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बदले हुए मजबूत भारत का नया चेहरा है……..

UB India News by UB India News
April 25, 2023
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, ब्लॉग
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बदले हुए मजबूत भारत का नया चेहरा है……..
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सूडान में सेना और अर्धसैनिक बल के बीच चल रहे भीषण गृहयुद्ध के चलते वहां हालात तो बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। ऐसे में वहां फंसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाने को लेकर सारा देश चिंतित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूडान में फंसे भारतीयों को जल्द से जल्द सुरक्षित निकासी के लिए विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को निर्देश दे दिए हैं। मतलब यह कि अब सरकार एक्शन मोड में आ गई है।

यह बदले हुए मजबूत भारत का नया चेहरा है। अब जहां पर भी भारतवंशी या भारतीय संकट में होते हैं‚ तो भारत सरकार पहले की तरह हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठती। आपको याद ही होगा कि रूस–यूक्रेन जंग के कारण हजारों भारतीय मेडिकल छात्र–छात्राएं यूक्रेन में फंस गए थे। उन्हें सरकार तत्काल सुरक्षित स्वेदश लेकर आई। भारत के हजारों विद्यार्थी यूक्रेन में थे। वे वहां पर मेडिकल‚ डेंटल‚ नर्सिंग और दूसरे पेशेवर कोर्स कर रहे थे। ये रूस–यूक्रेन जंग को देखते हुए वहां से निकल कर स्वदेश आना चाहते थे। पहले तो किसी को समझ में ही नहीं आ रहा था कि इतनी अधिक संख्या में यूक्रेन की राजधानी कीव और दूसरे शहरों में पढ़ रहे भारतीय नौजवानों को स्वदेश कैसा लाया जाएगा। पर इच्छाशक्ति हो तो सब कुछ संभव है। यह साबित करके दिखाया गया। अब अफगानिस्तान में गृहयुद्ध के दिनों की ही बात को जरा याद कर लें। भारतीय वायु सेना और एयर इंडिया के विमान लगातार अफगानिस्तान से भारतीयों को लेकर स्वदेश आते रहे थे। भारत के हजारों करोड़ रु पये के प्रोजेक्ट फंस गए थे। इन प्रोजेक्ट्स से हजारों भारतीय जुड़े हुए थे। इन्हीं भारतीयों को सुरक्षित निकाला जा रहा था। अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के नियंत्रण के बाद ही आने वाली परिस्थितियों को भांपते हुए भारत सरकार सक्रिय हो गई थी। जाहिर है‚ ये सब कदम उठाने के बाद भारत सरकार का इकबाल न केवल देश के अंदर बल्कि विदेशों में भी बुलंद हुआ। अब आगे बढ़ने से पहले १९७२ के दौर में चलते हैं। अब भी बुजुर्ग हो रहे भारतीयों को याद ही होगा कि सन १९७२ में अफ़्रीकी देश युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने अपने देश में रहने वाले हजारों भारतीयों को रातों–रात आदेश दे दिया था कि वे सभी ९० दिनों में देश को छोड़ दें। हालांकि वे भारतीय ही युगांडा की अर्थव्यवस्था की जान थे। पर सनकी अमीन कभी भी और कुछ भी कर देता था। उसके फैसले से वहां पर दशकों से रहने वाले भारतवंशियों के सामने बड़ा भारी संकट खड़ा हो गया था। तब ब्रिटेन ने उन भारतीयों को अपने यहां शरण दी थी। तब हमारी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने उन भारतवंशियों के लिए कुछ नहीं किया था। ऐसा उन्होंने क्यों किया यह लोगों को अचम्भे में डालने वाला था क्योंकि‚ वे कोई कमजोर प्रधानमंत्री तो थी नहीं उस समय बांग्लादेश की आजादी और पाकिस्तान के ९३‚००० सैनिकों के आत्म समर्पण के बाद उनकी शोहरत का डंका बज रहा था लेकिन‚ उन्होंने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। पता नहीं क्योंॽ भारतीय युगांडा में लुटते–पिटते रहे थे‚ लेकिन हमने घडियाली आंसू बहाने के सिवा कुछ नहीं किया था। उन भारतीयों को हमसे अभी तक गिला है जो होना भी चाहिए। क्या हम सात समंदर पार जाकर बस गए बहादुर उधमी भारतीयों से सिर्फ यही उम्मीद रखें कि वे भारत में आकर निवेश करेंॽ पर अब भारत चुनौती का सामना करता है। भारत की बदली हुई विदेश नीति के चलते ही हमने टोगो में जेल में बंद पांच भारतीयों को सुरक्षित रिहा करवाया था। ये सब के सब केरल से थे। भारत सरकार २०१५ में यमन में फंसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाई थी। वह अपने आप में एक मिसाल है। अब भारत सरकार के सामने सूडान से भारत के नागरिकों को लाने की बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी खुद सूडान से भारतीयों को वापस लाने के काम पर लगातार नजर रख रहे हैं। सूडान में चल रहे गृह युद्ध में कुछ भारतीयों के हताहत होने की भी खबरें हैं। सूडान में ३००० से अधिक भारतीय इस समय फंसे हैं। राजधानी खार्तूम में संघर्ष की वजह से इनकी निकासी में मुश्किलें आ रही हैं।

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बहरहाल‚ यह दुखद है कि भारत के मित्र देश सूडान में इतना गंभीर आतंरिक संकट चल रहा है। भारतीय विशेषज्ञ सूडान के वानिकी क्षेत्र के विकास में सन १९१० से सक्रिय हैं। महात्मा गांधी ने १९३५ में इंग्लैंड जाते समय पोर्ट सूडान का दौरा किया था और सूडान में बसे भारत वंशियों से मुलाकात की थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी १९३८ में सूडान गए थे। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने १९५३ में पहले सूडानी संसदीय चुनाव का निरीक्षण किया। १९५७ में स्थापित सूडानी चुनाव आयोग ने भारतीय चुनाव कानूनों और प्रथाओं से प्रेरणा प्राप्त की। भारत ने फरवरी १९५४ में स्थापित सूडानीकरण समिति को वित्तीय सहायता प्रदान की‚ जिसे स्वतंत्रता के बाद सूडानी सरकार में ब्रिटिश कर्मचारियों की जगह लेने का काम सौंपा गया था। भारत ने मार्च १९५५ में खार्तूम में अपना दूतावास खोला। सूडान ने उसके चंदेक सालों के बाद राजधानी के चाणक्यपुरी में अपना दूतावास स्थापित किया। अब भारत यह भी चाहेगा कि वहां पर हालात शांतिपूर्ण हो जाएं और वहां से सारे भारतीयों को सुरक्षित निकाल लिया जाए।

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