नेपाल की राजनीति में एक बार फिर वामपंथ की लहर आ गई है। नेपाली पीएम पुष्प कमल दाहाल प्रचंड की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) ने नेपाली कांग्रेस से गठबंधन तोड़ लिया है। उन्होंने चीन समर्थक केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल- UML, राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी और जनता समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर नई सरकार बनाई है। प्रचंड के इस फैसले से नेपाल संसद की सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस अब विपक्ष में बैठेगी और चीन इससे सबसे ज्यादा खुश है।
मंगलवार को बीजिंग में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, ‘चीन ने देखा है कि नेपाल सरकार ने हाल ही में एक नया गठबंधन बनाया है और अपने मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया है। हम उम्मीद करते हैं कि नेपाल में सभी दल एकजुट होकर नई सरकार के गठन से जुड़े काम को आगे बढ़ाने और राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास और लोगों की आजीविका में सुधार हासिल करने के लिए सहयोग करेंगे।’ उन्होंने आगे कहा कि पड़ोसी होने के नाते चीन नेपाल के साथ संबंधों को काफी महत्व देता है।
प्रचंड की पार्टी तीसरे नंबर पर
माओ ने कहा कि साझेदारी आगे और भी विकसित होगी और दोनों देशों के लोगों के लिए ज्यादा लाभ पैदा करेगी। भारत ने अभी तक नेपाल के राजनीतिक डेवलपमेंट के बारे में कोई बयान नहीं दिया है। नेपाल में 2022 में चुनाव हुआ था। नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की CPN-MC ने एकसाथ चुनाव लड़ा था। इसमें नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी। 78 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर केपी शर्मा ओली की पार्टी थी। वहीं तीसरे नंबर पर 32 सीटों के साथ पुष्प कमल दहल प्रचंड की पार्टी थी। लेकिन इसके बावजूद प्रचंड पीएम बनना चाहते थे।
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क्या भारत पर होगा असर?
नेपाल में इस तरह का सत्ता परिवर्तन भारत के लिए अच्छा नहीं है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि नई सरकार का भारत और चीन को लेकर झुकाव एकदम बदल जाएगा। प्रचंड और नेपाली कांग्रेस का गठबंधन भारत के पक्ष में था। वहीं अब वामपंथी पार्टियों के आने से चीन खुश हो गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे बुनियादी विदेश नीति नहीं बदलने वाली लेकिन नेपाल के प्रति धारणा बदलेगी।







