1993 में 5 शहरों में हुए सीरियल ब्लास्ट केस में आरोपी अब्दुल करीम टुंडा को गुरुवार को अजमेर की टाडा कोर्ट ने बरी कर दिया है। दो आतंकवादियों इरफान और हमीदुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
टुंडा, इरफान और हमीदुद्दीन को लेकर पुलिस गुरुवार सुबह करीब सवा 11 बजे कड़ी सुरक्षा के बीच टाडा कोर्ट पहुंची। तीनों 6 दिसंबर 1993 को लखनऊ, कानपुर, हैदराबाद, सूरत और मुंबई की ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाके के मामले में आरोपी थे। 20 साल पहले 28 फरवरी 2004 को टाडा कोर्ट ने ही मामले में 16 अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने चार आरोपियों को बरी कर बाकी की सजा बरकरार रखी थी, जो जयपुर जेल में बंद हैं।
आईएसआई से ली थी ट्रेनिंग
- 80 के दशक में अब्दुल करीम उर्फ टुंडा ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI से इसकी ट्रेनिंग ली थी। इसके बाद लश्कर-ए-तैयबा के संपर्क में आया था। 6 दिसंबर 1993 को ट्रेनों में विस्फोट के वक्त करीम टुंडा लश्कर का विस्फोटक विशेषज्ञ था।
- मुंबई के डॉक्टर जलीस अंसारी, नांदेड के आजम गौरी और करीम टुंडा ने ‘तंजीम इस्लाम उर्फ मुसलमीन’ संगठन बनाकर बाबरी विध्वंस का बदला लेने के लिए 1993 में पांच बड़े शहरों में ट्रेनों में बम धमाके किए थे।
- 1996 में दिल्ली में पुलिस मुख्यालय के सामने बम धमाके का आरोप भी टुंडा पर है। 1996 में सुरक्षा एजेंसी इंटरपोल ने उसका रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया।
- साल-2000 में टुंडा के बांग्लादेश में मारे जाने की खबरें आईं, लेकिन 2005 में दिल्ली में पकड़े गए लश्कर के आतंकी अब्दुल रज्जाक मसूद ने टुंडा के जिंदा होने का खुलासा किया।
- 2001 में संसद भवन पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से जिन 20 आतंकियों के प्रत्यर्पण की मांग की थी, उसमें टुंडा भी था।
- बम बनाते वक्त एक हाथ खो देने के बाद अब्दुल करीम का नाम ‘टुंडा’ पड़ा। उस पर करीब 33 क्रिमिनल केस हैं और करीब 1997-98 में करीब 40 बम धमाके कराने के आरोप हैं।
- देश में केवल तीन ही टाडा कोर्ट
- टाडा कानून के तहत पकड़े जाने वाले आरोपियों की सुनवाई के लिए देशभर में केवल तीन विशेष अदालत हैं। मुंबई, अजमेर और श्रीनगर। श्रीनगर कोर्ट अभी नई बनी है इसलिए उत्तर भारत से जुड़े ज्यादातर मामलों की सुनवाई अजमेर की टाडा कोर्ट में होती है। वहीं दक्षिण भारत से जुड़े मामलों में मुंबई में सुनवाई होती है।
1980 में आतंकी संगठनों के संपर्क में आया था
अब्दुल करीम उर्फ टुंडा उत्तर प्रदेश में हापुड़ जिले के कस्बा पिलखुवा का रहने वाला है। वह पिलखुवा कस्बे में कारपेंटर (बढ़ई) का काम करता था। इसके बाद कपड़े का कारोबार करने मुंबई चला गया। मुंबई के भिवंडी इलाके में उसके कुछ रिश्तेदार रहते थे। 1985 में भिवंडी के दंगों में उसके कुछ रिश्तेदार मारे गए। इसका बदला लेने के लिए उसने आतंकवाद की राह पकड़ी थी। 1980 के आस-पास वह आतंकी संगठनों के संपर्क में आया था।
टुंडा का राजस्थान कनेक्शन
लश्कर जैसे कुख्यात आतंकी गिरोह से जुड़े अब्दुल करीम का नाम टुंडा एक हादसे के बाद पड़ा था। साल 1985 में टुंडा टोंक जिले की एक मस्जिद में जिहाद की मीटिंग ले रहा था। इस दौरान वह पाइप गन चलाकर दिखा रहा था। तभी यह गन फट गई, जिसमें उसका हाथ उड़ गया। इसके कारण उसका नाम टुंडा पड़ गया।
करीब 30 साल प्रकरण की सुनवाई चली
वर्ष 1993 में सरकार बनाम डॉ जलीस अंसारी के नाम से प्रकरण दर्ज कर आरोपियों पर देश के पांच शहरों में ट्रेनों में सीरियल बम धमाके करने का आरोप है। इनमें कोटा के अमाली, कानपुर में दो ट्रेनों में, सूरत व मुंबई शामिल है। हादसे में सैकड़ों घायल हुए थे, जबकि एक जने की मौत हो गई थी। सीबीआई ने 1994 में प्रकरण को क्लब करते हुए टाडा कोर्ट अजमेर भेज दिया। करीब 30 साल प्रकरण में सुनवाई चली।
टाडा एक्ट में लगी थी अलग-अलग धाराएं
आरोपी इरफान की तरफ से कोर्ट में पैरवी कर रहे वकील अब्दुल रशीद ने बताया कि टाडा एक्ट के अलग-अलग धाराएं लगाई गई थीं। मामले में बचाव पक्ष की तरफ से 66 और 430 गवाह पेश किए गए थे। उन्होंने कहा कि टाडा एक्ट के तहत कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया था। इसका फायदा आरोपी को मिलेगा। इसमें कड़ी नहीं जुड़ रही थी। हमने अपनी तरफ से कोर्ट के सामने पक्ष रखा है।







