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वक्फ कानून मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किया, केंद्र से 7 दिन में मांगा जवाब

UB India News by UB India News
April 18, 2025
in कानून
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वक्फ कानून मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किया, केंद्र से 7 दिन में मांगा जवाब
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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून मामले में केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए सात दिन का समय दिया है। इसके पांच दिन के बाद याचिकाकर्ताओं को जवाब दाखिल करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि काउंसिल और बोर्ड को कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी। अगली सुनवाई की तारीख तक वक्फ जिसमें पहले से पंजीकृत या अधिसूचना के माध्यम से घोषित वक्फ शामिल हैं को न तो डीनोटिफाई किया जाएगा और न ही कलेक्टर को बदला जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र को सात दिनों के भीतर जवाब दाखिल करना होगा।

कोर्ट ने कोई रोक नहीं लगाई है

सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम पर कोई रोक नहीं लगाई है.. हालांकि, इसने 2025 के वक्फ संशोधन अधिनियम के अनुसार केंद्रीय वक्फ परिषद और बोर्ड में किसी भी नियुक्ति के संबंध में एसजी तुषार मेहता द्वारा दिए गए आश्वासन को रिकॉर्ड में ले लिया है और कहा है कि उपयोगकर्ता द्वारा पहले से ही वक्फ घोषित की गई और मूल 1995 अधिनियम के तहत पंजीकृत संपत्तियों को परेशान नहीं किया जाएगा। यथास्थिति बना

5 मई को होगी अगली सुनवाई

वक्फ कानून मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए पांच मई की तारीख निर्धारित की है। अगले महीने पांच मई को दोपहर दो बजे मामले की अगली सुनवाई होगी। अगली सुनवाई में कोई विस्तृत सुनवाई नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किया

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किया। सीजेआई ने कहा कि सुनवाई के दौरान एसजी ने कहा कि केंद्र एक सप्ताह के भीतर जवाब देना चाहेगा। उन्होंने आगे कहा, वह अदालत को आश्वस्त करते हैं कि परिषद और बोर्ड में कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी। सुनवाई की अगली तारीख तक, वक्फ, जिसमें पहले से पंजीकृत या अधिसूचना के माध्यम से घोषित उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ शामिल है, को न तो डीनोटिफाई किया जाएगा और न ही कलेक्टर को बदला जाएगा। हम बयान को रिकॉर्ड पर लेते हैं।

वक्फ कानून के खिलाफ 72 याचिकाएं

इससे पहले कल वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिकता के खिलाफ 72 याचिकाओं से जुड़ी सुनवाई चीफ जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के वी विश्वनाथन की बेंच ने की। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और मुस्लिम निकायों तथा व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक सिंघवी, सी यू सिंह सहित वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें सुनने के बाद प्रधान न्यायाधीश ने नोटिस जारी करने और एक अंतरिम आदेश पारित करने का प्रस्ताव रखा तथा कहा कि इससे ‘‘समानताएं संतुलित होंगी’’।

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मौलिक अधिकारों का हनन का आरोप

विरोध करने वालों का सबसे बड़ा आरोप यह था कि नया वक्फ कानून मुसलमानों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है और मुसलमानों से भेदभाव करने वाला है। उन्होने यह भी दलील दी कि यह कानून असंवैधानिक है इसलिए इसे लागू करने पर रोक लगनी चाहिए। केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस आरोप को बेबुनियाद बताया। इसके बाद बेंच ने कहा, नए क़ानून के कुछ प्रावधान अच्छे हैं,लेकिन वक्फ बाई यूज़र और वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्यों जैसे कुछ प्रावधानों  पर सरकार के स्पष्टीकरण की ज़रूरत है।

कोर्ट ने सरकार से पूछा कि इसके वक्फ काउंसिल में गैर-मुसलमानों को शामिल करने का क्या मकसद है? क्या सरकार मुसलमानों को मंदिरों के बोर्ड में शामिल करने की अनुमति देगी? इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वक्फ बाई यूजर का प्रावधान खत्म करने का क्या असर होगा? जिन संपत्तियों को कोर्ट ने वक्फ प्रॉपर्टी घोषित कर दिया है, क्या नए कानून के तहत उन्हें भी डी-नोटिफाई किया जाएगा? सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जो सैकड़ों साल पुरानी ऐतिहासिक बिल्डिंग्स या प्रॉपर्टी वक्फ के पास हैंय़ उनके पेपर्स वक्फ बोर्ड कहां से लाएगा? इसके बाद तीन जजों की बेंच ने कहा कि वो इस केस में अंतिरम आदेश पास करना चाहते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आग्रह किया कि वो इस मामले में कुछ और दलीले रखना चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट चाहे तो इस मामले पर डे टू डे बेसिस पर सुनवाई कर सकती है। इसके बाद चीफ जस्टिस की बेंच ने इस मामले में गुरुवार को फिर सुनवाई करने का फैसला किया।

कपिल सिब्बल की दलील

वक्फ कानून के खिलाफ दलील दे रहे कपिल सिब्बल ने कहा कि 300 साल पहले तो ऐसी व्यवस्था नहीं थी फिर उन मस्जिदों की डीड कहां से लाएंगे? इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र से पूछा कि वक्फ बाई यूज़र क्यों हटाया गया तो सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जो प्रॉपर्टी वक्फ के तौर पर रजिस्टर्ड हैं वो वक्फ की ही रहेंगी। कोर्ट ने पूछा कि वक्फ बाई यूज़र वाली प्रॉपर्टी का क्या होगा तो केन्द्र की तरफ से कहा गया कि कलेक्टर प्रॉपर्टी की जांच करके उसे रिकॉर्ड में ले आएगा। बोर्ड में गैर मुस्लिमों की एंट्री को कपिल सिबब्ल ने गैर संवैधानिक बताया तो सुप्रीम कोर्ट ने एसजी से पूछा कि बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों का प्रावधान क्यों बनाया? इसके जवाब में एसजी ने कहा कि बोर्ड में ज्यादातर सदस्य मुस्लिम हैं और गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या 2 से ज्यादा नहीं होगी।

इससे पहले बेंच ने कहा, ‘‘अदालतों द्वारा वक्फ के रूप में घोषित संपत्तियों को वक्फ के रूप में गैर-अधिसूचित नहीं किया जाना चाहिए, चाहे वे उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ हों या विलेख द्वारा वक्फ हों, यद्यपि अदालत वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है।’’ पीठ ने संशोधित कानून के एक प्रावधान पर रोक लगाने का भी संकेत दिया, जिसमें कहा गया है कि कलेक्टर द्वारा यह जांच किए जाने तक कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, वक्फ संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा।

बेंच ने अधिनियम को लेकर प्रावधान-वार आपत्तियों पर गौर किया और केंद्रीय वक्फ परिषद तथा राज्य वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने सहित कानून के कई पहलुओं पर आपत्तियां व्यक्त कीं। इसने जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों से संबंधित विवादों का निपटारा करने का अधिकार देने तथा सक्षम न्यायालयों द्वारा वक्फ घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की अनुमति देने वाले प्रावधानों पर भी आपत्ति जताई।

चीफ जस्टिस ने कहा, ‘‘आमतौर पर, जब कोई कानून पारित होता है तो अदालतें शुरुआती स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करती हैं। लेकिन इस मामले में अपवाद की आवश्यकता हो सकती है। यदि उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ घोषित की गई संपत्ति को गैर-अधिसूचित किया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।’’

तीखी नोकझोंक

सुनवाई के दौरान पीठ और सॉलिसिटर जनरल के बीच तब तीखी नोकझोंक हुई जब जजों ने वक्फ प्रशासन में गैर-मुस्लिमों को अनुमति देने के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया, जबकि हिंदू धार्मिक संस्थाओं पर समान पारस्परिकता लागू नहीं होती। विधि अधिकारी ने कहा कि वक्फ परिषद में पदेन सदस्यों के अलावा दो से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल नहीं किया जाएगा। उन्होंने एक हलफनामे में यह बात कहने की पेशकश की। हालांकि, पीठ ने कहा कि नए अधिनियम के तहत केंद्रीय वक्फ परिषद के 22 सदस्यों में से केवल आठ मुस्लिम होंगे। पीठ ने पूछा, ‘‘यदि आठ मुस्लिम हैं, तो दो ऐसे न्यायाधीश भी हो सकते हैं जो मुस्लिम न हों। इससे गैर-मुस्लिमों का बहुमत हो जाता है। यह संस्था के धार्मिक चरित्र के साथ कैसे संगत है?’’

 

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