कांग्रेस नेता राहुल गांधी दो दिनों से मणिपुर के दौरे पर थे। शुक्रवार को राहुल ने मोइरंग के एक राहत शिविर में जाकर हिंसा से प्रभावित बेघर लोगों से मुलाकात की। गुरुवार को ड्रामा हुआ, जब पुलिस ने राहुल को चूड़ाचांदपुर जाते समय रास्ते में रोक लिया और वापस इम्फाल भेज दिया। राहुल बाद में हेलीकॉप्टर से चूड़ाचांदपुर गए और राहत शिविरों में बेघर लोगों से मुलाकात की। राहुल ने एक ट्वीट के ज़रिये कहा कि वह ‘पुर में भाई-बहनों को सुनने के लिए आये हैं। सभी समुदायों के लोगों से उन्हें प्यार मिला। णिपुर के घावों पर मरहम लगाने की जरूरत है। हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि राज्य में शांति स्थापित हो।’ मणिपुर में गुरुवार को सुबह हथियारबंद लोगों ने इम्फाल वेस्ट के पास एक गांव पर हमला कर दो लोगों की हत्या कर दी। असम राइफल्स ने जवाबी कार्रवाई की। शाम को एक बड़ी भीड़ ने इम्फाल में बीजेपी के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और पुलिस को आंसूगैस छोड़नी पड़ीं। राहुल गांधी मणिपुर गए, अच्छा किया। वहां के लोगों से मिले, ये भी अच्छा किया। लेकिन कांग्रेस का ये कहना उचित नहीं है कि मोदी मणिपुर इसलिए नहीं गए कि वो नहीं चाहते कि मणिपुर के हालात के बारे में लोगों को पता चले। आज के ज़माने में जहां मीडिया के कैमरे हर जगह मौजूद रहते हैं, हालात को कोई कैसे छिपा सकता है? पूरे देश ने टीवी पर देखा है कि मणिपुर में कैसे हिंसा भड़की, कैसे टकराव हुआ। दूसरी बात ये कि गृह मंत्री अमित शाह कई बार मणिपुर गए। कई दिन वहां रुके। अगर मोदी वहां जाते तो यही लोग कहते कि वो पब्लिसिटी लेने हर जगह पहुंच जाते हैं। यही लोग कहते कि उन्हें गृह मंत्री को भेजना चाहिए था, लेकिन विरोधी दलों में ये होता ही है, ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’। इसका किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिए।
क्या राजनीतिक दलों के इशारे पर जंतर-मंतर पर हुई हिंसा !
जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रदर्शन और संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा मामले में बड़ा अपडेट सामने आया है. पुलिस...







