बिहार में बहुत पोटेंशियल है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के आधार आपको NDA का समन्वय बनाकर चलना होगा। इसलिए किसी को जदयू, लोजपा (आर) और हम नहीं समझें। हर कैंडिडेट को कमल का कैंडिडेट समझकर काम कीजिए।’
अमित शाह ने यह साफ निर्देश बिहार बीजेपी के नेताओं को बंद कमरे में दिया। साथ ही उन्होंने अगले 6 महीने का रोडमैप भी समझाया। इसमें खास बात रही कि BJP नेताओं के साथ बैठक में उन्होंने नीतीश कुमार पर एक शब्द भी नहीं बोला और ना ही लीडरशिप पर कोई चर्चा की।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भाजपा के चुनावी चाणक्य माने जाते हैं. उनकी मेहनत और सुचिंतित रणनीति 2014 से लगातार दिखती रही है. राज्यों में 2014 के बाद भाजपा शासित सरकारों की संख्या लगातार बढ़ती गई. नार्थ ईस्ट के राज्यों में भी भाजपा ने गहरी पैठ जमा ली है, इसके पीछे शाह की ही रणनीति रही है. 2015 में बिहार एनडीए के हाथ से निकला तो अमित शाह ने दो साल बाद ही नीतीश कुमार को पटा कर महागठबंधन सरकार का पटाक्षेप करा दिया था. अमित शाह ने इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिहार में डेरा डालने की बात कही है. चुनावी साल में उनका दो दिवसीय बिहार दौरा भी हो गया. अलग-अलग बैठकों-मुलाकातों में भाजपा के साथ-साथ उन्होंने एनडीए में शामिल पार्टियों के नेताओं को भी जीत का मंत्र दिया है. चुनाव के नेतृत्व पर भी उन्होंने साफ कर दिया है. नीतीश कुमार के नाम पर मुहर लगा कर उन्होंने जेडीयू को भी राहत दे दी है. एनडीए को उन्होंने इस बार 243 में 225 सीटों पर जीत का टास्क दिया है.
लीडरशिप पर कोई चर्चा नहीं
अमित शाह की बैठक से पहले बीजेपी के नेताओं को लग रहा था कि चुनाव से पहले बिहार में लीडरशिप को लेकर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इनके मन में संदेह बना हुआ है कि चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा। नीतीश कुमार के बाद बिहार में NDA का लीडर कौन होगा?
बैठक में शामिल एक सीनियर लीडर ने भास्कर को बताया, ‘अमित शाह ने बैठक में एक बार भी नीतीश कुमार का नाम नहीं लिया। उन्होंने बार-बार NDA का नाम तो दोहराया, लेकिन एक बार भी लीडरशिप का कोई जिक्र नहीं किया। इससे नेताओं के मन का सवाल मन में ही रह गया।’

शाह ने स्पष्ट कहा- सबको कमल समझिए
बैठक में शामिल बीजेपी के एक सीनियर विधायक ने बताया, ‘मीटिंग में अमित शाह ने जिन बातों को बार-बार दोहराया वो है NDA। उन्होंने BJP नेताओं से कहा कि NDA के सभी घटक दलों की सीटों पर भी कैंडिडेट को कमल छाप समझकर ही काम करना है। न कोई जदयू, न लोजपा (आर) और न हम। इसी रणनीति से हमें ऐतिहासिक जीत मिलेगी। घटक दलों से दुराव नहीं, समन्वय बनाकर चलना है। किसी भी सूरत में मतभेद या मतभिन्नता नहीं दिखनी चाहिए।’
बता दें, 2020 विधानसभा चुनाव में JDU और BJP के साथ चुनाव लड़ी थी, लेकिन चिराग पासवान की पार्टी अलग लड़ी। चिराग ने उन सीटों पर प्रत्याशी उतारे जहां नीतीश कुमार की पार्टी लड़ रही थी।
उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अपने को PM मोदी का हनुमान बताया था। इससे ग्राउंड लेवल पर भाजपा कार्यकर्ता कंफ्यूज हो गए और JDU को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। अमित शाह के इस क्लियर मैसेज के पीछे शायद ये सोच हो कि इस चुनाव में ऐसी स्थिति उत्पन्न ना हो।
MP और महाराष्ट्र के हिट फॉर्मूले पर ही बिहार में भी लड़ेंगे
अमित शाह ने BJP नेताओं को हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, ‘इन राज्यों में हमें चुनाव जीतने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे थे। ये चुनाव हमारे लिए बहुत कठिन था, लेकिन हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में वर्कर की मेहनत से और माइक्रो मैनेजमेंट से हमने ये चुनाव जीता है। यही फॉर्मूला हम यहां भी लेकर चलेंगे।’

MP- महाराष्ट्र में BJP का फॉर्मूला जानिए
- बिना CM फेस घोषित किए चुनाव लड़ा- मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र दोनों जगह पर चेहरे को लेकर पार्टी के भीतर कई मतभेद थे। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान लगातार 18 वर्षों से CM थे तो महाराष्ट्र में सहयोगी दल के नेता CM थे। ऐसे में BJP ने दोनों राज्यों में सामूहिक नेतृत्व पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। राज्य से किसी को चेहरा बनाने के बजाय पीएम नरेंद्र मोदी को चेहरा बनाकर पार्टी चुनाव लड़ी और इसका फायदा मिला। दोनों राज्यों में न केवल बीजेपी के सीटों में बढ़ोतरी हुई, बल्कि बीजेपी के नेता ही CM भी बने।
- संगठन, संपर्क और अपने काम को भुनाया- दोनों ही राज्यों में चुनाव से 5 महीने पहले बीजेपी के कार्यकर्ता एक्टिव हो गए थे। संपर्क के लिए बीजेपी तीन स्तर पर काम कर रही थी।
- पन्ना कमेटी बनाकर घर-घर तक पहुंच रही थी।
- दूसरे राज्य के विधायकों, एमएलसी और सांसदों को विधानसभावार जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने सीधा टॉप लीडरशिप को इलाके में नेताओं की परेशानियों और गुटबाजी की जानकारी दी गई।
- सभी सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को इस बात का निर्देश दिया गया था कि वे केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से किए जा रहे विकास कार्यों को घर-घर तक पहुंचाएं।
नीतीश को मंच पर संभालते दिखे शाह
रविवार को पटना के बापू सभागार में सहकारिता समेत अन्य विभाग का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें कुछ लाभुकों को माइक्रो एटीएम कार्ड और कुछ को डमी चेक दिया जा रहा था। इसी डमी चेक को प्राप्त करने के लिए तेतर देवी नाम की महिला मंच पर पहुंची थी।
महिला डमी चेक लेने के दौरान चेहरा नेताओं के साइड की हुई थी। सीएम नीतीश कुमार तस्वीर के लिए तेतर देवी के कंधे को पकड़ कर कैमरे की तरफ कर रहे थे। इसी दौरान केंद्रीय मंत्री अमित शाह और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी उन्हें संभालते दिखे।
यूपी में दिखा था शाह का करिश्मा
अमित शाह की कुशल चुनावी रणनीति पहली बार उत्तर प्रदेश में दिखी थी. वर्ष 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम फेस बनाने का फैसला किया तो उनके आग्रह पर तत्कालीन पार्टी प्रमुख राजनाथ सिंह ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाया. अमित शाह ने बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया. नतीजा 2014 के लोकसभा चुनाव में सामने आया. उत्तर प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में भाजपा ने 71 पर जीत दर्ज की. भाजपा की यही बेमिसाल जीत 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में आधार बनी. समाजवादी पार्टी के हाथ से यूपी की कमान निकल गई. योगी आदित्यनाथ सूबे के सीएम बने. 2022 में योगी के काम और नरेंद्र मोदी के नाम पर अगर यूपी की जनता ने दोबारा भाजपा को बहुमत दी तो इसमें अमित शाह के बूथ स्तर पर तैयार किए गए सांगठनिक ढांचे की भूमिका भी कम न थी.
ज्यादातर मामलों में शाह सफल
अमित शाह जो ठान लेते हैं, ज्यादातर मामलों में उन्हें सफलता मिल ही जाती है. उनके कामकाज का तरीका औरों से अलग होता है. वे जो काम करने जा रहे होते हैं, उससे पहले उसका वे बड़ी बारीकी से अध्ययन करते हैं. गृह मंत्रालय का प्रमुख होने के नाते उन्हें किसी की कमी-कमजोरी खोजना मुश्किल नहीं होता. इसे समझने के लिए दशक भर पीछे चलना होगा. गुजरात में राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने थे. सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल तब कांग्रेस कोटे से प्रत्याशी थे. उनकी जीत में कोई संशय नहीं था. अमित शाह की रणनीति से अहमद पटेल का खेल बिगड़ गया. हुआ यह कि भाजपा ने कांग्रेस के ही एक विधायक को उम्मीदवार बना दिया. उनके समर्थन में कांग्रेस के 6 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया. विधायकों में मची भगदड़ को रोकने के लिए कांग्रेस ने बाकी विधायकों को कर्नाटक भेज दिया. कर्नाटक में वे जिसके मेहमान बने, उसी के यहां केंद्रीय एजेंसियों ने दस्तक दे दी. ऐसी होती है अमित शाह की रणनीति, जिसकी वजह से उन्हें चुनावी चाणक्य लोग कहते हैं.
पटना पहुंचे अमित शाह का सीएम नीतीश कुमार ने स्वागत किया.
बिहार में अमित शाह जमाएंगे डेरा
बिहार में अमित शाह की रणनीति कितनी कारगर होती है, यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा. वैसे अमित शाह के बिहार में डेरा डालने की घोषणा से यह संकेत जरूर मिलता है कि वे इस बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनाने का संकल्प ले चुके हैं. उनकी कामयाबी में संदेह की गुंजाइश सिर्फ इतनी भर दिखती है कि बंगाल में तमाम तरह की रणनीति के बावजूद भाजपा 2021 में ममता बनर्जी का कुछ बिगाड़ नहीं पाई थी. वैसे शाह की ऐसी असफलता के अनेक नहीं, इक्का-दुक्का उदाहरण ही मिलेंगे. ज्यादातर मामलों में वे कामयाब ही रहे हैं. बिहार की अगली सरकार भाजपा के ही नेतृत्व में बनेगी, इसका इशारा वे पहले ही कर चुके हैं. उन्होंने एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि चुनाव नीतीश कुमार के ही नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, लेकिन सीएम फेस का फैसला संसदीय बोर्ड की बैठक में होगा. शनिवार को पटना में भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में भी उन्होंने दोहराया कि नीतीश के नेतृत्व में ही एनडीए चुनाव लड़ेगा. पर, अगला सीएम कौन होगा, इस पर वे चुप रह गए.
शाह के आने से सहमा रहा RJD!
अमित शाह ने बिहार में दस्तक दे दी है. अब वे विधानसभा चुनाव तक बिहार पर खास नजर रखेंगे. कहा तो यह है कि वे बिहार में डेरा जमाएंगे. संभव है, चुनाव के कुछ महीने बचें तो बिहार आने की उनकी फ्रिक्वेंसी बढ़ जाए. डेरा जमाने में संदेह इसलिए है कि उनके जिम्मे कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी है. बिहार में दो दिन रह कर उन्होंने सबके होश फाख्ता कर दिए थे. महागठबंधन को भय सता रहा था कि कहीं विकासशील इंसान पार्टी (VIP) सुप्रीमो मुकेश सहनी को वे न खिसका लें. प्रसंगवश यह उल्लेख आवश्यक है कि मुकेश सहनी को लोकसभा चुनाव से पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन्हें Y+ सेक्योरिटी मुहैया कराई थी. तब भी यह चर्चा थी कि सहनी एनडीए में वापसी कर सकते हैं. इस पर भाजपा नेताओं या एनडीए के साथियों से कोई चर्चा की, इस बारे में जानकारी तो बाहर नहीं आई है, पर अभी निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता. सहनी अभी महागठबंधन में आरजेडी के भरोसेमंद साथी हैं. जेडीयू नेताओं को भय था कि कहीं नीतीश कुमार की सेहत को लेकर कोई अप्रीय फैसला न सुना दें. हालांकि शाह ने अब सबको निश्चिंत कर दिया है कि चुनाव तक कोई खतरा नहीं है. नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा.
अमित शाह बिहार पर अगर नजर रख रहे हैं तो तीन बातें हो सकती हैं. पहला कि विपक्ष में तोड़-फोड़ की जाए. महागठबंधन से वीआईपी को अलग किया जाए. यह उनके प्री पोल की प्राथमिकता में होगा. इससे इतर एक और महत्वपूर्ण काम वे यह कर सकते हैं कि कैसे सहयोगी दलों को भाजपा की शर्तों पर टिकट के लिए राजी किया जाए. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि एक साथ बिहार के जिन 6 लोगों के यहां प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने छापेमारी कर 11 करोड़ से अधिक नकदी बरामद की, वे सभी नीतीश कुमार के करीबियों में रहे हैं. इसमें भवन निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता तारिणी प्रसाद भी हैं, जिन्हें नीतीश सरकार ने एक्सटेंशन देकर रखा था. इसे जेडीयू पर चुपचाप भाजपा की बात मान लेने के लिए दबाव के तौर पर देखा जा रहा है. पोस्ट पोल स्केट्रेटजी के भी अमित शाह मास्टर माने जाते हैं. महाराष्ट्र में शिंदे को समझाने में शाह की ही भूमिका रही. शाह का करिश्मा तो जम्मू-कश्मीर में भी दिखा था, जब 2014 में भाजपा ने पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार में भागीदारी की थी.







