आजादी के बाद बने दूसरे प्रेस कमीशन की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि सांप्रदायिक दंगों की खबर देते वक्त ‘प्रिंट मीडिया’ संलग्न लोगों के जाति‚ धर्म या पहचान के अन्य चिह्नों को स्पष्ट न करे। इसी का असर रहा कि तब के प्रिंट और रेडियो में खबरें इसी रूप में आतीं। दंगों की रपटें ‘संपादित’ होकर कुछ इस तरह छपतीं फलां जगह दो समुदायों के बीच दंगा हो गया‚ इतने मरे इतने घायल हुए। पुलिस ने दफा १४४ लगा दी है। प्रशासन ने शांति कमेटी बना दी है। इलाके में फिलहाल शांति है……
अखबार में छपी खबर लोगों तक एक दो दिन बाद ही पहुंचती। खबर अक्सर ‘डाई’ (बिना फोटो) होती ताकि दंगाइयों के धर्म‚ जाति की ‘पहचान’ न हो और वैसी ‘पहचान’ वाले उत्तेजित न हों! बहुत दिनों तक प्रिंट में इसी तरह की रिपोटे आया करतीं। आप उनको पढते और भूल जाते कि कुछ हुआ भी है। वह एक अमूर्त और संक्षिप्त सी खबर होती। सच पता करने का काम पुलिस का होता जो गोपनीय ही रहता। रिपोर्टर भी इसी तरह की रिपोर्टें भेजते और अगर उसमें कुछ नाम आदि आ जाते तो संपादक उनको हटा देते और उनकी जगह ‘दो समुदाय’ या ‘दो समुदायों के कुछ अराजक तत्व’ छाप दिया जाता।
एक नजर से देखें तो प्रेस कमीशन की ये हिदायतें उस समय के हिसाब से ‘उचित’ नजर आती हैं। अखबार वालों को लगता कि ऐसा करके वे अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनका अखबार अपना काम ठीक से कर रहा है। खबर बुलेटिनों के शुरू होने के बाद भी दूरदर्शन की खबरों में इस बात का खास ख्याल रखा जाता रहा कि दंगे की रिपोर्ट ऐसी हो‚ जिसमें दंगाइयों की तस्वीरें बहुत साफ न दिखें। ऐसी खबरों को अक्सर ‘ड्राई’ (बिना फोटो) दिया जाता। तब का मीडिया समझता रहा कि खबर को संपादित करके अपने मीडिया–कर्तव्य को निभा रहा है‚ लेकिन ऐसा करने से भला दंगों की खबरें कहीं रुका करती हैंॽ कहने की जरूरत नहीं कि अपने जैसे ‘कनफुसिया प्रिय’ समाज में ऐसी खबरें अफवाह बनकर दूर–दूर तक पहंुच जाती हैं फिर ये अफवाहें ‘मिथक’ में बदल जाती हैं। अफवाह फैलाने वाले उनको अपने तरीके से बढा–चढाकर बताते हैं और घटित दंगे नये–नये ‘आख्यानों’ (नेरेटिव) का रूप ले लेते हैं जो लोगों के अवचेतन में पैठते रहते हैं। यह सच है कि प्रेस कमीशन ने आजादी के तुरंत बाद की खास स्थितियों को ध्यान में रखकर ही उक्त तरह की ‘खबर नीति’ बनाई थी जो एक समय तक कारगर रही‚ लेकिन आज के ‘रीयल टाइम’ वाले ‘लाइव मल्टी मीडिया’ के दौर में यह नीति बेकार नजर आती है। यह नीति ‘सच को छिपाने’ की नीति पर आधरित थी‚ जिसे खबर निजी चैनलों के आने और खबरों के उनके लाइव कवरेज ने बेकार कर दिया और रही कसर ‘सोशल मीडिया’ के आ जाने ने पूरी कर दी! इसीलिए आज दंगे–फसाद की कोई घटना नहीं छिपती बल्कि वह ‘लाइव लाइव’ नजर आती और ‘आर्काइव्ज’ में जाकर‚ ‘डाटा’ बनकर अमर हो जाती है। आज‚ सैकडों खबर चैनलों के कैमरे किसी भी दंगे‚ आगजनी‚ हिंसा और लूटमार को चौबीस बाई सात हिसाब से रीयल टाइम में प्रसारित करते हैं और उनकी प्रतिक्रिया को भी दिखाते बताते रहते हैं। और जब से जीवन में ‘स्मार्टफोन’ का चलन बढा है तब से हर नागरिक ‘वीडियो रिपोर्टर’ बन गया है।
आज स्मार्टफोनों की मेहरबानी से हर घटना लाखों वीडियो रूप धरण कर खबरों का नया घटाटोप बना देती है‚ जिसमें ‘न्यूज’ के साथ ‘फेक न्यूज’ भी आती है‚ लेकिन आज ‘फेक’ को पकडा भी जा सकता है! चौबीस बाई सात के समकालीन टीवी कवरेज और सोशल मीडिया ने आज हर व्यक्ति या समुदाय को एक प्रकार का नया ‘लीलाधर’ (परफार्मर) बना दिया है। वह मीडिया में दिखकर ताकत बटोरने के खेल को खेलता है और इसके लिए वह अपने पहचान के चिह्नों से अपने समुदाय को संबोधित करने वाला एक नया नायक/खलनायक बनने की कोशिश करता है। शायद इसीलिए आज हम दंगा नहीं‚ दंगों की सीरीज देखते हैं। आज की इस लाइव वीडियोबाजी का एक फायदा यह भी है अब सच किसी के छिपाए नहीं छिपता। इसीलिए वीडियो में आए दंगाई चेहरों को पहचानना और दंडित करना अब आसान हो गया है। कहने की जरूरत नहीं कि छिपाने की नीति से बहतर है घटना दिखाना और उसके कर्ताओं को भी दिखाना ता कि वे पकडे जा सकें। हमारा मानना है कि आज के लाइव मीडिया का अगर सही उपयोग किया जाए तो ऐसी घटनाओं के कर्ताओं को एक्सपोज करके उन पर अंकुश भी लगाया जा सकता है!







