025 को एक बार फिर ट्रंप सऊदी अरब पहुंचे हैं. जिसके बाद अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चाएं बढ़ गई हैं. आइये दोनों देशों के संबंधों को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.

सऊदी की अमीरी और अमेरिका के हित

सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है और अमेरिका उसका प्रमुख खरीदार रहा है. अमेरिका ने सस्ते तेल के बदले सऊदी को सुरक्षा की गारंटी दी है. 1971 की ईरानी क्रांति ने सऊदी के लिए अमेरिकी सुरक्षा की जरूरत को और बढ़ा दिया. सऊदी अरब मुस्लिम दुनिया में ईरान को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानता हैं और उससे सुरक्षा के लिए अमेरिका उसका सहारा है.

सुरक्षा गारंटी का उदाहरण 1991 के गल्फ वार में भी देखने मिला, जब अमेरिका ने सऊदी को इराकी सेना से बचाए रखा. वहीं सऊदी का अमेरिका पर भरोसा 2003 में देखने मिला, जब सद्दाम हुसैन के तख्तापलट के लिए अमेरिका ने इराक पर आक्रमण किया. सऊदी को ये मालूम था कि इराक के कमजोर होने से ईरान को अपना क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का मौका मिलेगा. इस डर के बाद भी सऊदी ने अमेरिका के इस कदम का विरोध नहीं किया.

Trump Saudi Visit (5)

सऊदी अरब में अमेरिकी बेस

दोनों देशों का सहयोग पारस्परिक तब हो जाता है, जब अमेरिकी कंपनियों में सऊदी अरब का विशाल निवेश देखने मिलता है. सऊदी अरब ‘सॉवरेन वेल्थ फंड’ (पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड) के जरिए, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारी निवेश करता है. सऊदी अरब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स, टेक कंपनियों- जैसे उबर, टेस्ला और अन्य क्षेत्रों में अरबों डॉलर का निवेश करता है. यह निवेश अमेरिकी वित्तीय बाजारों के लिए अहम है. सऊदी की इस आर्थिक शक्ति का मतलब है कि वह अमेरिका पर अप्रत्यक्ष दबाव डाल सकता है.

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गुजरात में बाढ़ का कहर!

ट्रंप काल में मिले आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई

डोनाल्ड ट्रंप की सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बेहद अच्छी दोस्ती है. अमेरिका में उनके राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के रश्ते और मजबूत हो गए. मई 2017 में ट्रंप ने अपने पहले टर्म के सऊदी दौरे में किंग सलमान के साथ 110 बिलियन डॉलर की डील साइन की. ये डील सबसे बड़ा हथियार सौदा था, जिसे चीन और रूस लपकने के लिए तैयार खड़े थे.

इस डील के बाद ट्रंप के ऊपर कई सवाल खड़े किए गए, इस डील का मतलब यमन-सऊदी युद्ध में घी डालने जैसा था यानी इसे यमन में हमलों को अमेरिकी हरी झंडी समझा गया. जिसमें सऊदी के ऊपर युद्ध अपराधों के आरोप लगे हैं. लेकिन ट्रंप ने साफ किया कि उनके लिए फायदे वाले आर्थिक संबंध मायने रखते हैं न कि मानव अधिकार.

Trump Saudi Visit (1)

आर्म्स डील 2017

ट्रंप के 2025 के दौरे में उम्मीद जताई जा रही है कि सऊदी अरब 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा के अमेरिकी हथियार और अन्य सैन्य सामान को खरीदने वाली डील पर साइन कर सकता है. वहीं इस यात्रा में अमेरिका की सऊदी के साथ सिविल न्यूक्लियर डील भी होने की उम्मीद है. हालांकि ये डील अभी सिविल न्यूक्लियर बताई जा रही है, लेकिन कुछ जानकार इसको मध्य पूर्व में ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम का मुकाबला करने वाली डील मान रहे हैं.

इसके अलावा जनवरी में ट्रंप की वापसे के तुरंत बाद सऊदी अरब ने 600 बिलियन डॉलर का अमेरिका में निवेश किया. बता दें 2022 में जब ट्रंप राष्ट्रपति नहीं तब भी सऊदी क्राउन प्रिंस ने उनके दामाद जेरेड कुशनर की कंपनी 2 बिलियन डॉलर का निवेश किया था. डोनाल्ड ट्रंप ने ख्वाइश जताई है कि वह सऊदी निवेश के एक ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाना चाहते हैं.

तेल और ऊर्जा बाजार की स्थिरता

अमेरिका भले ही आज तेल के लिए आत्मनिर्भर बन गया है, लेकिन फिर भी उसको सऊदी की जरूरत है. तेल की कीमतों को कंट्रोल करने वाले संगठन OPEC का नेतृत्व सऊदी अरब करता है. अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए तेल की कीमतों को नियंत्रित रखना चाहता है. सऊदी अरब इस मामले में एक महत्वपूर्ण साझेदार है, क्योंकि वह तेल उत्पादन बढ़ाकर या घटाकर कीमतों को कंट्रोल करने की क्षमता रखता है. बता दें कि 2020 में तेल की कीमतों में भारी गिरावट के दौरान सऊदी ने अमेरिका के साथ मिलकर OPEC+ समझौते को स्थिर किया था.

रणनीतिक तौर पर सऊदी की अहमियत

यहीं नहीं सऊदी अरब अमेरिका के लिए मध्य पूर्व का एक बड़ा देश है और मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों को पूरा करने के लिए अमेरिका को सऊदी की जरूरत है. सऊदी अरब मध्य पूर्व में सैन्य कार्रवाई के लिए अमेरिकी सेना को अपने क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति देता है. सऊदी में अमेरिका के बेस ईरान और उसके एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस से निपटने के लिए भी अमेरिका के लिए जरूरी हैं.

फिलिस्तीन और इजराइल मुद्दा

सऊदी अरब अरब और मुस्लिम दुनिया में एक प्रभावशाली आवाज है. इतिहास से सऊदी अरब फिलिस्तीन का समर्थक रहा है. कई दशकों तक सऊदी अरब ने फिलिस्तीन और इजराइल मुद्दे के समाधान के लिए दो राष्ट्र के समाधान को नहीं माना. लेकिन कुछ सालों से सऊदी अरब 1967 की सीमाओं पर दो राष्ट्र समाधान की मांग कर रहा है.

Trump Saudi Visit (6)

क्राउन प्रिंस फिलिस्तीन राष्ट्रपति महमूद अब्बास के साथ

ट्रंप की इस यात्रा से इजराइल के साथ संबंध बनाने की ट्रंप की मांग को बाहर कर दिया गया है. सऊदी ने कहा है कि फिलिस्तीन की एक आजाद राष्ट्र के तौर पर स्थापना किए बिना वह इजराइल के साथ संबंध स्थापित नहीं करेगा. हालांकि, एक सच ये भी है कि इजराइल जिस ताकत के साथ गाजा में तबाही मचा रहा है उसमें अमेरिका के समर्थन का एक बड़ा योगदान है.

ऐसे में अमेरिका और सऊदी की ये दोस्ती क्या कहलाती है…इसे समझना उतना कठिन भी नहीं है.

साल 1977 से 1981 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे जिम्मी कार्टर के आदेश पर अमेरिका ने इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल बनाकर देशों में मानवाधिकार हनन पर रिपोर्ट जारी करना शुरू किया. इस संस्था का निशाना ज्यादातर वो देश रहे, जहां तानाशाही थी. लेकिन ऐसे अमेरिकी संस्थानों के लिए सऊदी अरब हमेशा से अपवाद ही रहा. अमेरिका ने कई देशों में डेमोक्रेसी लाने और तानाशाही को खत्म करने के लिए सैन्य अभियान चलाए और वहां के शासकों का तख्तापलट तक करवा दिया लेकिन सऊदी अरब अपने सख्त कानूनों, महिला और मानव अधिकारों के हनन के बावजूद अमेरिका का खास बना रहा.

सऊदी अरब और अमेरिका की दोस्ती कई रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक कारणों से मजबूत है, जो इजराइल के साथ अमेरिकी गठजोड़ और मानव अधिकारों के हनन के बावजूद बरकरार रहती है. सऊदी अरब तालिबान, अल नुसरा और अल-कायदा जैसे चरमपंथी और कट्टर इस्लामी समूहों को भी फंड करता रहा है. फिर भी इसका अमेरिका के साथ टकराव देखने को नहीं मिला.

1932 में सऊदी अरब की अधिकारिक स्थापना के एक साल बाद 1933 से ही अमेरिका और सऊदी अरब के बीच रिश्ते स्थापित हो गए थे. इसी साल सऊदी अरब ने कच्चा तेल निकालने के लिए स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया के साथ डील साइन की, जिसने दोनों देशों के रिश्तों की बुनियाद डाली.

Trump Saudi Visit (4)

सऊदी और स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया के बीच डील 1933 में हुई.

इनमें अहम मोड़ तब आया जब 1938 में सऊदी के दमाम प्रांत में विशाल तेल भंडार की खोज हुई. जिसने सऊदी के शाही परिवार को अपार ताकत दी और यहीं से सऊदी और अमेरिकी रिश्तों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 21वीं सदी आते-आते दोनों देशों का ये गठजोड़ इतना गहरा हो गया कि मध्य पूर्व के साथ-साथ पूरी दुनिया में अपना प्रभाव रखने लगा.

2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने कुर्सी संभालने के बाद अपनी पहली यात्रा में कनाडा या मैक्सिको की बजाय सऊदी अरब का दौरा किया. जिसने दुनिया को ये दिखाया कि आज के समय में अमेरिका के लिए सऊदी अरब कितना खास है. 13 मई 2025 को एक बार फिर ट्रंप सऊदी अरब पहुंचे हैं. जिसके बाद अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चाएं बढ़ गई हैं. आइये दोनों देशों के संबंधों को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.

सऊदी की अमीरी और अमेरिका के हित

सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है और अमेरिका उसका प्रमुख खरीदार रहा है. अमेरिका ने सस्ते तेल के बदले सऊदी को सुरक्षा की गारंटी दी है. 1971 की ईरानी क्रांति ने सऊदी के लिए अमेरिकी सुरक्षा की जरूरत को और बढ़ा दिया. सऊदी अरब मुस्लिम दुनिया में ईरान को अपनी सबसे बड़ी चुनौती मानता हैं और उससे सुरक्षा के लिए अमेरिका उसका सहारा है.

सुरक्षा गारंटी का उदाहरण 1991 के गल्फ वार में भी देखने मिला, जब अमेरिका ने सऊदी को इराकी सेना से बचाए रखा. वहीं सऊदी का अमेरिका पर भरोसा 2003 में देखने मिला, जब सद्दाम हुसैन के तख्तापलट के लिए अमेरिका ने इराक पर आक्रमण किया. सऊदी को ये मालूम था कि इराक के कमजोर होने से ईरान को अपना क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का मौका मिलेगा. इस डर के बाद भी सऊदी ने अमेरिका के इस कदम का विरोध नहीं किया.

Trump Saudi Visit (5)

सऊदी अरब में अमेरिकी बेस

दोनों देशों का सहयोग पारस्परिक तब हो जाता है, जब अमेरिकी कंपनियों में सऊदी अरब का विशाल निवेश देखने मिलता है. सऊदी अरब ‘सॉवरेन वेल्थ फंड’ (पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड) के जरिए, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारी निवेश करता है. सऊदी अरब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स, टेक कंपनियों- जैसे उबर, टेस्ला और अन्य क्षेत्रों में अरबों डॉलर का निवेश करता है. यह निवेश अमेरिकी वित्तीय बाजारों के लिए अहम है. सऊदी की इस आर्थिक शक्ति का मतलब है कि वह अमेरिका पर अप्रत्यक्ष दबाव डाल सकता है.

ट्रंप काल में मिले आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई

डोनाल्ड ट्रंप की सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बेहद अच्छी दोस्ती है. अमेरिका में उनके राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के रश्ते और मजबूत हो गए. मई 2017 में ट्रंप ने अपने पहले टर्म के सऊदी दौरे में किंग सलमान के साथ 110 बिलियन डॉलर की डील साइन की. ये डील सबसे बड़ा हथियार सौदा था, जिसे चीन और रूस लपकने के लिए तैयार खड़े थे.

इस डील के बाद ट्रंप के ऊपर कई सवाल खड़े किए गए, इस डील का मतलब यमन-सऊदी युद्ध में घी डालने जैसा था यानी इसे यमन में हमलों को अमेरिकी हरी झंडी समझा गया. जिसमें सऊदी के ऊपर युद्ध अपराधों के आरोप लगे हैं. लेकिन ट्रंप ने साफ किया कि उनके लिए फायदे वाले आर्थिक संबंध मायने रखते हैं न कि मानव अधिकार.

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आर्म्स डील 2017

ट्रंप के 2025 के दौरे में उम्मीद जताई जा रही है कि सऊदी अरब 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा के अमेरिकी हथियार और अन्य सैन्य सामान को खरीदने वाली डील पर साइन कर सकता है. वहीं इस यात्रा में अमेरिका की सऊदी के साथ सिविल न्यूक्लियर डील भी होने की उम्मीद है. हालांकि ये डील अभी सिविल न्यूक्लियर बताई जा रही है, लेकिन कुछ जानकार इसको मध्य पूर्व में ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम का मुकाबला करने वाली डील मान रहे हैं.

इसके अलावा जनवरी में ट्रंप की वापसे के तुरंत बाद सऊदी अरब ने 600 बिलियन डॉलर का अमेरिका में निवेश किया. बता दें 2022 में जब ट्रंप राष्ट्रपति नहीं तब भी सऊदी क्राउन प्रिंस ने उनके दामाद जेरेड कुशनर की कंपनी 2 बिलियन डॉलर का निवेश किया था. डोनाल्ड ट्रंप ने ख्वाइश जताई है कि वह सऊदी निवेश के एक ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाना चाहते हैं.

तेल और ऊर्जा बाजार की स्थिरता

अमेरिका भले ही आज तेल के लिए आत्मनिर्भर बन गया है, लेकिन फिर भी उसको सऊदी की जरूरत है. तेल की कीमतों को कंट्रोल करने वाले संगठन OPEC का नेतृत्व सऊदी अरब करता है. अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए तेल की कीमतों को नियंत्रित रखना चाहता है. सऊदी अरब इस मामले में एक महत्वपूर्ण साझेदार है, क्योंकि वह तेल उत्पादन बढ़ाकर या घटाकर कीमतों को कंट्रोल करने की क्षमता रखता है. बता दें कि 2020 में तेल की कीमतों में भारी गिरावट के दौरान सऊदी ने अमेरिका के साथ मिलकर OPEC+ समझौते को स्थिर किया था.

रणनीतिक तौर पर सऊदी की अहमियत

यहीं नहीं सऊदी अरब अमेरिका के लिए मध्य पूर्व का एक बड़ा देश है और मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों को पूरा करने के लिए अमेरिका को सऊदी की जरूरत है. सऊदी अरब मध्य पूर्व में सैन्य कार्रवाई के लिए अमेरिकी सेना को अपने क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति देता है. सऊदी में अमेरिका के बेस ईरान और उसके एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस से निपटने के लिए भी अमेरिका के लिए जरूरी हैं.

फिलिस्तीन और इजराइल मुद्दा

सऊदी अरब अरब और मुस्लिम दुनिया में एक प्रभावशाली आवाज है. इतिहास से सऊदी अरब फिलिस्तीन का समर्थक रहा है. कई दशकों तक सऊदी अरब ने फिलिस्तीन और इजराइल मुद्दे के समाधान के लिए दो राष्ट्र के समाधान को नहीं माना. लेकिन कुछ सालों से सऊदी अरब 1967 की सीमाओं पर दो राष्ट्र समाधान की मांग कर रहा है.

Trump Saudi Visit (6)

क्राउन प्रिंस फिलिस्तीन राष्ट्रपति महमूद अब्बास के साथ

ट्रंप की इस यात्रा से इजराइल के साथ संबंध बनाने की ट्रंप की मांग को बाहर कर दिया गया है. सऊदी ने कहा है कि फिलिस्तीन की एक आजाद राष्ट्र के तौर पर स्थापना किए बिना वह इजराइल के साथ संबंध स्थापित नहीं करेगा. हालांकि, एक सच ये भी है कि इजराइल जिस ताकत के साथ गाजा में तबाही मचा रहा है उसमें अमेरिका के समर्थन का एक बड़ा योगदान है.

ऐसे में अमेरिका और सऊदी की ये दोस्ती क्या कहलाती है…इसे समझना उतना कठिन भी नहीं है.

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