अभी तो मैंने 1 ही बुलेट दागी है और इतनी हलचल है। ऐसी 10 बुलेट दागेंगे तो पता ही नहीं चलेगा ऊपर से क्या गया और नीचे से क्या खिसक गया।
मैंने 10 साल में जिसका भी हाथ थामा है, उसे कभी हारने नहीं दिया। अब मैंने बिहार के लोगों का हाथ थामा है। भरोसा रखिए आपको भी हारने नहीं देंगे।
जनसुराज पदयात्रा के दौरान 1 साल पहले हाजीपुर में प्रशांत किशोर ने ये बयान दिया था। उस वक्त MLC चुनाव में सारण से अपने समर्थित कैंडिडेट अफाक अहमद की जीत के बाद पीके ने यह दावा किया था। पीके इसे ही अपनी पहली बुलेट बता रहे थे। 2 अक्टूबर को प्रशांत अपनी पार्टी का ऐलान करने जा रहे हैं। जिन 10 बुलेट्स की ओर प्रशांत इशारा कर रहे थे। वे शायद अब निकलने वाली है।
इधर, प्रशांत किशोर के पार्टी बनाने के ऐलान के साथ ही राजद, जदयू और भाजपा समेत अन्य पॉलिटिकल पार्टियों की नींद उड़ गई है। और यह बात बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के हाल में लिखे पत्र से भी जाहिर है।
प्रशांत संभवत: 2 अक्टूबर को पार्टी की घोषणा कर सकते हैं। इसके बाद बिहार में भाजपा, कांग्रेस, जदयू, राजद, लोजपा, हम, सीपीआई, माले, एआईएमआईएम के अलावा एक और राजनीतिक पार्टी होगी। जन सुराज ने पहले ही कहा है कि जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी होगी। पीके के इसी कदम के चलते अन्य दल चिंतित हैं, क्योंकि अब सभी के सामने विधानसभा चुनाव है। कोई भी रिस्क उठाने के मूड में नहीं है, इसलिए कैंडिडेट सिलेक्शन से लेकर कास्ट कॉम्बिनेशन तक सब कुछ फूंक-फूंककर करने की प्लानिंग बनानी भी शुरू कर दी है।
बिहार की नब्ज समझने में पूरा समय लगाया
जन सुराज बनाने के बाद प्रशांत किशोर ने बिहार की नब्ज समझने में पूरा समय लगाया। वे गांव-गांव जाकर लोगों को बता रहे हैं कि गांवों के विकास की उनकी रणनीति क्या है? गरीबों को सीख दे रहे हैं कि बच्चों को पढ़ाइए, जो सही जनप्रतिनिधि हो, उसको चुनने का हौसला रखिए।
एक राजनेता बनने से पहले प्रशांत किशोर जेडीयू, बीजेपी जैसी पार्टियों के चुनावी रणनीतिकार भी रह चुके हैं। नीतीश कुमार उनकी चुनावी रणनीति से खासा प्रभावित रहे हैं। प्रशांत ने जब नीतीश कुमार का साथ छोड़ा था, तब नीतीश कुमार ने कहा था कि अमित शाह के कहने पर प्रशांत किशोर को अपने साथ जदयू में लाए थे।
नीतीश ने जदयू में बड़ा पद भी प्रशांत किशोर को दिया। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। तब यह माना गया था कि पार्टी के अंदर फैसला लेने में नीतीश कुमार के बाद नंबर-2 की पोजिशन प्रशांत किशोर को दी गई।
टिकट बंटवारे में जन सुराज और अन्य दलों में क्या हो सकता है अंतर
जन सुराज में विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी चयन में ब्लॉक स्तर की कमेटी, डिस्ट्रिक्ट स्तर की कमेटी के सदस्यों की राय को तरजीह दी जाएगी। जानकारी है प्रशांत किशोर खुद किसी के नाम का चयन नहीं करेंगे।
टिकट के चयन में यह देखा जाएगा कि राजनीति में परिवारवाद तो नहीं हो रहा है। यानी ज्यादा से ज्यादा नए लोगों को चुनाव लड़ने के लिए चुना जा सकता है।
जबकि, आरजेडी और जेडीयू में टिकट बंटवारे के लिए इस पर सबसे अधिक फोकस रहता है कि कैंडिडेट जीतने वाला हो। इसलिए कई बार दबंगों या दबंगों की पत्नियों को टिकट मिल जाता है।
दूसरा ख्याल जातीय समीकरण का रखा जाता है। इसके लिए निचले स्तर के नेताओं से फीडबैक लिए जाते हैं। लेकिन, अंतिम तौर पर फैसला राज्य स्तर से या पार्टी के सुप्रीमो ही करते हैं। बीजेपी और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों में टिकट का फैसला अंतिम रूप से केन्द्रीय चुनाव कमेटी करती है। राज्य की कमेटी अनुशंसा करती है। कई बार ऑब्जर्वर भी नियुक्ति किए जाते हैं।
प्रशांत किशोर को लेकर क्या कहते हैं तेजस्वी
तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल प्रशांत किशोर को हमेशा बीजेपी की ‘बी’ टीम बताती है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने बहुत पहले ही कहा था ‘यहां तक कि मेरे चाचा (नीतीश कुमार) ने भी कहा था कि उन्होंने अमित शाह के कहने पर प्रशांत किशोर को (जदयू का) राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था। आज तक न तो अमित शाह और न ही प्रशांत किशोर ने इस दावे से इनकार किया है। वह भाजपा के साथ रहे हैं शुरू से ही। प्रशांत जिस भी पार्टी में शामिल होंगे, वह बर्बाद हो जाएगी।’
तेजस्वी ने यह भी कहा था कि ‘पता नहीं उन्हें पैसा कहां से मिलता है। वह हर साल अलग-अलग लोगों के साथ काम करते रहते हैं। वह आपका डेटा लेते हैं और दूसरों को दे देते हैं। वह सिर्फ बीजेपी के एजेंट नहीं हैं, बल्कि बीजेपी का दिमाग हैं। वह उनकी विचारधारा का पालन करते हैं। बीजेपी अपनी रणनीति के तहत उन्हें फंडिंग कर रही है।’
अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर में अंतर
अरविंद केजरीवाल जब राजनीति में आए थे, तब लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था। यह कोई सोच नहीं सकता था कि शीला दीक्षित जैसी ताकतवर मुख्यमंत्री को वे चुनौती दे देंगे। बीजेपी भी दिल्ली में उनको पछाड़ नहीं पाई। केजरीवाल के पास अन्ना हजारे जैसे सत्याग्रही थे।
प्रशांत के पास ऐसे कोई साधक नहीं दिख रहे। प्रशांत किशोर की तुलना केजरीवाल से नहीं की जा सकती। केजरीवाल एक सधे हुए आरटीआई एक्टिवस्ट और ब्यूरोक्रेट्सस रहे। बिजली, पानी के सवाल पर आंदोलन भी किया और सरकार बनने पर समाधान भी। प्रशांत किशोर, विभिन्न पार्टियों के लिए रणनीति बनाने का काम करते रहे। उनकी छवि सोशल एक्टिविस्ट के रूप मे कभी नहीं रही, न ही उन्होंने समाज में कोई आंदोलन किया। पद यात्रा के जरिए वे राजनीति में आगे बढ़ने का प्रयोग कर रहे हैं।
प्रशांत किशोर को राजनीतिक पार्टी का पीआर करने से फुर्सत नहीं- आरजेडी
आरजेडी जनसुराज को बीजेपी की बी टीम मानती है। प्रवक्ता एजाज अहमद कहते हैं कि लोकतंत्र में किसी को भी पार्टी बनाने का अधिकार है। लेकिन, जनता जिस पर विश्वास करती है, वही सफल होता है। सफल वह तभी होता है जब वह जनता और जनता के हितों के लिए काम करता है। जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं के निपटारे में साथ देता है, संघर्ष में साथ देता है।







