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अयोध्या में क्यों नहीं बन पा रही है मस्जिद…….

UB India News by UB India News
May 19, 2023
in Lokshbha2024, अध्यात्म
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अयोध्या में क्यों नहीं बन पा रही है मस्जिद…….
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इंडो-इस्लामिक कल्चर फाउंडेशन (आईआईसीएफ) अयोध्या में मस्जिद बनाने के नक्शे की मंजूरी के लिए अयोध्या विकास प्राधिकरण (एडीए) को एक रिपोर्ट सौंपने वाली है. इससे पहले ये फांउडेशन एडीए से विकास शुल्कों को पूरी तरह से फ्री कराने के लिए एक प्लान बना रही है. जिसकी पूरी डिटेल वो यूपी सरकार को सौंपेगी. इंडो-इस्लामिक कल्चर फाउंडेशन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा गठित समिति है.

आईआईसीएफ को मस्जिद के नक्शे की अंतिम मंजूरी हासिल करने के लिए श्रम और विकास कर के रूप में लगभग 10-12 करोड़ रुपये जमा करने होंगे. क्राउडफंडिंग के माध्यम से मस्जिद के लिए फाउंडेशन अब तक लगभग 50 लाख रुपये ही जुटा पाई है.

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आईआईसीएफ के एक अधिकारी ने अंग्रेजी अखबार द हिंदू को बताया कि मस्जिद के लिए धन जुटाना बंद कर दिया गया था, इसके निर्माण के रास्ते में लगातार बाधाएं आ रही थीं.

अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक आईआईसीएफ के सचिव अतहर हुसैन सिद्दीकी ने कहा कि समिति राज्य सरकार की आभारी है. राज्य सरकार ने उस क्षेत्र के भूमि नियमों को बदल दिया है. इसकी वजह से मस्जिद की योजना बनाई गई है. अब हमारे लिए प्रक्रिया आसान हो गई है.

अतहर हुसैन सिद्दीकी ने बताया कि पिछले महीने नक्शे की अंतिम मंजूरी के लिए आवेदन करने की तैयारी थी. जब इसके लिए एडीए से संपर्क किया गया तो बताया गया कि विकास और श्रम टैक्स के रूप में कुछ पैसा जमा करना होगा. जब पूछताछ की तो यह पता चला कि कई करोड़ रुपये की राशि जमा करनी होगी. फाउंडेशन को लेकर फिलहाल इतने पैसे नहीं हैं. इसलिए राज्य सरकार से विकास शुल्क माफ करने के लिए अनुरोध करने का फैसला लिया है. इसके लिए फाउंडेशन के अध्यक्ष की तरफ से राज्य के अधिकारियों को एक पत्र भेजा जाएगा.

एडीए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘जैसे ही आईआईसीएफ प्राधिकरण के पास मंजूरी के लिए मस्जिद का नक्शा जमा होगा, हमारा सॉफ्टवेयर एक फॉर्म तैयार करेगा. इस फॉर्म में विकास कर (परियोजना की कुल लागत का 2-3%) और श्रम उप-कर (परियोजना लागत का 1%) जमा करने की डिटेल होगी’.

आईआईएफसी के अनुसार तीन चरणों वाली मस्जिद परियोजना की कुल लागत लगभग 300 करोड़ रुपये हैं. यह परिसर 4,500 वर्ग मीटर में फैला हुआ है. इसमें एक अस्पताल, सामुदायिक रसोई और पुस्तकालय और एक शोध केंद्र शामिल हैं. शोध केन्द्र स्वतंत्रता सेनानी मौलवी अहमदुल्ला शाह को समर्पित है, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था. मस्जिद का खाका प्रोफेसर एसएम अख्तर द्वारा डिजाइन किया गया है .

एडीए की ओर से क्या मिला जवाब

खबरों के मुताबिक एडीए की ओर से ने कथित तौर पर ये कहा गया है कि अगर आईआईसीएफ आवेदन करता तो प्राधिकरण 24 घंटे के भीतर मस्जिद के नक्शे को मंजूरी देने के लिए तैयार था. बता दें कि नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मंदिर के निर्माण की अनुमति दी. सुप्रीम कोर्ट ने 1,000 से ज्यादा पन्नों का आदेश दिया था. जिसमें शीर्ष अदालत ने केंद्र या राज्य को मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में पांच एकड़ जमीन आवंटित किए जाने का भी आदेश दिया था. अदालत ने विशेष रूप से केंद्र और राज्य दोनों सरकारों से मंदिर के साथ-साथ मस्जिद निर्माण के लिए भी सुविधा देने के लिए कहा था.

राम मंदिर का 50 प्रतिशत काम पूरा

वर्तमान में अयोध्या में राम मंदिर का 50 प्रतिशत से ज्यादा काम पूरा हो चुका है. अधिकारियों ने यह भी घोषणा की है कि गर्भगृह में ‘प्राण प्रतिष्ठा’ 14 जनवरी, 2024 को होगी. विश्व हिंदू परिषद और अयोध्या मंदिर ट्रस्ट ने नए मंदिर के लिए 3,500 करोड़ रुपये से ज्यादा एकत्र किए हैं. अयोध्या शहर से 25 किलोमीटर दूर धन्नीपुर में मस्जिद बननी है. लेकिन इस काम में कई तरह के रोड़े सामने आ चुके हैं.

आईआईएफसी के एक सदस्य ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर द हिंदू को बताया, ‘हम जानते हैं कि इस देश में मस्जिद और मंदिर का कोई मुकाबला नहीं है लेकिन हमें नहीं पता था कि चीजें हमारे लिए इतनी मुश्किल होंगी. उन्होंने कहा कि पिछले साढ़े तीन सालों में मस्जिद के लिए कुछ भी नहीं हुआ है. भूमि नियमों और करों के लिए फॉर्म और अलग-अलग विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र में देरी हुई है. ये चीजें हमें बहुत परेशान कर रही हैं.

मंदिर निर्माण के लिए आया चंदा

दिसंबर 2022 तक अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट ने 5,500 करोड़ रुपये का चंदा एकत्र किया था. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने टेलीग्राफ को बताया कि अब तक इकट्ठा किए गए धन में से 3,400 करोड़ रुपये इस साल 15 जनवरी से 27 फरवरी के बीच एक विशेष अभियान के दौरान दान किए गए थे. उन्होंने कहा, ”लोग राम मंदिर निर्माण के लिए तहेदिल से दान दे रहे हैं. ट्रस्ट का कार्यालय चलाने वाले आरएसएस सदस्य प्रकाश गुप्ता ने अयोध्या में संवाददाताओं से कहा, “दानदाताओं की भक्ति इतनी गहरी है कि उन्होंने हमारे खातों में पैसे भेजना जारी रखा, भले ही महामारी ने पूरे देश को एक ठहराव में ला दिया था.

अयोध्या विवाद पर एक नजर

अयोध्या विवाद एक सदी से ज्यादा समय तक जारी रहा है. ये विवाद भारत के सबसे पेचीदा अदालती मामलों में से एक था और इस मुद्दे ने भारत में राजनीति की पूरे विमर्श को बदल दिया है. हिंदुओं का मानना है कि अयोध्या में भगवान राम का जन्मस्थान है. मुसलमानों का कहना था कि उन्होंने पीढ़ियों से उस जगह पर नमाज अदा की है जिसे भगवान राम का जन्मस्थान बताया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में फैसला सुनाया कि वो जगह मंदिर बनाने के लिए हिंदुओं को दी जानी चाहिए.

हिंदू धर्म भारत का बहुसंख्यक धर्म है. यह माना जाता है कि यह धर्म 4,000 साल से ज्यादा पुराना है. भारत का पहला इस्लामी राजवंश 13 वीं शताब्दी की शुरुआत में स्थापित किया गया था.

क्या था विवाद?

विवाद का केंद्र 16 वीं शताब्दी की एक मस्जिद है जिसे साल 1992 में गिरा दिया गया था.कई हिंदुओं का मानना था कि बाबरी मस्जिद वास्तव में एक हिंदू मंदिर के खंडहरों पर बनाई गई थी जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया था.

मुसलमानों का कहना है कि उन्होंने दिसंबर 1949 तक मस्जिद में नमाज अदा की. इसी दौरान जब कुछ हिंदुओं ने मस्जिद में राम की मूर्ति रखी और मूर्तियों की पूजा करना शुरू कर दिया. दोनों धर्मों के लोग कई बार अदालत गए.

क्या सुप्रीम कोर्ट ने क्या सुनाया फैसला

इस विशेष मामले में तीन मुख्य पक्षकार थे -हिंदू महासभा, निर्मोही अखाड़ा, और सुन्नी वक्फ बोर्ड. इलाहाबाद हाईकोर्ट में सितंबर 2010 में एक फैसला दिया कि 2.77 एकड़ विवादित भूमि को तीन भागों में समान रूप से विभाजित किया जाएगा. जिसमें मुस्लिम समुदाय को एक तिहाई, हिंदू महासभा को एक तिहाई और निर्मोही अखाड़ा संप्रदाय को बाकी हिस्से पर नियंत्रण मिलना चाहिए. मुख्य विवादित जगह को जहां कभी मस्जिद हुआ करती थी, हिंदुओं को दे दिया गया. फैसले में तीन प्रमुख टिप्पणियां भी की गईं.

पहला विवादित स्थान भगवान राम का जन्मस्थान था, बाबरी मस्जिद एक हिंदू मंदिर के विध्वंस के बाद बनाई गई थी, तीसरा यह इस्लाम के सिद्धांतों के अनुसार नहीं बनाई गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2011 में इस फैसले को रोक दिया. दरअसल इस फैसले के खिलाफ उस समय हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने इसके खिलाफ अपील की थी. इसके बाद 9 नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए सबूत के रूप में कहा गया कि इमारत के अवशेष इस्लामी नहीं थे”.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विवादित भूमि भगवान राम के मंदिर के लिए हिंदुओं को दी जानी चाहिए, जबकि मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए कहीं और जमीन दी जाएगी. इसके बाद कोर्ट ने संघीय सरकार को मंदिर के निर्माण के प्रबंधन और देखरेख के लिए एक ट्रस्ट स्थापित करने का निर्देश दिया. हालांकि, अदालत ने कहा कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस कानून के शासन के खिलाफ था. मुस्लिमवादियों के मुख्य समूह ने कहा है कि वह फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेगा.

 

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