हिमाचल प्रदेश में महज 14 महीने पहले पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली कांग्रेस पर आज सरकार गंवाने का संकट मंडरा रहा है। पार्टी के आधा दर्जन से ज्यादा विधायक और मंत्री इसके लिए सीधे-सीधे CM सुखविंदर सिंह सुक्खू की वर्किंग स्टाइल और मिसमैनेजमेंट को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले विक्रमादित्य सिंह ने MLAs की सुनवाई न करने के आरोप लगाकर कांग्रेस हाईकमान को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
हिमाचल विधानसभा के चुनाव नतीजे 8 दिसंबर 2022 को आए और इनमें कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलते ही वीरभद्र गुट ने CM पद पर दावा ठोंक दिया था। स्व. वीरभद्र सिंह की धर्मपत्नी और हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह खुद इसकी अगुआई कर रही थीं। दूसरे धड़े में प्रियंका गांधी के करीबी और वीरभद्र के विरोधी रहे सुखविंदर सिंह सुक्खू खुद को प्रोजेक्ट कर रहे थे।
4 दिन (8 से 11 दिसंबर) चली रस्साकसी के बाद हाईकमान ने सुक्खू को CM बनाने का फैसला लिया। उसके बाद मंत्री बनाने से लेकर विभागों के बंटवारे और अपनी पसंद के नेताओं को पद देने के मुद्दे पर दोनों गुटों की तनातनी जगजाहिर है।
बहरहाल, हिमाचल के इतिहास में यह पहला मौका रहा, जब सत्तारूढ़ पार्टी पूर्ण बहुमत होने के बावजूद राज्यसभा चुनाव हार गई। BJP ने CM के प्रति कांग्रेसी MLAs की नाराजगी को देखते हुए बहुमत से 10 विधायक कम होने के बावजूद हर्ष महाजन को राज्यसभा चुनाव में उतारा और क्रॉस वोटिंग के बूते उन्हें जिताने में कामयाब रही।
राज्यसभा चुनाव में मुख्यमंत्री से नाराज कांग्रेस के 6 और 3 निर्दलीय विधायकों ने BJP कैंडिडेट के हक में क्रॉस वोटिंग की। दोनों प्रत्याशियों को 34-34 वोट मिलने के बाद लॉटरी निकाली गई जिसमें बाजी भाजपा उम्मीदवार के हाथ लगी।

अब पढ़िए वो 5 वजहें जिनके कारण ये संकट खड़ा हुआ…
1. विधायकों की नाराजगी को हल्के में लेना
CM सुक्खू की सबसे बड़ी चूक ये रही कि उन्होंने पार्टी के विधायकों की नाराजगी को गंभीरता से नहीं लिया। सुजानपुर के कांग्रेसी MLA राजेंद्र राणा और धर्मशाला के विधायक सुधीर शर्मा ने CM के सामने कई मसले उठाए। राणा ने तो CM को 2 बार खुले पत्र भी लिखे। इनमें से तीन पेज का आखिरी पत्र 31 जनवरी 2024 को ही लिखा गया।
राणा ने लंबे समय से लटकी भर्ती परीक्षाओं का रिजल्ट जल्दी निकालने, बेरोजगारों को नौकरी देने और कांग्रेस सरकार की ओर से भंग किए गए हिमाचल प्रदेश स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (HPSSC) को बहाल करने का मुद्दा अपने पत्रों में उठाया।
उन्होंने ने पिछली BJP सरकार में पुलिस कॉन्स्टेबल पेपर लीक मामले में DGP संजय कुंडू को हटाने की मांग भी की। पिछली सरकार के दौरान विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने कुंडू को पेपर लीक का मास्टरमाइंड बताते हुए राजभवन के बाहर प्रदर्शन किया था।
सरकार या मुख्यमंत्री के स्तर से राणा के इन पत्रों को लेकर कभी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
2. संगठन की अनदेखी पर प्रतिभा ने सार्वजनिक रूप से चेताया
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस संगठन की अनदेखी के आरोप भी लगते रहे हैं। पार्टी प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने एक बार नहीं बल्कि कई बार इसकी शिकायत हाईकमान से की।
दिसंबर 2023 के पहले हफ्ते में जब सरकार ने अपना एक साल पूरा होने पर धर्मशाला में बड़ा प्रोग्राम रखा तो उसकी जानकारी तक प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह को नहीं दी गई। 4 दिसंबर 2023 को प्रतिभा सिंह ने इस पर खुलकर अपनी पीड़ा जाहिर की थी। उनके बयान के अगले ही दिन CM उनसे मिलने पहुंच गए थे।
इसके महीनेभर बाद, 30 जनवरी 2024 को प्रतिभा सिंह ने मुख्यमंत्री पर सार्वजनिक रूप ये पार्टी संगठन की अनदेखी करने के आरोप लगाए। प्रतिभा सिंह ने कहा कि उन्होंने कांग्रेस नेताओं-वर्करों की एक लिस्ट CM को देकर उन्हें सरकार में एडजस्ट करने का आग्रह किया था।
मुख्यमंत्री ने भरोसा भी दिया, लेकिन संगठन के लोगों को महत्व नहीं मिला। प्रतिभा सिंह ने कहा था कि लोकसभा चुनाव से पहले अगर कांग्रेस के वर्कर घर बैठ जाएंगे तो ठीक नहीं होगा।
यही नहीं, पार्टी संगठन और सरकार में कई अन्य मुद्दों पर भी तनातनी देखने को मिलती रही। तीन मंत्रियों को भरोसे में लिए बगैर उनसे विभाग वापस लेने पर भी प्रतिभा सिंह ने आपत्ति जताई थी।
3. कैबिनेट विस्तार में देरी, दिग्गजों की अनदेखी
मुख्यमंत्री ने अपनी कैबिनेट का पहला विस्तार सरकार बनने के लगभग एक साल बाद 12 दिसंबर 2023 को किया। सुक्खू ने इसमें दो मंत्री बनाए और कैबिनेट में एक पद खाली रख लिया।
सालभर बाद हुए कैबिनेट विस्तार में प्रेम कुमार धूमल जैसे BJP के दिग्गज नेता को हराने वाले राजेंद्र राणा और पार्टी के वरिष्ठ विधायक सुधीर शर्मा को अनदेखा किया गया। यही अनदेखी पार्टी को भारी पड़ी क्योंकि यही दोनों विधायक राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले कांग्रेसी MLAs को एकजुट करने के सूत्रधार बने।
यही नहीं, 12 दिसंबर 2023 को जिन दो विधायकों को मंत्री बनाया गया, उन्हें एक महीने तक पोर्टपोलियो ही नहीं दिए गए। हिमाचल के इतिहास में पहली बार कोई मंत्री महीनेभर तक बिना पोर्टफोलियो के घूमते रहे।
सरकार की अनदेखी के कारण कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़ने की शुरुआत हफ्तेभर पहले कर दी थी। पूर्व मंत्री और मंडी जिला कांग्रेस के अध्यक्ष प्रकाश चौधरी और उनके दो दर्जन समर्थकों ने 15 फरवरी 2024 को पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया।
4. अफसर बदलने की मांग अनसुनी
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पार्टी के कई विधायकों ने अपने इलाकों में तैनात अफसरों के ट्रांसफर को लेकर सरकार से आग्रह किया, मगर उनके काम नहीं हुए। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान व्यवस्था परिवर्तन का नारा देने वाले सुखविंदर सिंह सुक्खू ने लंबे समय तक न तो मुख्य सचिव या DGP को हटाया और न ही जिलों के DC बदले। इससे विधायकों और पार्टी वर्करों में नाराजगी बढ़ती चली गई।
हिमाचल कांग्रेस के तमाम नेताओं को इस बात की शिकायत थी कि अपनी सरकार होते हुए भी वह लोगों के काम नहीं करवा पा रहे।
5. सरकार में गुट विशेष को तवज्जो
सुखविंदर सिंह सुक्खू के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद सरकार में ज्यादातर नियुक्तियां एक गुट से जुड़े लोगों की हुईं। मनमाने तरीके से कैबिनेट रैंक बांटे गए।
कांग्रेस विधायक राजेंद्र राणा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा था कि बिना चुनाव लड़े कैबिनेट रैंक पाने वाले लोग जनता की ओर से चुने गए विधायकों को दबाने का प्रयास कर रहे हैं। जिन लोगों ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों के खिलाफ काम किया, उन्हें सरकार में पद दिए जा रहे हैं।
खुफिया तंत्र फेल, हरियाणा पुलिस के पहुंचने की खबर तक नहीं
राज्यसभा सीट के लिए होने वाली वोटिंग में कांग्रेस विधायकों के क्रॉस वोटिंग की स्क्रिप्ट दिल्ली में कई दिन पहले लिखी जा चुकी थी। इसके बाद ही भाजपा ने कांग्रेस छोड़कर आए हर्ष महाजन को कैंडिडेट अनाउंस किया। हर्ष महाजन 6 बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रह चुके स्व. वीरभद्र सिंह के करीबी थे और कांग्रेस के ज्यादातर विधायकों से उनके अच्छे संबंध हैं।
हर्ष महाजन के नॉमिनेशन फाइल करने के बाद भी मुख्यमंत्री या सरकार के लेवल पर कोई हलचल नहीं दिखी। उधर हर्ष महाजन कांग्रेसी और निर्दलीय विधायकों से वन-टु-वन मीटिंग करते रहे।
अंदरखाने सब कुछ तय हो जाने के बाद कांग्रेस के 6 बागी और तीनों निर्दलीय MLA चुपचाप मुख्यमंत्री के साथ डिनर और ब्रेकफास्ट करते रहे। CM या प्रदेश के खुफिया तंत्र को उनके इरादों की भनक तक नहीं लगी।
CRPF और हरियाणा पुलिस की गाड़ियों के हिमाचल प्रदेश पहुंचने की खबर भी राज्य पुलिस को नहीं लगी। नतीजा- मंगलवार को राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करके विधानसभा से निकलते ही बागी विधायकों को CRPF और हरियाणा पुलिस ने अपने सुरक्षा घेरे में लिया और वे प्रदेश से निकल गए।
अब CM और कांग्रेस के सामने चुनौती
पूर्ण बहुमत के बावजूद राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस कैंडिडेट की हार और बुधवार को विधानसभा में हुए हंगामे के बाद सबसे बड़ा खतरा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कुर्सी पर माना जा रहा है।
क्रॉस वोटिंग करने वाले कांग्रेसी विधायक कह चुके हैं कि नेतृत्व नहीं बदला तो वह त्यागपत्र भी दे सकते हैं। दूसरी ओर भाजपा इस कोशिश में लगी है कि सदन के अंदर सरकार को विश्वासमत लाने के लिए मजबूर किया जाए। इसके लिए उसके नेताओं ने बुधवार को दो बार शिमला में राज्यपाल से मुलाकात भी की।
कुल मिलाकर कांग्रेस हाईकमान के पास भी ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं। विधानसभा में बजट पास करवाकर शर्मिंदगी से बचने के बाद पार्टी अब किसी भी तरह हिमाचल में अपनी सरकार को बरकरार रखना चाहेगी, फिर चाहे इसके लिए मुख्यमंत्री बदलना ही क्यों न पड़ जाए।
हालांकि उससे पहले बागी विधायकों की सदस्यता खत्म करने के विकल्प पर भी मंथन चल रहा है ताकि पार्टी के घुटने टेक देने का मैसेज जनता के बीच जाने से रोका जा सके।







