सीमाओं पर विदेशी सैनिकों के साथ झड़प होना और उन्हें उचित प्रत्युत्तर दिया जाना किसी भी देश के लिए एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। भारत को भी कभी पाकिस्तान के साथ तो कभी चीन के साथ या कभी–कभी तो बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के साथ भी झड़प का सामना करना पड़ता है। भारत अपने पड़ोसियों के साथ कभी आक्रामक नहीं रहा लेकिन पड़ोसी देशों द्वारा आक्रामकता का प्रदर्शन किए जाने पर वह कभी चुप भी नहीं बैठा। ऐसी ही एक झड़प आठ और नौ दिसम्बर की रात को अरु णाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में चीनी सैनिकों के साथ हुई। लेकिन वहां भी हमारे सैनिक न डरे‚ न दबे‚ बल्कि चीनी सैनिकों को पीटकर‚ खदेड़ कर ही दम लिया। इसके लिए हमें अपनी सेना की सतर्कता एवं सैनिकों की बहादुरी पर उनकी पीठ ही ठोंकनी चाहिए। भारतीय सैनिकों ने जो वीरता दिखाई है‚ उसकी भूरि–भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए। अपने जवानों के शौर्य को सलाम करना चाहिए‚ जिन्होंने चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया।
दरअसल‚ मंगलवार को संसद में इस मुद्दे पर बयान देते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने बहादुर सैनिकों की तारीफ की थी। उन्होंने कहा कि चीन को मनमाने तरीके से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की मौजूदा स्थिति को बदलने नहीं दिया गया। कायदे से तो रक्षा मंत्री के बयान के बाद ही यह मुद्दा समाप्त हो जाना चाहिए था‚ या फिर विपक्ष को भी अपनी बहादुर सेना और सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए बयान देना चाहिए था लेकिन विपक्ष ने जो रवैया अख्तियार किया‚ उसे हैरान करने वाला और शर्मनाक ही कहा जा सकता है। अब विपक्ष इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से तूल देकर लगातार संसद की कार्यवाही को बाधित कर रहा है। सदनों का बहिष्कार कर रहा है जबकि यह ज्ञात तथ्य है कि भारत–चीन सीमा पर कोई भी विवाद कम से कम नरेन्द्र मोदी सरकार की देन तो नहीं ही है।
कौन नहीं जानता कि आजादी के बाद से ही चीन ने भारत के विशाल भूखंड हथियाने शुरू कर दिए थे‚ और हमारा तत्कालीन नेतृत्व उन विशाल भूखंडों को बंजर जमीन बताने में व्यस्त था। क्या आज संसद में हंगामा कर रहा विपक्ष इस बात से इंकार कर सकता है कि कांग्रेस के शासनकाल में १९६२ में अक्साई चिन के ३७‚२४४ वर्ग किमी. क्षेत्र पर चीन ने बलात कब्जा कर लिया था यानी हमारे उत्तराखंड से १‚७६१ वर्ग किमी. ज्यादा क्षेत्रफल वाला भूखंड उस समय यूं ही बजर भूमि बताकर चीन को उपहार दे दिया गया। आज तो हम एक इंच भूमि भी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। हो सकता है‚ नेहरू युग की बातें आज के कांग्रेस नेताओं को याद न हों। लेकिन २००८ की घटनाएं तो ज्यादा पुरानी नहीं हैं ना। वे घटनाएं निश्चित रूप से कांग्रेस नेताओं को याद होंगी। २००८ के दौरान संप्रग सरकार के शासनकाल में चुमूर इलाके में टिया पांगनाक और चाबजी घाटी का २५० वर्ग किमी. का क्षेत्र जब चीन ने कब्जा किया तो आज का विपक्ष क्या कर रहा थाॽ २००८ में ही चीन ने जब जोरावर किले को नष्ट कर दिया तो हमारी तत्कालीन सरकार क्या कर रही थीॽ
२०१२ में इसी किले की जगह पर चीनी सेना यानी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का ऑब्जवंग प्वाइंट बनाया दिया गया और कुछ पक्के घर बनाकर बाकायदा कॉलोनी खड़ी कर दी गई‚ तब सरकार क्या कर रही थीॽ २००८ से २००९ के बीच भारत डेमचोक और डूंगती के बीच डूम चेली (द एंशियंट ट्रेड प्वाइंट) को कैसे गंवा बैठाॽ २००८ से २०१३ के बीच चीन ने ६०० बार घुसपैठ कैसे कीॽ तब पीएएल को रोका क्यों नहीं गयाॽ इन प्रश्नों के उत्तर भी विपक्ष खास तौर से उस दौरान संप्रग का नेतृत्व कर रही कांग्रेस को उसी संसद में क्यों नहीं देना चाहिए‚ जिसके बायकॉट का नारा वह आजकल बुलंद कर रही हैॽ यही नहीं‚ जब देश में कांग्रेस की सरकार थी‚ तो २००६ में भारत में चीन के दूतावास ने पूरे अरु णाचल और पूरे नेफा पर अपना दावा कर दिया था। चीन ने तब अरु णाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू को चीन का वीजा देने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि अरु णाचल प्रदेश तो उसका ही क्षेत्र है।
तेरह अक्टूबर‚ २००९ को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश यात्रा पर भी चीन ने आपत्ति जताई थी। २०११ में तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने चीन की धमकी के बाद डेमचोक इलाके में हमारे रोड एवं बॉर्डर इंफ़्रास्ट्रक्चर का काम ही रोक दिया था। क्योंॽ इस विषय पर शोध या संसद में बहस क्यों नहीं होनी चाहिएॽ आज तो भारत के प्रधानमंत्री चीन की सीमा से सटे आखिरी गांव तक जाकर आते हैं‚ और चीन सरकार की हिम्मत भी नहीं पड़ती आंख उठाकर देखने की। सीमा क्षेत्रों में सड़कें एवं अन्य बुनियादी ढांचा मजबूत करने का काम तो इतना जबर्दस्त हुआ है कि पिछले एक दशक में पूरे अरु णाचल प्रदेश में सड़कों का एक बड़ा जाल तैयार कर लिया गया है। भारत ने भूटान सीमा से सटे तवांग से लेकर अपर सियांग और दाबांग वैली से होते हुए डोंग–हवाई तक २००० किमी. लंबा सड़क मार्ग बनाने का काम शुरू कर दिया है। सड़कों के इसी नेटवर्क का कमाल है कि आठ–नौ दिसम्बर की रात जब चीन सैनिकों ने तवांग जिले के यांग्त्से में घुसपैठ की कोशिश की तो कुछ ही मिनटों में बड़ी संख्या में हमारे सैनिकों ने वहां पहुंचकर उनकी कोशिशें नाकाम कर दीं जबकि पहले ऐसा कतई संभव नहीं था। संप्रग सरकार में रक्षा मंत्री रहे एके एंटोनी ने तो बाकायदा संसद में दिए अपने बयान में कहा था कि सर्वोत्तम सुरक्षा सीमा पर विकास कार्य नहीं है।
दरअसल‚ संसद में हंगामे का मूल कारण एलएसी पर हुई हलचल कतई नहीं है। इसका उद्देश्य तो है राजीव गांधी फाउंडेशन का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द करने संबंधी प्रश्न पर चर्चा से कतराना। यह वही फाउंडेशन है जिसे २००५–०६ और २००६–०७ के वित्तीय वर्ष में चीनी दूतावास से १.३५ करोड़ रु पये का अनुदान प्राप्त हुआ था। यह अनुदान एफसीआरए कानूनों के अनुरूप नहीं था। राजीव गांधी फाउंडेशन का रजिस्ट्रेशन सामाजिक कार्यों के लिए किया गया था लेकिन चीनी दूतावास द्वारा उसे यह पैसा भारत–चीन संबंधों के विकास पर शोध के नाम पर दिया गया था।
संसद में हंगामे का मूल कारण एलएसी पर हुई हलचल कतई नहीं है। इसका उद्देश्य तो है राजीव गांधी फाउंडेशन का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द करने संबंधी प्रश्न पर चर्चा से कतराना। यह वही फाउंडेशन है जिसे २००५–०६ और २००६–०७ के वित्तीय वर्ष में चीनी दूतावास से १.३५ करोड़ रु पये का अनुदान प्राप्त हुआ था। यह अनुदान एफसीआरए कानूनों के अनुरूप नहीं था। राजीव गांधी फाउंडेशन का रजिस्ट्रेशन सामाजिक कार्यों के लिए किया गया था…..







