भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर को 92 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्होंने 22 मई 2004 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आम चुनाव में जीत हासिल की थी. इसके बाद दूसरी बार 2009 में भी प्रधानमंत्री रहे, जब कांग्रेस पार्टी ने पहले से भी ज्यादा आंकड़े के साथ जीत हासिल की.
उनके नेतृत्व में भारत ने 7.7 फीसदी की औसत आर्थिक विकास दर का अनुभव किया. इस दौरान लाखों लोग गरीबी से बाहर निकले. मनमोहन सरकार ने समावेशी विकास के लिए कई सामाजिक कल्याण उपायों को शुरू किया. उनके कार्यकाल में सबसे बड़ा सामाजिक कल्याण कार्यक्रम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) था, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा नौकरी गारंटी योजना माना जाता है.
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में भी 2009 चुनाव में यूपीए की जीत का श्रेय मनमोहन सिंह को दिया था. लेकिन कांग्रेस पार्टी इस जीत का श्रेय राहुल गांधी को देना चाहती थी.
मनमोहन सिंह को श्रेय लेने में नहीं थी कोई दिलचस्पी?
संजय बारू की किताब में यह साफ तौर पर कहा गया है कि मनमोहन सिंह ने अपनी सत्ता का कंट्रोल सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी को सौंप दिया था. एक घटना का जिक्र करते हुए किताब में लिखा गया है कि जब पूरे देश में मनरेगा (NREGS) को विस्तार देने का श्रेय प्रधानमंत्री को दिया जा रहा था, तो कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि इसका श्रेय राहुल गांधी को मिले.
बारू ने किताब में लिखा है कि जब उन्हें पता चला कि कांग्रेस को मीडिया द्वारा मनमोहन सिंह को श्रेय दिए जाने पर आपत्ति है, तो उन्होंने प्रधानमंत्री से इस बारे में बात की. उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री चुपचाप बैठे रहे. मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि पार्टी इस फैसले का पूरा श्रेय राहुल को देना चाहती है. लेकिन आपको और (ग्रामीण विकास मंत्री) रघुवंश प्रसाद को भी उतना ही श्रेय मिलना चाहिए.”
इस पर मनमोहन सिंह नाराज हो गए. बारू ने आगे लिखा कि मनमोहन सिंह ने उन पर गुस्सा करते हुए कहा, “मुझे अपने लिए कोई श्रेय नहीं चाहिए. मैं नहीं चाहता कि आप मेरी छवि को बचाएं.”
इससे पता चलता है कि कैसे मनमोहन सिंह अपनी छवि बनाने या श्रेय लेने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते थे और पार्टी के फैसलों के आगे झुक जाते थे.
असल में मनमोहन सिंह को बड़े फैसले लेने का नहीं था अधिकार?
किताब में कुछ घटनाओं के जरिए यह भी दिखाया गया है कि कैसे प्रधानमंत्री असल में सत्ता में नहीं थे. एक वाकये में बताया गया है कि कैसे मनमोहन सिंह ने मई 2007 में ए राजा को दूरसंचार मंत्रालय दे दिया था. यह डीएमके प्रमुख करुणानिधि के कहने पर किया गया था, जिन्होंने चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान सिंह को बताया था कि ‘ए राजा दिल्ली में उनके मुख्य प्रतिनिधि होंगे’.
एक और उदाहरण में बताया गया है कि जनवरी 2006 में मंत्रिमंडल में फेरबदल के दौरान आंध्र प्रदेश के नेता सुब्बिरामी रेड्डी को अंतिम समय में शामिल किया गया था. राष्ट्रपति को भेजे जाने वाले प्रधानमंत्री के पत्र में पहले से ‘हरीश रावत’ का नाम लिखा हुआ था, लेकिन सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के अंतिम समय में रेड्डी को शामिल करने के अनुरोध के बाद रावत के नाम पर ‘सफेद पेंट’ लगाकर रेड्डी का नाम लिख दिया गया.

संजय बारू का दावा है कि अहमद पटेल अक्सर साउथ ब्लॉक (प्रधानमंत्री कार्यालय) जाते थे, लेकिन प्रधानमंत्री से मिलने नहीं, बल्कि पीएम के प्रमुख सचिव पुलक चटर्जी से मिलने. वो उनसे सिफारिश करते थे कि कांग्रेस पार्टी के सदस्यों को सरकारी कंपनियों और बैंकों के बोर्ड में जगह दी जाए. किताब में यह भी बताया गया है कि मंत्री प्रधानमंत्री के प्रति वफादार नहीं थे क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी कांग्रेस अध्यक्ष (सोनिया गांधी) की वजह से मिली थी, न कि मनमोहन सिंह की वजह से.
2009 चुनाव में UPA की जीत का श्रेय किसे मिलना चाहिए?
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार ने एबीपी न्यूज से कहा, ‘मनरेगा योजना सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह दोनों की ही सोच थी. इसका श्रेय दोनों को ही जाता है. मनरेगा योजना ने एक नजरिया दिया, ये मुफ्त वाली योजनाओं से अलग हटकर योजना थी. फ्रीबीज में सिर्फ दिया जाता है, यहां काम के बदले पैसा दिया जाता है. इससे देश में पैसों का लेनदेन बढ़ा और सबसे कमजोर तब्का के हाथ में कैश आया.’
प्रेम कुमार ने आगे कहा, “संजय बारू जी के अपने विचार हैं. उन्होंने कुछ अपने सोर्स के आधार पर यह बात कही होगी. लेकिन इसी बात को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता. क्योंकि 2009 के बाद 2014 चुनाव में कांग्रेस की हुई, जबकि उस वक्त भी मनरेगा एक फैक्टर था. बल्कि दूसरे नए फैक्टर भी आ गए, जैसे- राइट टू फूड, राइट टू एजुकेशन. मनमोहन सरकार को इन फैक्टर्स का फायदा 2014 चुनाव में भी मिलना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जाहिर सी बात है 2014 में मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार व्यक्ति और नेतृत्व वाले शख्स पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा, जिस कारण सत्ता से हाथ धोना पड़ा.”
राहुल गांधी को क्यों नहीं मिलना चाहिए जीत का श्रेय?
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार ने इस पर कहा, “उस वक्त जब राहुल गांधी सरकार का चहेरा ही नहीं थे, कांग्रेस पार्टी का भी चहेरा नहीं थे, तो राहुल गांधी को श्रेय कैसे मिल सकता है. ये चाहत खुद से क्रिएट करना और कांग्रेस पार्टी के भीतर मतभेद दिखाना किसी की पसंद या एजेंडा हो सकता है. लेकिन जब तब सरकार का चहेरा मनमोहन सिंह थे, तो क्रेडिट मनमोहन सिंह को जाएगा.”
उन्होंने आगे कहा, “मनमोहन एक स्थापित चहेरा थे, आर्थिक क्षेत्र में भारत का आईना थे, वित्त मंत्री, आरबीआई गवर्नर के रूप में अपने आपको साबित किया. एक स्थापित अर्थशास्त्री जब प्रधानमंत्री के रूप में एक योजना लागू कर रहे हैं तो किसी और को श्रेय दिए जाने का कैसे अवसर मिल सकता है.”
मीडिया ने मनमोहन सिंह को क्यों दिया बढ़ावा?
इस पर एबीपी न्यूज ने ‘इंदिरा फाइल्स’ के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा से बात की. उन्होंने विस्तार से पॉलिटिकल सिस्टम समझाया. विष्णु शर्मा ने कहा, “पॉलिटिकल सिस्टम में एक तरफ बीजेपी-आरएसएस ताकत है और दूसरी तरफ वो धड़ा है जो जहां अपना फायदा देखते है वहां चले जाते हैं. ये दूसरे धड़े वाले लोग कभी कांग्रेस के साथ हो जाते हैं, तो कभी कांग्रेस के खिलाफ जाकर तीसरा मोर्चा बना लेते हैं. वामपंथ को भारत में कभी कोई बड़ा आधार मिल नहीं पाया. केरल में उनकी पहली सरकार बनी, तो इंदिरा गांधी ने गिरवा दी थी. ये लोग न कांग्रेस के साथ हैं, न पराए हैं. ये लोग बात करते हैं कि वह बीजेपी-आरएसएस विरोधी हैं, लेकिन असल में उनका अपना एक एजेंडा होता है. उन्हीं के बहुत सारे पत्रकार भी हैं. ये एक बड़ी लॉबी है.”
“ये लॉबी 2009 और 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान चैनल्स पर हाबी थी. उस वक्त चैनल्स में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जो बीजेपी-आरएसएस का करीबी रहा हो. ज्यादातर लोग एंटी-बीजेपी और एंटी संघ थे. वह लोग जिसे चाहें उसे उठा सकते थे. अन्ना आंदोलन कांग्रेस के खिलाफ था, फिर भी ऐसे आंदोलन को बढ़ावा दिया गया. ये लोग असल में किसी राजनीतिक पार्टी के साथ नहीं थे, बल्कि इंडिपेंडेंट थे. ये लोग असल में सरकार पर प्रेशर बनाकर अपने लिए कुछ भला करवाना चाहते थे. जैसे किसी को सरकारी पद चाहिए, तो कोई पदभूषण पुरस्कार से सम्मानित होना चाहता है. एक तरह से सरकार को ब्लैकमेल किया जाता था. उस वक्त कांग्रेस इन चीजों का ज्यादा शिकार हुई, क्योंकि कांग्रेस ने खुद इन चीजों को ज्यादा बढ़ावा दिया.”
विष्णु शर्मा ने आगे कहा, “ये लॉबी कभी नहीं चाहती कि देश में कोई ताकतवर प्रधानमंत्री बने. इसलिए मोदी के आने से भी इन लोगों को दिक्कत हुई है और गांधी परिवार का कोई भी सदस्य अगर प्रधानमंत्री बनेगा, तो भी ताकतवर ऐसा होगा. अगर राहुल गांधी वहां बैठ जाते हैं, तो इस लॉबी को दिक्कत होगी. इसी वजह से इन्होंने मनमोहन सिंह को बढ़ावा देना शुरू किया. मनमोहन सिंह ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए हैं. उनका अपना कोई जनाधार नहीं है, आजतक लोकसभा चुनाव नहीं जीता. मेरा निजी विचार है प्रधानमंत्री बनने के लिए जनाधार होना चाहिए, कोई किसी फील्ड में एक्सपर्ट है इसलिए प्रधानमंत्री नहीं होना चाहिए.”







