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बुजुर्ग और टूटते संयुक्त परिवार

UB India News by UB India News
August 12, 2023
in Lokshbha2024, समाज
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बुजुर्ग और टूटते संयुक्त परिवार
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एक समय था जब भारत में संयुक्त परिवार होना एक परंपरा थी‚ जिसको खूब निभाया जाता था। दादा–दादी‚ माता–पिता‚ बेटे–बहू‚ पोते–पोतियां सभी अपनी–अपनी जिम्मेदारी निभाते‚ खुश और स्वस्थ रहते थे। छोटी–मोटी शिकायतें अवश्य होतीं पर वे सुलझा लीं जाती थीं आराम से। इसे खींचा नहीं जाता‚ अंतिम तक बदला लेने की प्रवृत्ति नहीं थी। पर आज माहौल अलग है। पति–पत्नी तक की आपस में नहीं बनती‚ बच्चों पर किसी का अनुशासन नहीं चलता। एकल परिवार हैं‚ उसमें भी मेल नहीं है। आए दिन पति–पत्नी अदालत का रुख करते हैं।

बच्चे कहां जाएं‚ वे कैसे बड़े़ हो‚ शिक्षित हों‚ माता के पास रहे या पिता के पास समझ नहीं आता। ऐसे प्रश्न पीछा नहीं छोड़़ते। बच्चों से भी बुरी दशा तो उनके दादा–दादी की है। उन्हें हजार तिकड़़मों से‚ उनके ही घर में खाना नहीं मिलता‚ दवा नहीं मिलती‚ उनके ही घर से उन्हें कभी भी निकाल दिया जाता है। वे सड़़कों पर‚ किसी के घर में नौकर–चाकर सा जीवन बिताते हैं‚ दुखों से जल्दी मर जाते हैं। इसी कारण भारत सरकार ने सन् २००७ में भरण–पोषण तथा कल्याणकारी कानून‚ माता–पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाया‚ जिससे कि वृद्ध माता–पिता या वरिष्ठ नागरिक जिन्हें जिंदगी की शाम में‚ खासकर विधवा ्त्रिरयों को अपना जीवन अकेला‚ बेसहारा न गुजारना पड़े़। उनकी शारीरिक और आर्थिक हालत अब ऐसी नहीं रहती कि वे अकेले बिना मदद के जीवनयापन कर सकें।

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यह समस्या धीरे–धीरे एक सामाजिक चुनौती बन चुकी है‚ जिसका हल निकालना आवश्यक है। इसके लिए पहले ‘कोड़ ऑफ क्रिमिनिल प्रोसिजर’ में १९७३ से धारा १२५ लाई गई। पर इससे काम नहीं चला तो इस एक्ट को लाना पड़़ा। इसके अनुसार ‘बच्चों’ का अर्थ है–बालिग बेटा‚ बेटी‚ पोता तथा पोती। भरण पोषण का अर्थ है– खाना‚ कपड़े़‚ मकान‚ दवाएं तथा इलाज। माता–पिता का अर्थ है–जन्मदाता (माता–पिता)‚ गोद लेने वाले‚ सौतेले माता–पिता भले ही वे वरिष्ठ न हो। संपत्ति का अर्थ है–कैसी भी संपत्ति‚ चल–अचल‚ खुद की या पुरखों की कमाई द्वारा प्राप्त‚ स्थाई‚ अस्थाई जिससे व्यक्ति कुछ प्राप्त करता है। इसी प्रकार‚ एक वरिष्ठ व्यक्ति जिस के संतान न हो पर उसका कोई उत्तराधिकारी हो‚ जिसे संपत्ति मिलेगी तो इन सबकी जिम्मेदारी है अपने वरिष्ठ लोगों की उचित देखभाल‚ भरण–पोषण सम्मान के साथ‚ उनकी संतुष्टि के अनुसार प्यार से करे। जिनके पास संपत्ति न हो उनके बच्चों का भी कर्तव्य है कि वे उनका उचित भरण–पोषण करें क्योंकि उन्होंने उनको तो जन्म दिया‚ पढ़ाया–लिखाया‚ बड़़ा किया और देखभाल की। ऐसा जब नहीं होता तो वरिष्ठ लोग कानून की धारा ५ में भरण–पोषण अधिकार याचिका–वे खुद या किसी और की तरफ से सीनियर सिटिजन ट्रिब्यूनल/ड़ीएम/डि़प्टी कमिश्नर ऐरिया के यहां फाइल कर सकते हैं। यह एक्ट किसी भी दूसरी अदालत के होते हुए भी विशेष अधिकार रखता है। इससे द्वारा वरिष्ठ नागरिक को बच्चों द्वारा भरण–पोषण पाने का अधिकार है। बच्चे अगर उन्हें तंग करते हैं तो ट्रिब्यूनल को यह अधिकार है कि वे ऐसे बच्चों को घर से निकाल बाहर करें। जुलाई २०२३ को दिल्ली उच्च न्यायालय से आशीष रामदेव तथा अन्य के मुकदमे में फैसला आया है कि वरिष्ठ माता–पिता को बेटे–बहू द्वारा अपने ही घर से बेदखल नहीं किया जा सकता। उन्हें सिविल कोर्ट जाकर न्याय की गुहार नहीं लगानी। ट्रिब्यूनल के रूल्स २०१६ के अनुसार बच्चों से घर खाली करवाया जा सकता है‚ भले ही वरिष्ठ माता–पिता और बच्चों के बीच संपत्ति का विवाद चल रहा हो। ऐसा ही एक मुकदमा हाल में फाइल हुआ है ट्रिब्यूनल में‚ जिसमें शादीशुदा बेटी अपने बेटे और भाई के साथ मिलकर अपनी मां को मार चुके हैं–ड़ायबिटिज की दवा और खाना न देकर‚ वृद्धावस्था में मां को मारने के बाद‚ ७५ वर्षीय पिता को अपनी बनाई (पिता द्वारा) संपत्ति से छह महीने पहले बाहर खदेड़़कर संपत्ति पर कब्जा कर लिया। मुकदमा फाइल करने के बाद कम–से–कम ढøाई से तीन महीने लगते हैं उसका असर दिखने में।

इस अदालत में और दूसरी अदालतें जिसमें सिर्फ न्यायिक पदों पर अधिकारी होते हैं‚ उनमें फर्क यह है कि यहां तथ्यों की जांच पहले ही हो जाती है और दोनों पक्षों को बाद में सुना जाता है ताकि फैसले में भूल भी न हो और फैसला जल्दी आए। पर रेगुलर अदालतों में पहले सुनवाई होती है फिर जांच। इस ट्रिब्यूनल के फैसले‚ चूंकि गुड़फेथ यानी ईमानदारी से लिए जाते हैं। अतः इन फैसलों को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जाती। इस अदालत के आदेश पारित होने में कोई कठिनाई आने पर राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह इसे ऑफिशियल गजट में प्रकाशित कर वह ‘प्राविजन’ ही बदल दे‚ जिसके कारण आदेश पारित होने में कठिनाई हो रही है।
केरल की जगह ‘केरलम’ सुनने‚ बोलने और लिखने में अधिक अच्छा लगता है। यह मूलतः मलयालम का शब्द है जो अंग्रेजी के ‘केरला’ से लाख गुना बेहतर है। पर क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि नाम बदलने पर आपत्ति करने वाली लेफ्ट पाÌटयां भी उसी रास्ते पर चल पड़ी हैंॽ

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