स्त्रियाँ उतारी गई सिर्फ कागज और केनवस पर‚ नहीं उतारी गइ तो बस रूह में।’ अमृता प्रीतम की ये सुलगती पंक्तियां आज भी सच और साहस का आईना दिखाती है जब भी ्त्रिरयां साहसिक फैसलों से अपने पूरे अक्स के साथ शीशे में आदमकद उतर आती हैं। क्या ये गर्विता भाव उन्हें उद्वेलित भी कर पाता है जो सभ्यता के आगाज से ही खुद को सतात्मकता के सबसे उपरी सीढ़ी पर मानते आए हैं। आबादी के उस पार की साहस‚ स्वाभिमान और आत्म विश्वास की कहानियां हमेशा से हमें प्रेरित करती रही हैं। आत्मबल के इस दास्तानगोई को हाल ही में आगे बढ़ाया है न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने।
साल २०१७ में मात्र ३७ साल की उम्र में दुनिया की सबसे कम उम्र की और साल १८५६ के बाद न्यूजीलैंड की सबसे युवा प्रधानमंत्री रही जेसिंडा दुनिया की दूसरी ऐसी राष्ट्राध्यक्ष भी रहीं‚ जिन्होंने पद पर रहते हुए एक बच्चे को भी जन्म दिया और केवल साढ़े पांच साल के कार्यकाल के बाद उनके इस्तीफे का चौंकाने वाला फैसला हतप्रभ करने के साथ कौतूहल भी पैदा करता है। सफलता के शीर्ष पर पहुंच बेशुमार प्यार‚ शोहरत और तवज्जो पाने के बाद स्वेच्छा से कोई अपना राजनैतिक पद छोड़ दे और ये कहे कि अब देश का नेतृत्व जारी रखने के लिए उनके पास ऊर्जा नहीं है और वे अब चुनाव नहीं लड़ना चाहती; ऐसी बातें नजीर बन जाती है। बेशक बात छोटी है पर घटना बड़ी है। ये कुछ ऐसा है जैसे कोई चोटी का योद्धा तमाम सफलता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद सायस संन्यास की घोषणा करे। बहरहाल ये तो बातें हुई दार्शनिकता की‚ लेकिन क्या हम इसे इस नजरिए से देखें कि ऐसा साहस कभी हमारे देश के राजनैतिक नेतृत्वकर्ताओं ने दिखाया है। सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक गुजर जाने वालों के लिए क्या जेसिंड़ा का ताजातरीन आचरण कभी नजीर बन पाएगी। कई राजनीतिक पारियां खेलने के बाद भी शासन और सत्ता के व्यामोह में फंसे इन तथाकथित सार्थक सिपाहियों को जेसिंडा जैसी दिलेर महिला से प्रेरणा ग्रहण करने की जरूरत है। ऐसी घटनाएं केवल त्याग‚ संतोष और समर्पण की बानगी भर नहीं हैं बल्कि इतिहास की तारीख में हमेशा के लिए दर्ज हुई उस आयत की तरह है जहां ्त्रिरयां केवल करु णा‚ प्रेम या दया की प्रतिमूर्ति की तरह नहीं उकेरी गइ है बल्कि सूझबूझ‚ साहस और निर्णायक कदम उठाने की दिलेरी दिखाने वाली एक बहादुर आबादी के रूप में कलमबंद की गई है।
जाहिर है उन्होंने पद‚ पैसा और पेशे की तुलना में हमेशा हित‚ हिस्सा और ह्रदय को सर्वोपरि माना है। दूसरों को भी अवसर मिलें और देश बेहतरी की ओर आगे बढ़े ऐसी सोच की ताकत केवल एक महिला ही दिखा सकती है। ये बात और है कि पौराणिक काल से ्त्रिरयों को लेकर जिन नियमों और मर्यादाओं की रेखा खींची गइ और उनकी स्वाधीनता और स्वाबलंबन के खिलाफ निहित स्वार्थों द्वारा जो महीन किस्म का सांस्कृतिक षड्यंत्र रचा गया उसने आजादी के इतने सालों बाद भी व्यावहारिक जीवन में उन्हें जटिल अंतर्विरोधों से जूझने पर मजबूर किया।
जेसिंडा का ये कहना कि वे इस उम्मीद और विश्वास के साथ देश का नेतृत्व छोड़ रही हैं कि देश का नेता ऐसा होगा जो नेकदिल होने के साथ मजबूत हो‚ संवेदनशील होने के साथ फैसले लेने वाला हो‚ आशावादी हो और देश का काम एकाग्रता से करे और अपनी छाप छोड़े। क्या हम कभी जेसिंडा जैसी महिलाओ से कोई सबक ले पायेंगे। ये प्रश्न भी है और चुनौती भी।







