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बिहार में NDA को टक्कर देना महागठबंधन के लिए आसान नहीं दिखता …..

UB India News by UB India News
April 11, 2024
in पटना, बिहार, ब्लॉग
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बिहार में NDA को टक्कर देना महागठबंधन के लिए आसान नहीं दिखता …..

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बिहार में विपक्षी गठबंधन में आरजेडी का अभी जलवा है। अव्वल तो आरजेडी ने अपने ढंग से सीटों का बंटवारा किया। अपने कोटे में 26 सीटें रखीं। बाद में तीन सीटें मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआई) को देकर उसे भी इंडी अलायंस का हिस्सा बना लिया। बाकी बची 23 में सिवान को छोड़ कर सारी सीटों पर आरजेडी ने उम्मीदवार उतार दिए हैं। अलायंस के दूसरे दल भी अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर रहे हैं। कांग्रेस उम्मीदवार चयन में ही उलझी है। सिवान में आरजेडी से चुनाव लड़ती रहीं भूतपूर्व सांसद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब अब निर्दलीय बन गई हैं। कांग्रेस में शामिल हुए पप्पू यादव पूर्णिया में आरजेडी उम्मीदवार को ही ललकार रहे हैं। खैर, 2019 के मुकाबले इस बार आरजेडी ने तीन अधिक सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। पिछली बार भी आरजेडी ने कांग्रेस, उपेंद्र कुशवाहा की तत्कालीन रालोसपा, जीतन राम मांझी की हम पार्टी, मुकेश सहनी की वीआईपी और शरद यादव की पार्टी को लेकर महागठबंधन बनाया था। वाम दल महागठबंधन में नहीं थे। उनमें सीपीआई को छोड़ किसी ने उम्मीदवार भी नहीं उतारा था। इस बार उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी महागठबंधन यानी इंडी अलायंस में नहीं हैं, पर वाम दल साथ आ गए हैं। मसलन विपक्ष की गोलबंदी 2019 जैसी ही पुख्ता दिखती है।

महागठबंधन 2019 में एनडीए के सामने नहीं टिका

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्षी दलों ने मजबूत मोर्चा बनाया था, पर एनडीए में शामिल सिर्फ तीन दलों ने भीड़ भरे महागठबंधन को धूल चटा दी। बिहार की कुल 40 में 39 सीटें एनडीए के खाते में आसानी से चली गईं। सिर्फ किशनगंज की एक सीट कांग्रेस ने जीती। आरजेडी तो खाता ही नहीं खोल पाया। फिर छोटे दलों की क्या बिसात। तब न लालू यादव या तेजस्वी यादव का कोई करिश्मा चला और न कांग्रेस कोई करामात कर पाई। एनडीए को सीधी टक्कर देने के महागठबंधन के नेताओं के मंसूबे पर पानी फिर गया। ऐसा तब हुआ, जब महागठबंधन जोर-शोर से यह मुद्दा उछाल रहा था कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में जो वादे किए थे, वे पूरे नहीं हुए। मसलन 15 लाख रुपए लोगों के खाते में नहीं आए, महंगाई घटने के बजाय बढ़ गई और दो करोड़ लोगों को नौकरी का वादा पूरा नहीं हुआ।

इंडी अलायंस के मूल चुनावी मुद्दे 2019 जैसे ही हैं

इस बार भी इंडी अलायंस के मूल मुद्दे तकरीबन वही हैं, जो 2019 में थे। यानी नरेंद्र मोदी की सरकार की आलोचना। इनमें अगर कोई नया जुड़ा है तो विपक्षी दलों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में सेंट्रल एजेंसियों की कार्रवाई है। विपक्षी नेता मानते हैं कि विपक्ष को दबाने के लिए मोदी की सरकार ने सेंट्रल एजेंसियों को उनके पीछे लगा रखा है। विपक्षी नेता रोजगार के वादे कर रहे हैं। महागठबंधन की 17 महीने की सरकार में नौकरियां मिलने को नजीर बना रहे हैं। बिहार में इंडी अलायंस को लीड करने वाले आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव इसी आधार पर लोगों से वोट देने की अपील कर रहे हैं।

आरजेडी 20 सीटों पर लड़कर शून्य पर सिमटा था

वर्ष 2019 में राज्य की कुल 40 सीटों में से 20 पर अकेले आरजेडी ने उम्मीदवार उतारे थे। उसके खाते में एक भी सीट नहीं आई। कांग्रेस ने नौ पर और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने पांच पर उम्मीदवार उतारे। कांग्रेस ने एक सीट जीती और कुशवाहा की पार्टी आरजेडी की तरह खाली हाथ रह गई। जीतन राम मांझी ने तीन और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने भी तीन सीटों पर भाग्य आजमाया, पर कामयाब नहीं हुए। बेगूसराय की एक सीट पर सीपीआई ने कन्हैया कुमार को खड़ा किया, पर उन्हें भी खाली हाथ रह जाना पड़ा। भाजपा उम्मीदवार को जो वोट मिले, वे आरजेडी और सीपीआई के सम्मिलित वोटों से भी अधिक थे।

सर्वाधिक वोट पाकर एनडीए ने सबको पछाड़ दिया था

इस बार इंडी अलायंस बना कर और छह पार्टियों के साथ विपक्ष एनडीए से मुकाबले के लिए ताल ठोंक रहा है। उसे भरोसा है कि विपक्षी वोटों का बिखराव इससे रुकेगा और एनडीए को शिकस्त देना आसान हो जाएगा। पर, यह इतना आसान नहीं है। कम से कम पिछला अनुभव तो यही बताता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को 21.81 प्रतिशत वोट मिले थे और भाजपा ने 23.58 फीसदी वोट पाए थे। एलजेपी को तकरीबन 8 प्रतिशत मत मिले थे। इस तरह एनडीए ने तकरीबन 53 प्रतिशत वोटों से अपनी झोली भर ली थी। भाजपा ने 17, जेडीयू ने 16 और एलजेपी ने छह सीटें यानी एनडीए ने 40 में 39 सीटें आसानी से जीती थीं।

अब जरा विपक्षी दलों के वोट शेयर पर गौर कीजिए

लोकसभा चुनाव 2019 में बिहार में कांग्रेस ने ही एक सीट पर जीत हासिल कर खाता खोला था। कांग्रेस का वोट शेयर 7.7 प्रतिशत रहा। 2014 में यह 8.6 प्रतिशत था। कांग्रेस के वोट शेयर में गिरावट से स्पष्ट हो जाता है कि महागठबंधन में रहने के बावजूद कांग्रेस को फायदे के बजाय एक फीसद वोटों को नुकसान हुआ। 20 सीटों पर लड़ने के बावजूद आरजेडी का कोई उम्मीदवार नहीं जीता और उसे 15.4 प्रतिशत ही वोट मिले, जो 2014 के संसदीय चुनाव में मिले 20.5 प्रतिशत वोटों से करीब पांच फीसद कम थे। यानी महागठबंधन में छह दलों की भीड़ जुटाने का लाभ उसे नहीं मिला। उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी ने चार सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसे जीत तो नहीं मिली, लेकिन 3.58 प्रतिशत वोट जरूर मिले। दूसरी पार्टियों ने भी 2019 का चुनाव बिहार में लड़ा था, जिनमें आप, एआईएफबी, एआईएमआईएम, एआईटीसी, सीपीआई, सीपीआई (एम), जेएमएम, जेकेएनपीपी और अन्य पार्टियों के सम्मिलित वोट 14.5 प्रतिशत थे। यानी तकरीबन 42-43 प्रतिशत वोट गैर एनडीए खेमे में गए। अब कोई कहे कि इस बार विपक्षी गठबंधन मजबूत है और एनडीए को टक्कर देने में कामयाब रहेगा तो यह कैसे संभव है, जब पिछले चुनाव के आंकड़े ही आपको चिढ़ाते नजर आते हैं !

ऐसे में कैसे एनडीए को टक्कर दे पाएगा महागठबंधन

भाजपा के पास इस बार गिनाने को मोदी सरकार की बीसियों उपलब्धियां हैं। भ्रष्टाचार, राजनीति में परिवारवाद, दहशतगर्दों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान और हिन्दुत्व के नाम पर राम मंदिर जैसे काम भाजपा के पास हैं। विपक्षी नेताओं के भ्रष्टाचार का भांडा फूटने से विपक्ष की हवा तो वैसे ही खराब है। नेता भले एकजुट हो जाएं, पर जनता तो देख रही है कि कैसे नेताओं की नामी-बेनामी संपत्ति बाहर आ रही है। उनका भ्रष्टाचार उजागर हो रहा है। वे पकड़े जा रहे हैं तो उनके खिलाफ पुख्ता सबूत देख कर अदालतों से भी राहत नहीं मिल रही। वैसे भी भाजपा ने 2014 से अब तक जिस तरह अपने जनाधार को मजबूत किया है, उसको तोड़ पाना आसान नहीं होगा। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 2019 में 436 निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा मैदान में थी। आधे से अधिक सीटों पर भाजपा ने 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर हासिल किए। इसी वोट शेयर से भाजपा ने 224 सीटें जीत लीं। 1984 के चुनाव में कांग्रेस की सफलता ने रिकार्ड बनाया था, लेकिन उसके बाद सफलता का उल्लेखनीय रिकार्ड भाजपा का ही रहा है। 2014 के लोकसभा चुनावों में केवल 136 भाजपा सांसदों ने 50 प्रतिशत या उससे अधिक वोट शेयर लिए थे, जबकि 2019 में यह संख्या 200 से ऊपर हो गई। इसलिए विपक्षी गठबंधन अगर एनडीए को टक्कर देने की बात सोचता है तो आंकड़ों को देखते हुए यह ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं माना जाना जा सकता।

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