चिकित्सक जेनेरिक दवाएं ही लिखें। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने पंजीकृत चिकित्सकों के लिए पेशेवर आचार संबंधी नियमन जारी किए हैं। चूंकि जेनेरिक दवाएं ब्रांडे़ड़ दवाओं के मुकाबले 30 से 80 फीसदी तक सस्ती हैं इसलिए इससे सेहत पर होने वाले खर्च में कमी आयेगी और स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। आयोग के अनुसार ऐसा ना करने वालों को दंड़ात्मक कार्रवाई के तहत तय समय तक लाइसेंस भी निलंबित किया जा सकता है। चिकित्सक को नियमन के प्रति सतर्क रहने की चेतावनी दी जा सकती है। नैतिक‚ निजी व सामाजिक संबंध या पेशेवर प्रशिक्षण को लेकर कार्यशाला व शैक्षणिक कार्यक्रम में शामिल होने के निर्देश भी दिए जा सकते हैं। लंबे समय से ब्रांडे़ड़ दवाओं के मुकाबले जेनेरिक दवाओं से उपचार करने की बात हो ती रही है‚ मगर चिकित्सकों द्वारा इसकी अवहेलना होती रही है। घरेलू बाजार में भारत का दवा उद्योग १.८ लाख करोड़़ रुपये का २०२२ में था जो तेजी से बढ रहा है। गैर–कानूनी होने व इंडि़यन मेडि़कल काउंसिल द्वारा प्रतिबंधित होने के बावजूद चिकित्सक किसी ना किसी रूप में दवा कंपनियों के मुनाफे में हिस्सेदारी लेतेे हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी पूर्व में अपने भाषणों में चिकित्सकों को घूस देने के लिए दवा कंपनियों को चेतावनी दे चुके हैं। आम नागरिकों में सेहत के प्रति बढती सतर्कता के चलते चिकित्सा जगत व दवा उद्योग तेजी से पनप रहा है। मगर सरकारी चिकित्सकों की कमी व दवाओं की आसमान छूती कीमतें इलाज में अड़़चन बन जाती हैं। प्राइवेट ड़ॉक्टरों से परामर्श लेने या निजी अस्पतालों में भर्ती होने पर मरीज/तीमारदारों को मोटी रकम चुकानी पड़़ती है। ऐसे में दवाओं की कीमतों पर लगी लगाम उनके लिए बड़़ा आर्थिक सुकून साबित हो सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत उच्च गुणवत्ता वाली कम लागत की दवाएं लोगों में तेजी से प्रचलित होती जा रही हैं। जो दवाएं कम कीमत में उपलब्ध हो सकतीं हैं‚ उनके लिए अपनी गाढी कमाई से कीमतें चुकाने वाले लोगों को इससे ना सिर्फ राहत मिल सकेगी‚ बल्कि वे समुचित इलाज कराने के प्रति गंभीर भी रह सकेंगे। मुनाफा कमाने को गलत कतई नहीं कहा जा सकता मगर जीवन बचाने वाली किसी भी चीज की कीमतें आमजन की पहंच में होनी ही चाहिए।
अदालतों के सामने क्यों खड़ा हुआ बड़ा संवैधानिक सवाल?
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