देश की महिलाओं का 75 साल से जारी इंतजार खत्म हो चुका है। संसद में महिला आरक्षण बिल को मंजूरी मिल चुकी है। लोकसभा के बाद कल देर रात राज्यसभा ने भी इस बिल पर अपनी मुहर लगा दी। अब इस पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि मोदी सरकार ध्यान भटकाने का काम कर रही है। सरकार को महिला आरक्षण को आज ही लागू करना चाहिए।
उन्होंने कहा, अगर सरकार को विधेयक को लागू करना है तो अभी करे, इसके लिए परिसीमन क्यों? महिला आरक्षण बिल आज से ही लागू किया जा सकता है। इस दौरान राहुल ने कहा कि बिल में दो कमियां हैं। 10 साल बाद बिल पास हुआ है।
‘महिला आरक्षण का बिल फाड़ने वालों को समर्थन करना पड़ा’
वहीं, आपको बता दें कि आज बीजेपी मुख्यालय में पीएम मोदी का अभिनंदन हुआ है। इस मौके पर उन्होंने बीजेपी महिला कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। पीएम मोदी ने कहा कि हमने अपना कमिटमेंट पूरा किया। देश की महिलाओं का दशकों पुराना सपना पूरा किया है। संसद में नारी शक्ति का अहसास हुआ है। उन्होंने कहा कि कभी बिल फाड़ने वाले दलों ने इस बिल का समर्थन किया है।
जातिगत जनगणना के लिए उठती रहीं आवाजें…
- 80 के दशक में जातियों पर आधारित कई क्षेत्रीय पार्टियों का उभार हुआ। इन पार्टियों ने सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण दिए जाने को लेकर अभियान चलाया।
- इसी दौरान जातियों की संख्या के आधार पर आरक्षण की मांग सबसे पहले UP में बसपा नेता कांशीराम ने की।
- भारत सरकार ने साल 1979 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के मसले पर मंडल कमीशन का गठन किया। मंडल कमीशन ने OBC के लोगों को आरक्षण देने की सिफारिश की।
- इस सिफारिश को 1990 में उस वक्त के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लागू किया। इसके बाद देशभर में सामान्य श्रेणी के छात्रों ने उग्र विरोध प्रदर्शन किए।
- साल 2010 में लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे OBC नेताओं ने मनमोहन सरकार पर जातिगत जनगणना कराने का दबाव बनाया। इसके साथ ही पिछड़ी जाति के कांग्रेस नेता भी ऐसा चाहते थे।
- मनमोहन सरकार ने 2011 में सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना यानी SECC कराने का फैसला किया।
- इसके लिए 4 हजार 389 करोड़ रुपए का बजट पास हुआ। 2013 में ये जनगणना पूरी हुई, लेकिन इसमें जातियों का डेटा आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
कांग्रेस ने जातिगत जनगणना करवाई थी, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
SECC का डेटा 2013 तक जुटाया गया। इसे प्रॉसेस करके फाइनल रिपोर्ट तैयार होती, तब तक सत्ता बदल गई और 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आ गई। जुलाई 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले उस वक्त के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने का वादा किया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि डेटा में 46 लाख कास्ट, सब कास्ट हैं। इसे राज्य सरकारों को भेजकर क्लब करने को कहा गया है। इसके अलावा नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में कमेटी बनाई जाएगी, जो इस कास्ट डेटा को क्लासिफाई करेगी। जब यह कार्रवाई पूरी हो जाएगी तो इस डेटा को सार्वजनिक किया जाएगा।
2016 में जातियों को छोड़कर SECC का बाकी डेटा मोदी सरकार ने जारी कर दिया। चूंकि कमेटी के अन्य सदस्यों का नाम तय नहीं हुआ और इस वजह से कभी मीटिंग ही नहीं हुई। इसलिए जनगणना में जुटाए जातियों के आंकड़े जस के तस पड़े हैं यानी जारी ही नहीं हुए।
राष्ट्रीय स्तर पर 1931 की अंतिम जातिगत जनगणना में जातियों की कुल संख्या 4,147 थी, SECC-2011 में 46 लाख विभिन्न जातियां दर्ज हुई हैं। जबकि, देश में इतनी जातियां होना नामुमकिन है।
सरकार ने कहा है कि संपूर्ण डेटा सेट खामियों से भरा हुआ है। इस वजह से रिजर्वेशन और पॉलिसी डिसीजन में इस डेटा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जातिगत जनगणना के सामने मोदी सरकार के 3 तर्क
महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन लगाई थी। इसमें केंद्र सरकार को बैकवर्ड क्लास ऑफ सिटीजंस यानी BCC यानी पिछड़े वर्गों का डेटा कलेक्ट करने के निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि 2021 की जनगणना में ही ग्रामीण भारत में पिछड़े वर्ग के नागरिकों की सही-सही स्थिति सामने आ सके।
इस याचिका में केंद्र सरकार से अदर बैकवर्ड क्लासेस यानी OBCs पर SECC-2011 के दौरान जुटाए गए डेटा को सार्वजनिक करने की मांग भी की गई है। केंद्र सरकार ने 23 सितंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह अब सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना नहीं कराएगी। उद्धव सरकार की पिटीशन पर केंद्र सरकार ने अपने एफिडेविट में 3 प्रमुख बातें कही थीं…
1. यह एक पॉलिसी डिसीजन है, इसलिए अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए।
2. जाति आधारित जनगणना कराना व्यावहारिक नहीं है।
3. प्रशासनिक नजरिए से भी ऐसा करना बेहद मुश्किल है।
जातिगत जनगणना से मोदी सरकार बचती क्यों दिख रही है?
मंडल कमीशन के बाद की राजनीति में बड़ी संख्या में बहुत ही मजबूत क्षेत्रीय दलों का उभार हुआ। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में। RJD व JDU ने बिहार में और सपा ने उत्तर प्रदेश में OBC के मसले को उठाया और OBC वोटरों का जबर्दस्त समर्थन पाने में सफल रहे। हकीकत में OBC वोटर ही बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों के प्रमुख समर्थक बन गए।
पिछले कुछ चुनावों से OBC वोटरों में BJP की लोकप्रियता बढ़ी है। BJP उत्तर भारत के अनेक राज्यों में प्रभावी OBC की तुलना में निचले OBC को लुभाने में अधिक सफल रही। इसलिए BJP ने भले ही OBC पर अपनी पहुंच बनाकर चुनावी लाभ ले लिया हो, लेकिन इनके बीच उसका समर्थन उतना मजबूत नहीं है, जितना कि उच्च वर्ग और उच्च जातियों के बीच है।
CSDS के संजय कुमार के मुताबिक BJP का जातिगत गणना से कतराने का मुख्य कारण यह डर है कि अगर जातिगत गणना हो जाती है, तो क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को केंद्र सरकार की नौकरियां और शिक्षण संस्थाओं में OBC कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिल जाएगा। बहुत हद तक संभव है कि OBC की संख्या उन्हें केंद्र की नौकरियों में मिल रहे मौजूदा आरक्षण से कहीं अधिक हो सकती है।
यह मंडल-2 जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकती है और BJP को चुनौती देने का एजेंडा तलाश रहीं क्षेत्रीय पार्टियों को नया जीवन भी। यह डर भी है कि OBC की संख्या भानुमती का पिटारा खोल सकती है, जिसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।
माना जाता है कि BJP को इस तरह की जनगणना से डर यह है कि इससे अगड़ी जातियों के उसके वोटर नाराज हो सकते हैं, इसके अलावा BJP का परंपरागत हिन्दू वोट बैंक इससे बिखर सकता है।
संजय कुमार कहते हैं कि मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए OBC वोट को नाराज होने से बचाना बड़ी चुनौती है। कई सर्वे इशारा करते हैं कि BJP ने OBC जातियों में तेजी से पैठ बढ़ाई है।
2009 के आम चुनाव में BJP को 22% OBC वोट मिले थे, जो 10 साल में दोगुने हो गए। पिछले लोकसभा चुनाव में BJP को 44% वोट मिले। वहीं क्षेत्रीय पार्टियों का हिस्सा 2009 के 42% वोटों से घटकर 27% रह गया।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं कि जाति के अधार पर जनगणना की बात संवेदनशील मामला है। हमारे देश में अभी तक का इतिहास रहा है कि अगर इस तरह की जनगणना होती है तो उसी आधार पर आरक्षण की और दूसरी चीजों की मांग होने लगेगी। ये संख्या के आधार पर होगा तो प्रेशर पॉलिटिक्स काम करने लगेगी।
कांग्रेस और BJP जैसे मुख्य राजनीति दलों की एक दुविधा है। वो पिछड़े के, अल्पसंख्यकों के और वंचित समाज के वोट तो चाहते हैं, लेकिन उसके साथ साथ वो फॉरवर्ड क्लास का समर्थन भी नहीं खोना चाहते हैं। इसी वजह से BJP भी इससे बचना चाहती है।







