चुनाव आते ही हर बार की तरह इस बार भी नेताओं में दल बदलने की होड़ लगी है। बीते कई दिनों से रोज कोई न कोई नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे दल का दामन थाम रहा है। भाजपा और कांग्रेस के साथ ही बाकी दलों में भी आवाजाही की हलचल है।
हालांकि आंकड़े बताते हैं कि दलबदलू नेताओं के जीतने का औसत लगातार कम हो रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनाव में ऐसे नेताओं की जीत का स्ट्राइक रेट 15% था, जबकि 1967 के चुनाव में यह 50% था। देश में दल-बदल का रिकॉर्ड 1980 में बना था। यह वही समय था जब इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद दोबारा सत्ता में आई थीं।
1977 के आमचुनाव में दलबदलुओं की जीत का औसत सर्वाधिक रहा। तब 68.9% बागी नेताओं ने जीत दर्ज की थी। आंकड़े बताते हैं, 1960 के दशक से लेकर 2019 के आमचुनावों तक दलबदलुओं के जीतने का औसत 30% है।
आंकड़े बताते हैं कि 2004 तक ऐसे नेताओं के जीतने का औसत ज्यादा था, पर 2004 के बाद से यह लगातार कम होता जा रहा है। अशाेका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल सेंटर के विश्लेषण से यह बात सामने आई है।
दलबदलुओं के जीतने का ट्रेंड घट रहा

- 2004 लोकसभा चुनाव से दल बदलने वाले नेताओं के जीतने का ट्रेंड घटता जा रहा है। 2019 में यह घटकर अपने सबसे न्यून्तम औसत पर पंहुच गया। 1977 में एेसे नेताओं के जीतने का औसत सबसे ज्यादा था।
- 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 8,000 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। इनमें से 2.4% यानी 195 दल-बदलकर चुनाव लड़े थे। हालांकि रिजल्ट आया तो इनमें से सिर्फ 29 ही जीत सके। 1980 में सबसे ज्यादा 377 उम्मीदवारों ने पाला बदला था।
हाल के दिनों में दल बदलने वाले कुछ चर्चित सांसद
- हरियाणा के हिसार से भाजपा सांसद ब्रिजेंद्र सिंह पाला बदल कांग्रेस में गए।
- गीता कोरा (कांग्रेस सांसद) भाजपा में शामिल हुईं, पार्टी उन्हें झारखंड के सिंहभूम से चुनाव लड़ाएगी।
- इसके अलावा तेलंगाना से बीआरएस सांसद जी रंजीथ रेड्डी पार्टी बदल कांग्रेस में गए।
- संगीता आजाद (सांसद- लालगंज, यूपी) बसपा से भाजपा, राहुल कसवां (सांसद-राजस्थान, चूरू) भाजपा से कांग्रेस, दानिश अली (सांसद- अमरोहा, यूपी) बसपा से कांग्रेस, और पी भारत (सांसद-नागरकुरनूल, तेलंगाना) बीआरएस से भाजपा, ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने हालिया दिनों में पाला बदला है।







