दिल्ली में जी–२० के शिखर सम्मेलन के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लंबे इंटरव्यू का एक खास मकसद है। हालांकि इनमें बहुत सारी बातें पुरानी हैं। एकाध बातों को छोड़़कर। पर वर्तमान में इसका प्रयोजन भारत की अंगड़़ाई लेतीं वैश्विक महत्वाकांक्षाओं से देश–दुनिया को साक्षात्कार कराना है। इसके जरिए मोदी ‘तैयार हैं हम’ का भरोसा भिन्न व्यवस्थाओं से संचालित होने वाले भूगोल और उनमें रहने वाली पूरी मानवजाति को देना चाहते हैं। यह भरोसा भारत की ठोस आर्थिकी‚भौतिक–भौगोलिक‚ वैज्ञानिक एवं जनसांख्यिकीय विलक्षणता का है‚ जो परम्परागत दूरदर्शिता‚ गुणवत्ता एवं युवा आबादी की क्षमता–कौशल से भरपूर है। प्राय हर क्षेत्र में इसकी उपलब्धि के निशान हैं। भारत ने वैश्विक संकट–आतंकवाद‚ कोरोना जैसी महामारी में नुकसान सह कर भी सहायता देने की मानवीय प्रतिबद्धता दिखाई है। जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या पर उसकीसक्रियता ने रास्ता दिखाया है। इसके बावजूद‚ दक्षिण एशिया और अफ्रीकी महादेश तक विकसित होने के लिए संघर्षरत हैं। यह केवल एकांगी और विखंड़नवादी यूरोपीय दर्शन से दुनिया को हांकने का नतीजा है। उन्हें बराबरी तक लाने के लिए विकास का जीड़ीपीए आधारित दृष्टि नहीं बल्कि भारत के अविभेदकारी मूल दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी संसार एक परिवार है‚ के तहत मानवीय दर्शन को अपनाना होगा। इसमें सभी विचारों–दर्शनों के फलने–फूलने की एक सामूहिक विविधता है। संयुक्त राष्ट्र के सम्यक विस्तार की यही उचित दृष्टि होनी चाहिए। भारत इसी बुनियाद पर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य का दावा करता रहा है। मोदी कहना चाहते हैं कि भारत का रवैया वैश्विक नेतृत्व के मानकों के एकदम अनुरूप है। दुनिया को इस भारत का इस्तकबाल करना चाहिए। जी–२० की वार्षिक अध्यक्षता एवं उसकी मेजबानी एक सुबूत है। खर्चीला होने के बावजूद भारत में इसका आयोजन उसके कद को और >ंचा करने के लिए जरूरी है। इंदिरा गांधी के समय हुए गुटनिरपेक्ष सम्मेलन या एशियाड के जरिए यह स्थापित करना था कि भारत संपेरों या भूखे–नंगों का देश नहीं है। लेकिन मोदी अब ‘जीरो से इसरो तक’ में तथ्यों के साथ भारत के नायकत्व की ठोस दावेदारी कर रहे हैं। वे कश्मीर एवं अरुûणाचल में चीन की आपत्तियों को साहस से खारिज कर रहे हैं। वहीं‚ देश को संदेश दे रहे हैं कि यह सब स्थिर सरकार (उनकी) के रहते ही संभव हुआ है। वे युवा आबादी पर दांव लगा कर अगले चुनाव में बाजी पलटने की तैयारी में भी हैं।
अदालतों के सामने क्यों खड़ा हुआ बड़ा संवैधानिक सवाल?
भारत में डिजिटल कम्युनिकेशन तेजी से सार्वजनिक बातचीत और चर्चाओं को आकार दे रहा है। हाल के वर्षों में, प्राइवेट...







