जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म करने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को 13वें दिन की सुनवाई हो रही है। केंद्र सरकार की ओर SG तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- हम केंद्र शासित प्रदेश में कभी भी चुनाव करवाने के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले पंचायत चुनाव कराए जाएंगे।
29 अगस्त को हुई 12वें दिन की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि जम्मू-कश्मीर को कितने समय में दोबारा राज्य का दर्जा मिल पाएगा। इसे लेकर आज केंद्र की तरफ से ये जवाब दिया गया। केंद्र सरकार के SG ने कहा कि चुनाव आयोग इस पर जल्द फैसला लेगा।
पिछली सुनवाई में केंद्र की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वे गुरुवार को इस बारे में पॉजिटिव स्टेटमेंट देंगे। इस दौरान उन्होंने कोर्ट को बताया था कि जम्मू-कश्मीर को अस्थायी तौर पर दो यूनियन टेरिटरी (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में बांटा गया है। लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश ही रहेगा, लेकिन जम्मू-कश्मीर को जल्द फिर से राज्य बना दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह राष्ट्रीय हित में जम्मू-कश्मीर को दो अलग यूनियन टेरिटरी में बांटने के केंद्र के फैसले को स्वीकृति देने की इच्छुक है। कोर्ट ने केंद्र से सवाल किया कि जम्मू-कश्मीर को यूनियन टेरिटरी बनाने का कदम कितना अस्थायी है और उसे वापस राज्य का दर्जा देने के लिए क्या समय सीमा सोच रखी है, इसकी जानकारी दें। यह भी बताएं कि वहां चुनाव कब कराएंगे।
28 अगस्त की सुनवाई में कोर्ट ने आर्टिकल 35A को नागरिकों के अधिकारों का हनन करने वाला आर्टिकल बताया था। CJI ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 35A के तहत जम्मू-कश्मीर के लोगों को विशेषाधिकार मिले थे, लेकिन इसी आर्टिकल के कारण देश के लोगों के तीन बुनियादी अधिकार छीन लिए गए। इस आर्टिकल की वजह से अन्य राज्यों के लोगों के कश्मीर में नौकरी करने, जमीन खरीदने और बसने के अधिकारों का हनन हुआ।
10वें दिन की सुनवाई हो रही है। इसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर इकलौती रियासत थी, जिसका संविधान था और वो भी गलत था। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के 4 प्रतिनिधि थे, जिनमें लेफ्टिनेंट शेख अब्दुल्ला भी थे। कई रियासतों ने भारत के संविधान को स्वीकार करने में रजामंदी दिखाई, जबकि जम्मू-कश्मीर ने कहा कि हम संविधान बनाने में भागीदारी करेंगे। संविधान बनाते समय ‘एकसमान स्थिति’ का लक्ष्य था। संघ के एक हिस्से को बाकी सदस्यों को मिले अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।







