एसिड़ हमले के मामले में लंबे अरसे तक जेल में रहने वाले आरोपी को दिल्ली उच्च न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा वह पीडि़ता के अनदेखे मनोवैज्ञानिक दर्द के प्रति आंखे नहीं मूंद सकता। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि समकालीन समाज में तेजाब हमला सबसे गंभीर अपराधों में से है। आरोपी की लंबे समय तक कारावास की पीड़़ा को पीडि़़त की न्याय की प्रतिक्षा के रूप में सराहना की जानी चाहिए। आरोपी नौ वर्षों से जेल में है‚ इस अपराध में न्यूनतम सजा दस वर्ष है। अदालत ने कहा ऐसी घटनाएं जीवन बदल देती हैं। एसिड़ हमला बहुत गंभीर अपराध है‚ जिससे न केवल शारीरिक दर्द होता है बल्कि भावनात्मक घाव भी लगते हैं‚ जो कभी ठीक नहीं होते। ऐसे में अदालत की भूमिका संरक्षक की होती है‚ न्याय को सामने आने की जरूरत है। नेशनल क्राइम रिकार्ड़ ब्यूरो के अनुसार देश में २०१७ सा २०२१ के दरम्यान एक हजार से ज्यादा एसिड़ अटैक दर्ज किए गए। आमतौर पर ग्रामीण व पिछड़े़ इलाकों में कानूनी जानकारियों की कमी के चलते इन घटनाओं की शिकायतें भी नहीं दर्ज की जातीं। तमाम पाबंदियों के बावजूद आज भी एसिड़ खुदरा दुकानों में आसानी से उपलब्ध है। इस खतरनाक एसिड़ का उपयोग हथियारों की तरह की किया जाता है। पीडि़तों को सरकारी मदद मिलना न तो आसान है‚ न ही समुचित। इलाज में भारी धन राशि की आवश्यकता तो होती ही है। पीडि़तों का चेहरा/रूप–रंग भी बुरी तरह विकृत हो जाता है। कइयों की आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली जाती है। उन्हें ताउम्र आश्रितों सा जीवन व्यतीत करने को मजबूर कर दिया जाता है। अमूमन यह अपराध सोची–समझी साजिश का नतीजा होता है। जैसा कि अदालत ने भी कहा‚ उन्हें शारीरिक दर्द के साथ मानसिक आघात भी लगता है। जिसकी पूर्ति किसी सजा से नहीं हो सकती। उनके सपने‚ बेहतर भविष्य की योजनाएं सब चौपट हो जाती हैं। एसिड़ पीडि़़तों का पूरा परिवार इस दर्द/त्रास का भागी होता है। यह सच है कि समाज को अपराधमुक्त करना लगभग असंभव है। मगर कड़़ी सजाओं तथा अपराधियों के प्रति सख्त रवैये से उन लोगों के भीतर भय पैदा किया जा सकता है‚ जो कानून के साथ सार्वजनिक तौर पर किसी भी तरह का खिलवाड़़ करते हैं।
गुजरात एटीएस ने जैश के लिए काम करने वाले 8 आरोपियों को किया गिरफ्तार …………….
पाकिस्तान अभी भी भारत के खिलाफ आतंकी साजिश को अंजाम देने की फिराक में रहता है. उसका आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद...






