राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल के दौरान ‘कुंआ ठाकुर का’ पढ़ने पर आरजेडी सांसद मनोज झा विवादों में घिर गए हैं. आरजेडी के भीतर ही मनोज झा का विरोध शुरू हो गया है. आरजेडी विधायक चेतन आनंद के पिता आनंद मोहन ने मनोझ झा की जिह्वा खींच लेने की बात कही है.
शिवहर से आरजेडी विधायक चेतन आनंद ने भी मनोझ झा पर निशाना साधा है. आनंद ने कहा कि समाजवाद के नाम पर किसी एक जाति को लक्ष्य करना गलत है. ठाकुर समाज सभी को साथ लेकर चलता है. हम सदन में होते तो मनोज झा को ऐसा बोलने नहीं देते.
आनंद ने झा को भी अपने नाम से टाइटल हटाने की चुनौती दी है. आरजेडी के साथ ही बीजेपी भी मनोझ झा पर हमलावर हो गई है. बीजेपी के विधायक नीरज बबलू ने कहा कि सदन में अगर मेरे सामने राजपूत समाज का कोई अपमान करता, तो मैं उसका मुंह तोड़ देता.
बबलू ने आरजेडी के ए टू जेड पॉलिटिक्स पर भी सवाल उठाया है. 5 दिनों तक जारी इस सियासी घमासान के आखिर में लालू यादव भी कूदे. लालू ने मनोज झा का समर्थन करते हुए कहा कि उनके बयान से किसी समाज का अपमान नहीं हुआ है. आरजेडी सुप्रीमो ने मनोज झा को विद्धान आदमी बताया.
लालू ने मनोज झा का समर्थन तो किया, लेकिन खुलकर आनंद मोहन के विरोध पर कुछ नहीं बोले.
मनोज झा ने संसद में क्या कहा?
विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल पर राज्यसभा में बोलने के लिए लालू यादव की पार्टी आरजेडी ने मनोज झा को अधिकृत किया था. मनोज झा ने महिला आरक्षण में ओबीसी और मुस्लिम समुदाय के महिलाओं को कोटा नहीं देने पर सवाल उठाया. झा ने कहा कि इस तरह के आरक्षण से सिर्फ सवर्ण महिलाओं को फायदा मिलेगा.
झा ने लालू यादव के बातों को भी इस दौरान दोहराया और कहा कि संसद ऐतिहासिक निर्णय लेने में गलती न करे. झा ने सरकार के बिल पर तंज कसते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि की एक कविता ‘ठाकुर का कुआं’ पढ़ी थी.
मनोज झा ने संसद में कविता पढ़ते हुए कहा- इसे सिर्फ मैंने प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है. उन्होंने कहा कि ये ठाकुर संसद, न्यायलय और विश्वविद्यालय में बैठा हुआ है, जिसे खत्म करने की जरूरत है. झा ने इस दौरान खुद के भीतर भी एक ठाकुर होने की बात कही थी.
ओम प्रकाश वाल्मीकि कौन थे?
साहित्य जगत में ओमप्रकाश वाल्मीकि की गिनती महान दलित साहित्यकारों में होती है. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बरला गांव में हुआ था. उनका शुरुआती जीवन काफी कठिनाईयों में बीता. पढ़ाई के दौरान उन्हें अनेक आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़े.
उनकी कहानी जूठन हिंदी जगत में काफी मश्हूर है. राजभाषा विभाग ने ‘ठाकुर का कुआं’ के रचियता ओम प्रकाश वाल्मीकि के बारे में विस्तार से लिखा है. इसके मुताबिक ओमप्रकाश वाल्मीकि पर प्रेमचंद्र के दलित लेखन का गहरा प्रभाव था. उन्होंने अपने लेखन में जातीय अपमान और उत्पीड़न का जीवंत वर्णन किया है.
ग्लोबल विक्टोरिया के साउथ, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के मैनेजर जेम्स एडवर्ड्स लिखते हैं- ठाकुर का कुआं कविता में ओमप्रकाश वाल्मीकि ने क्रिया का इस्तेमाल नहीं किया है, लेकिन फिर उन्होंने ग्रामीण भारत में दलित और सवर्ण जातीयों के बीच के रिश्ते को बता दिया है.
एडवर्ड्स आगे लिखते हैं- उपवादों का प्रयोग कर जिस तरह से वाल्मीकि ने ठाकुर का कुआं लिखा है, वह अनोखा है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी प्रेस के मुताबिक वाल्मिकी ने दलित साहित्य के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
बड़े नेता समर्थन मनोज झा के समर्थन में आए
ठाकुर का कुआं पर आरजेडी में बवाल के बाद कई बड़े नेता मनोज झा के समर्थन में आ गए हैं. इनमें जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह, आप सांसद मनोज झा और जाप प्रमुख पप्पू यादव शामिल हैं. पार्टी के भीतर भी कई नेताओं ने मनोज झा का समर्थन किया है. आइए जानते हैं, किसने क्या कहा है?
1. ललन सिंह, जेडीयू अध्यक्ष- भाजपा का काम समाज में तनाव पैदा करना और भावनाएं भड़काकर वोट लेना है. भारतीय जनता पार्टी, कनफुसका पार्टी है, उसका काम ही है भ्रम फैलाना और कनफुसकी करना. मनोज झा ने राज्यसभा में जो कहा, वो किसी जाति विशेष को लक्ष्य करके नहीं कहा. इसका प्रमाण राज्यसभा की कार्यवाही है.
2. संजय सिंह, आप सांसद- राज्यसभा में मेरे साथी संसद में मेरे साथी मनोज झा की कविता को लेकर कोई विवाद न किया जाए. कविता में ठाकुर उन्होंने खुद को भी बोला है. मनोज झा एक नेक इंसान और कभी किसी समाज के खिलाफ दुर्भावना से नहीं बोल सकते. उनकी द्वारा पढ़ी गई कविता पर अनावश्यक विवाद करना ठीक नहीं.
3. पप्पू यादव, जाप प्रमुख- राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कुछ भी गलत नहीं कहा है. कविता में ठाकुर के लिए गाली कहां है? झा ने ओमप्रकाश वाल्मीकि की जिस कविता ठाकुर का कुंआ को अपने भाषण में उद्धृत किया. यह संसाधनों पर एकाधिकार की सामंती व्यवस्था के खिलाफ लिखी रचना है. इसमें किसी जाति पर आक्षेप नहीं है.
4. जीतन राम मांझी, पूर्व सीएम- मनोज झा ने संसद में कुछ भी गलत नहीं कहा है. जो लोग इसे तुल देने में जुटे हैं, वो जातीय ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं. मनोज झा ने मन के ठाकुर को लेकर कहा है. यह एक मानसिकता है, जिसके खिलाफ हम खड़े हैं.
विवाद को ज्यादा तूल नहीं देना चाहता है लालू परिवार
लालू परिवार इस विवाद को ज्यादा तुल नहीं देना चाहता है. पार्टी में नीतिगत मामलों पर बोलने के लिए लालू और तेजस्वी अधिकृत हैं, लेकिन 5 दिन बाद लालू ने इस पर बयान दिया. वो भी सिर्फ एक लाइन का. ए टू जेड की बात करने वाले तेजस्वी अब तक इस पर चुप हैं.
हालांकि, पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने भी मनोज झा का समर्थन किया है. तिवारी ने चेतन आनंद को बच्चा बताते हुए कहा- उसे कविता के भाव समझ में नहीं आए होंगे. तिवारी ने कहा कि यह कविता सामंत के खिलाफ लिखी गई है. हमने इसे सुना है और वो गलत नहीं है.
लालू यादव के बड़े बेटे और सरकार में मंत्री तेजप्रताप ने भी ठाकुर के सवाल पर पल्ला झाड़ लिया है. तेजप्रताप ने कहा है कि मेरे एक ही ठाकुर हैं, जो वृंदावन में हैं. ठाकुर विवाद पर लालू परिवार की चुप्पी से सियासी गलियारों में 2 सवाल उठ रहे हैं.
1. कहीं ए टू जेड पॉलिटिक्स खत्म होने का डर तो नहीं- तेजस्वी यादव ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ए टू जेड का फॉर्मूला दिया. तेजस्वी ने कहा कि आरजेडी सभी जातियों को साथ में लेकर चलने वाली पार्टी है. इसी समीकरण को मजबूत करने के लिए आरजेडी ने आनंद मोहन के परिवार को पार्टी में शामिल कराया.
जगदानंद सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. रघुंवश सिंह के निधन के बाद आरजेडी की खूब आलोचना हुई थी. दरअसल, रघुवंश सिंह के बेटे ने आरोप लगाया था कि अंतिम समय में आरजेडी ने पिता की अनदेखी की.
बिहार चुनाव के टिकट वितरण में भी आरजेडी ने सवर्णों को खूब तरजीह दी. पार्टी के कई नेता जीतकर सदन भी पहुंचे. बिहार में विधानसभा में सभी पार्टियों से 28 राजपूत विधायक हैं, जो यादव (52) के बाद सबसे ज्यादा है.
विधानसभा में बीजेपी के 15, आरजेडी के 8, जेडीयू के 2, वीआईपी के 2 और कांग्रेस के 1 राजपूत विधायक हैं. वहीं लोकसभा में राजपूत बिरादरी के सात सांसद हैं. इनमें 3 बीजेपी, 2 लोजपा और 2 जेडीयू से हैं.
बिहार में राजपूत करीब 5 वोटरों की आबादी करीब 5 प्रतिशत है, जो सवर्ण में भूमिहार के बाद सबसे ज्यादा है. बिहार में सवर्ण मतदाताओं की आबादी करीब 18 फीसदी है. इनमें भूमिहार 6, राजपूत और ब्राह्मण 5-5 फीसदी शामिल हैं.
राजपूत शुरू से ही आरजेडी के कोर वोटर्स से शामिल रहे हैं. 2009 में लालू यादव की पार्टी से 4 सांसद बने थे, जिसमें 3 रघुवंश सिंह, जगदानंद सिंह और उमाशंकर सिंह राजपूत समुदाय से थे.
बिहार के औरंगाबाद, आरा, सीवान, बेतिया, शिवहर, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मोतिहारी और सारण जिले में राजपूत वोटरों का दबदबा है. कहा जा रहा है कि आरजेडी हाईकमान इस मामले में जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहती है, जिससे कोई सियासी नुकसान हो जाए.
2. विरोध सीधे आनंद मोहन ने किया है- लालू परिवार की चुप्पी एक बड़ी वजह आनंद मोहन का विरोध करना है. हाल ही में आईएएस जी कृष्णैया हत्याकांड में सजा काट रहे आनंद मोहन को महागठबंधन सरकार ने नियम बदलकर रिहा किया था. लालू और नीतीश की इसको लेकर खूब किरकिरी भी हुई थी.
आनंद मोहन के रिहाई का मसला अभी सुप्रीम कोर्ट में है. आनंद मोहन बिहार के पूर्व सांसद रहे हैं और 90 के दशक में सवर्ण वोटरों के बीच उनकी तूती बोलती थी. आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद भी सांसद रही हैं. उनका बेटा चेतन आनंद अभी विधानसभा के सदस्य हैं.
आनंद मोहन परिवार का लोकसभा के 4 सीटों पर सीधा दखल है. इनमें शिवहर, वैशाली, खगड़िया और मुजफ्फरपुर सीट शामिल हैं. चारों सीट पर बीजेपी और लोजपा का अभी कब्जा है. आनंद मोहन की रिहाई को भी जानकारों ने इसी 4 सीटों के समीकरण से जोड़ा था.
शिवहर से बीजेपी के टिकट 2009, 2014 और 2019 के चुनाव में लगातार तीन बार रमा देवी चुनाव जीत चुकी हैं. वैशाली में भी 2014 और 2019 में बीजेपी के समर्थन से लोजपा को जीत मिली थी.
जातिगत समीकरण के हिसाब से देखें तो शिवहर में 25 फीसदी वैश्य, 20 फीसदी दलित, 18 फीसदी मुसलमान और 17 फीसदी सवर्ण वोटर्स और 20 फीसदी गैर-वैश्य पिछड़ा वोटर्स हैं.
रघुवंश सिंह के निधन के बाद उत्तर बिहार में आरजेडी के पास कोई भी बड़ा राजपूत चेहरा नहीं है. ऐसे में माना जा रहा है कि सीधे तौर पर शायद ही लालू परिवार आनंद मोहन का खुलकर विरोध करे. यही वजह है कि लालू और तेजस्वी ने इस मामले में चुप्पी साध ली है.







