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WFI चीफ कामकाज से अलग रहेंगे, पहलवानों को भविष्य में शोषण से बचाना सरकार की जिम्मेदारी

UB India News by UB India News
January 23, 2023
in खेल, महिला युग
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WFI चीफ कामकाज से अलग रहेंगे, पहलवानों को भविष्य में शोषण से बचाना सरकार की जिम्मेदारी
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महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए खेल मंत्रालय द्वारा एक निगरानी समिति गठित करने पर सहमत होने के बाद भारत के शीर्ष पहलवानों ने शुक्रवार आधी रात को अपना धरना समाप्त कर दिया। खेल मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक मैराथन बैठक के बाद ऐलान किया कि ‘एक निगरानी समिति बनाने का फैसला किया गया है। समिति 4 हफ्ते के भीतर अपनी जांच पूरी करेगी। यह भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) और इसके अध्यक्ष के खिलाफ वित्तीय या यौन उत्पीड़न के सभी आरोपों की गंभीरता से जांच करेगी।’

खेल मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, ‘समिति प्रमुख खिलाड़ियों द्वारा लगाए गए यौन शोषण, वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक चूक के आरोपों की जांच करेगी; WFI के रोजमर्रा के प्रशासन का काम देखेगी, खिलाड़ियों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर फिर से विचार करेगी। निगरानी समिति 4 हफ्ते में जांच पूरी करेगी और तब तक WFI अध्यक्ष (बृजभूषण शरण सिंह) रोजमर्रा के कामकाज से अलग रहेंगे और उन्होंने जांच में सहयोग करने का भरोसा दिया है।’

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3 दिन से जारी पहलवानों का यह धरना शुक्रवार देर रात सरकार के इस ऐलान के बाद समाप्त हो गया कि WFI चीफ जांच पूरी होने तक 4 हफ्ते के लिए पद से अलग हटने पर सहमत हो गए हैं।

गतिरोध भले ही खत्म हो गया है लेकिन पहलवानों की आशंकाओं पर गौर करने की जरूरत है क्योंकि WFI प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह खेलों की दुनिया के ताकतवर व्यक्ति हैं और उनका काफी दबदबा है। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के जबरदस्त दबाव के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार कर दिया।

सूत्रों का कहना है कि निगरानी समिति में पहलवान योगेश्वर दत्त की मौजूदगी WFI चीफ पर गंभीर आरोप लगाने वाले पहलवानों के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। क्योंकि योगेश्वर दत्त को बृजभूषण शरण सिंह के खेमे का बताया जा रहा है।

विरोध करने वाले पहलवानों को डर है कि WFI के शीर्ष नेतृत्व में गड़बड़ी का पर्दाफाश करने में उनके रोल के लिए भविष्य में उन्हें परेशान किया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि विरोध करने वाले पहलवानों ने न केवल सिंह के इस्तीफे की मांग की थी, बल्कि WFI की पूरी गवर्निंग काउंसिल को भंग करने की भी मांग की थी।

समय की मांग है कि विश्व प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन करने वाले भारत के इन पहलवानों को सभी वर्गों से सम्मान मिलता रहे और उन्हें भविष्य में ताकतवर लोगों के द्वारा किसी भी प्रकार की ज्यादती से बचाया जाए।

यौन उत्पीड़न के आरोप ऐसे हैं, जिनकी विस्तृत और निष्पक्ष जांच के बाद IPC के तहत कड़ी कार्रवाई करने के लिए मामला पुलिस को सौंप दिया जाना चाहिए।

पुरुष हों या महिला, पहलवानों की सभी आशंकाओं को दूर किया जाना चाहिए ताकि भारतीय कुश्ती की दुनिया में एक पेशेवर माहौल लौटे और वे देश के लिए और ज्यादा मेडल जीत सकें।

बृजभूषण शरण सिंह एक बेहद ताकतवर और दबंग शख्सियत हैं। उन्होंने कह दिया है कि वह किसी की दया से महासंघ के अध्यक्ष नहीं बने हैं और अगर उन्होंने जुबान खोली तो ‘सुनामी’ आ जाएगी।

बृजभूषण शरण सिंह ने लोकसभा का पहला चुनाव 1991 में बीजेपी के टिकट पर गोंडा से जीता था। 1996 में जब वह जेल में थे तो उनकी पत्नी ने चुनाव लड़ा और जीता। 1999 में बृजभूषण ने गोंडा से दोबारा चुनाव जीता। 2004 में बीजेपी ने उन्हें बलरामपुर से टिकट दिया था, और वह वहां से भी जीत गए। 2009 में बृजभूषण शरण सिंह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और कैसरगंज सीट से सांसद बने। 2014 और 2019 में वह बीजेपी के टिकट पर फिर चुनाव जीत गए। बृजभूषण के बेटे प्रतीक भूषण भी गोंडा की सीट से बीजेपी से विधायक हैं। उन्होंने दूसरी बार चुनाव जीता है।

बाप-बेटे पूरे इलाके में काफी ज्यादा असर रखते हैं, और WFI पर उनकी काफी पकड़ है। बृजभूषण शरण सिंह का नारा है, ‘पहलवान हूं, इसीलिए डॉन हूं।’ उनके खिलाफ पिछले 35 सालों में दर्जनों मुकदमे दर्ज हुए। मोटरसाइकिल चोरी और अवैध शराब की तस्करी से शुरू होकर हत्या, हत्या की कोशिश, किडनैपिंग और टाडा तक तमाम केस दर्ज हुए।

उनका खौफ इतना है कि न सबूत मिलते हैं, न गवाह और वह अदालत से बरी हो जाते हैं। बृजभूषण शरण सिंह को 1990 के दशक में दाऊद इब्राहिम की गैंग के अपराधियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

वह टाडा (Terrorist  and Disruptive Activities Prevention Act) के तहत लंबे वक्त तक जेल में रहे। उसके बाद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मुकदमे दर्ज होते रहे और वह बरी होते रहे। अब उनके खिलाफ सिर्फ 4 मुकदमे रह गए हैं। बृजभूषण शरण सिंह किस तरह के दबंग हैं इसका अंदाजा आप इस बात से लगा लीजिए कि एक इंटरव्यू में उन्होंने कैमरे के सामने सीना ठोंक कर कहा था कि उन्होंने एक शख्स की पीठ पर बंदूक रखकर गोली चला दी थी, और वह वहीं मर गया। यानी हत्या की बात कैमरे पर कबूल करने वाले वह अकेले इंसान होंगे।

बृजभूषण शरण सिंह को लगता है कि बहराइच, गोंडा, बलरामपुर, अयोध्या और श्रावस्ती जैसे जिलों में वह पार्टी और सरकार से ऊपर हैं। वह पिछले 11 साल से भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष हैं।

यही वजह है कि सिंह सीना ठोंक कर कहते हैं, ‘मैं इस्तीफा क्यों दूं? मैं यहां किसी की कृपा से नहीं हूं।’ बृजभूषण शरण सिंह भले ही पहलवान हों, लेकिन उन्हें हेलिकॉप्टर में उड़ना, घोड़ों की सवारी करना और बंदूकधारियों की फौज के साथ घूमना भी पसंद है।

सिंह और उनकी पत्नी के नाम पर 5 हथियारों के लाइसेंस हैं। उनके पास एक पिस्टल, एक राइफल और एक रिपीटर राइफल है, जबकि उनकी पत्नी के पास एक लाइसेंसी राइफल और एक रिपीटर राइफल है। उनका परिवार यूपी में 56 शिक्षण संस्थानों का मालिक है। इनमें कई तकनीकी शिक्षण संस्थानों के अलावा इंटरमीडिएट और डिग्री कॉलेज भी शामिल हैं।

सिंह का कहना है कि महज आरोपों के आधार पर वह इस्तीफा नहीं देंगे। वह सबूत मांग रहे हैं और कह रहे हैं कि पहलवानों को सबूतों के साथ पुलिस के पास जाकर FIR दर्ज करवानी चाहिए।

इसमें तो कोई दो राय नहीं कि पहलवानों और फेडरेशन के अध्यक्ष के बीच जो जंग चल रही है, उसका नुकसान कुश्ती को ही होगा। तकनीकी तौर पर देखें तो कहा जा सकता है कि रेसलिंग फेडरेशन एक स्वतंत्र संस्था है और उसमें सरकार का दखल नहीं है। इसलिए सरकार अध्यक्ष पद से इस्तीफे का आदेश नहीं दे सकती। बृजभूषण शरण सिंह इसी बात का फायदा उठा रहे हैं।

दूसरी बात वह ये जानते हैं कि यौन शोषण का इल्जाम लगाने वाली लड़कियां खुलकर मैदान में आने से बचेंगी, इसलिए आरोपों का अदालत में साबित होना मुश्किल है। सिंह यह भी जानते हैं कि इस मामले को हरियाणा बनाम अन्य राज्य का रंग देकर, इसे सियासी मुद्दा बनाकर हल्का किया जा सकता है।

बृजभूषण शरण सिंह को यह भी पता है कि जो खिलाड़ी धरने पर बैठे, वे सीनियर खिलाड़ी हैं। उनका करियर अपनी ऊंचाई पर है और इसलिए वे बोल रहे हैं, लेकिन जो जूनियर खिलाड़ी हैं उनका पूरा करियर अभी बाकी है। वे करियर ख़त्म होने के डर से सीनियर्स को सपोर्ट नहीं करेंगे।

इसीलिए बृजभूषण सिंह कुश्ती महसंघ की जनरल बॉडी की मीटिंग बुलाकर उसमें सारे मुद्दों पर विचार करने की बात कहकर मामले को लटका रहे हैं।

सियासी तौर पर देखें तो कम से कम 5 संसदीय सीटों पर बृजभूषण शरण सिंह का दबदबा है। ऐसे में लोकसभा चुनाव से एक साल पहले कोई भी पार्टी उनसे टकराव क्यों मोल लेगी। यही वजह है कि बीजेपी के नेता चाहते हैं कि ‘सांप भी मर जाए, और लाठी भी न टूटे।’ लेकिन बृजभूषण शरण सिंह ने घाट-घाट का पानी पिया है और उन्हें साधना इतना आसान नहीं होगा। अब वक्त ही बताएगा कि आगे इस मामले में क्या होता है।

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