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शिक्षित लड़़कियां और खुदकुशी…….

UB India News by UB India News
December 11, 2022
in खास खबर, दुर्घटना, महिला युग
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शिक्षित लड़़कियां और खुदकुशी…….
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रसे तक हम यही समझते–समझाते रहे कि औरतों की सारी मुसीबत की जड है‚ उनका घर चलाने के लिए हर महीने अपने पति के सामने अपना भिक्षापात्र आगे बढा देना। लडकियों ने इसे अच्छी तरह समझ लिया और घर चलाने में बराबरी की हिस्सेदारी की। अष्टभुजा बनकर बच्चे भी पाले और नौकरी कर गृहस्थी की गाडी खींचने में भी मदद की। स्थितियां तब भी नहीं सुलझीं। पढी–लिखी‚ कामकाजी‚ आत्मनिर्भर लडकियां भी पहले से ज्यादा घुटन में रहने लगीं। अवसाद के मामलों में बढोतरी हुई। आत्महत्याओं के आंकडे बढ गए।

आज मध्य वर्ग की लडकियां शिकायत नहीं करतीं तो इसका यह मतलब नहीं कि वे सहती नहीं। अधिकांश लडकियों के साथ यही होता है कि एक अलिखित आचार संहिता उन्हें रोकती है‚ जिसके तहत वे सोचती हैं कि मां–बाप की जिम्मेदारी उन्हें पढा–लिखा कर अपने पैरों पर खडे होने की कूवत देने और अपनी मर्जी के लडके से ब्याह करने की इजाजत देने के बाद समाप्त हो जाती है‚ और शादी के बाद की सारी समस्याओं से अब उन्हें अकेले ही निबटना है। आखिर‚ एक बिंदु पर आकर उनके शॉक एब्जॉर्बर्स बिल्कुल फेल हो जाते हैं‚ और अपने सामने ‘डेड एंड’ पाने के बाद ही वे ‘बचाव के लिए चीख’ (क्राइ फॉर हेल्प’) का इस्तेमाल करती हैं। अचानक एक दिन आत्महत्या के खयाल का दौरा पडने पर कोई इतना बडा कदम नहीं उठा लेता।

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आत्महत्या की खबरों में अक्सर हम लडकी की ताजा तस्वीर के साथ उसकी शादी में सुनहरे–रुपहले गोटे किनारी वाली लाल साडी और सिर से पैर तक चमकते गहनों से लदी–फंदी एक तस्वीर देखते हैं‚ जो उसकी अब तक की जिंदगी की सबसे खूबसूरत तस्वीर होती है। सप्तपदी की रस्में‚ पंडित द्वारा उच्चारित मंत्र‚ तरह–तरह के लुभावने नृत्य और विदाई की रस्म‚ जिसमें लडकी के दिल दिमाग में अघोषित रूप से बिठा दिया जाता है कि स्थायी रूप से उसे इस घर से विदा होना है। रस्मों को निभाती हुई लडकी अबूझा मानसिक दबाव भी अपने पल्ले में बांधकर ले जाती है कि उसे इस नये जीवन को अंजाम देना है। हाल में एक प्रतिभावान और दबंग लडकी श्वेता यादव ने तीन साल की बेटी को छोडकर यह कदम उठाया। ग्यारह साल पहले मुंबई महानगर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन ८ मार्च‚ २०११ से २८ सितम्बर‚ २०११ तक– छह महीनों के अंदर बीस से तीस की उम्र की चार लडकियों–निधि गुप्ता जालान‚ दीप्ति चौहान परमार‚ शिवानी साहू और निधि सिंह–की आत्महत्याओं ने बहुत से सवाल खडे कर दिए थे। निधि और दीप्ति ने अपने बच्चों को पहले छत से नीचे फेंका और फिर खुद कूद गइ। शिवानी साहू ने डेढ साल की बच्ची को छोडकर आत्महत्या कर ली। निधि सिंह ने शादी के सात महीने बाद पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली।

ये सभी लडकियां सीए‚ एमबीए‚ आईआईटी की स्नातक थीं और इन्होंने अपनी मर्जी से अपने साथी का चुनाव किया था। प्रेम विवाह हो या अरेंज्ड विवाह‚ आज भी मध्य वर्ग की सामान्य लडकी अपना शत–प्रतिशत दे देती है। शादी के बाद घर–परिवार‚ पति–बच्चे उसकी प्राथमिकता होते हैं–आम तौर पर उसका अपना कॅरियर‚ अपनी महत्वाकांक्षाएं दूसरे नम्बर पर आती हैं पर उसकी इस प्राथमिकता और भावनात्मक लगाव पर लगातार चोट की जाती है। वह ससुराल के सदस्यों के प्रेम की हकदार नहीं बनती और अपने मां–बाप के साथ अपनी इस त्रासदी को बांटकर उन्हें दुखी नहीं करना चाहती। ऐसी ही लडकियों को एक चरम स्थिति में अपना और अपने बच्चों के जीवन का अंत करना एकमात्र हल दिखाई देता है। आज के समय की विडंबना यह है कि अपने आत्मसम्मान को पीछे धकेल कर लडकी से धैर्य और सहन करने की अपेक्षा की जाती है जो सदियों तक स्त्री का विकल्पहीनता की स्थिति में एकमात्र चुनाव रहा है। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ्त्रिरयां भी भावनात्मक रूप से अपने पति का ही मुंह जोहती रहीं। भावनात्मक आघात ही अपने जीवन का अंत करने पर उन्हें विवश करते हैं।

क्या यह सच नहीं कि हमने लडकियों को पैसा कमाकर अपने पांव पर खडा होना तो सिखाया पर दकियानूसी सोच से मुठभेड करने के कारगर तरीके नहीं समझा पाए। जरूरी है कि इन कारगर तरीकों को कॉलेज और उच्च शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा बनाया जाए। तभी समाज में माता–पिता और पति और उसके घर के लोगों की सोच में बदलाव आएगा और इन शिक्षित लडकियों के जीने की लडाई कुछ आसान हो जाएगी। ॥ विवाह संस्था ऑब्सोलीट हो रही है‚ विवाह संस्था को खत्म करना चाहिए की जगह क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि विवाह संस्था में सुधार की जरूरत हैॽ सुधार कहां और कैसेॽ जाहिर है‚ जब परिस्थितियां बदल गई हैं‚ तो व्यक्ति को उन परिस्थितियों के अनुरूप बदलना ही होगा। जब ्त्रिरयां भी बाहर जा कर पति के बराबर या उससे ज्यादा भी कमा रही हैं तो फिर बच्चों की और रसोई की पूरी जिम्मेदारी आज भी सिर्फ स्त्री के खाते में क्यों होॽ जेंडर डिवीजन ऑफ लेबर के खांचे टूटे हैं तो उन्हें बाहर की स्पेस में ही नहीं‚ घर की चहारदीवारी में भी टूटना होगा। क्यों बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स टीचर मीट में हमेशा मां ही जाए‚ पिता क्यों नहीं। बच्चे पिता की भी उतनी ही बडी जिम्मेदारी हैं‚ जितनी मां की। मां का बच्चे को अपनी कोख में नौ महीने रखना और प्रसव पीडा से गुजरने का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चे के स्कूल का होमवर्क देखने से लेकर उसके कॅरियर‚ उसकी परवरिश का पूरा जिम्मा सिर्फ मां का ही है‚ पिता का नहीं। अगर बच्चा बडा होकर अच्छी नौकरी में जाता है तो श्रेय पिता को मिलता है कि आखिर‚ बेटा किसका है और अगर बुरी संगत में पडता है तो मां की परवरिश में दोष ढूंढा जाता है।

आज एक मध्यवर्गीय शिक्षित आत्मनिर्भर लडकी‚ प्रेम विवाह के बाद‚ माता–पिता का सपोर्ट सिस्टम न होने के कारण भावनात्मक उपेक्षा से बिखर जाती है क्योंकि एक ओर वह संस्कारों से बंधी है‚ दूसरी ओर घर–बाहर की दोहरी जिम्मेदारी के बावजूद अपने सदियों पुराने दोयम दर्जे में वह कोई तब्दीली नहीं पाती।
आखिर रास्ता कहां हैः अगर मध्यवर्गीय तबका बेटियों को जीवन के कई मोडों पर चुप्पी के संस्कारों को तोडकर जबान खोलने और अपनी तकलीफ को साझा करने का रास्ता सुझाए तो ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है। शादी दो अलग–अलग माहौल से आए व्यक्तियों का जुडाव है‚ जिसे बहुत समझदारी के साथ दोनों को ही तालमेल बनाकर निभाना जरूरी है पर अपनी जिंदगी की कीमत पर नहीं। हो सकता है कि नया माहौल बहुत सहयोगी न हो। इसलिए यह संदेश रेखांकित होना चाहिए कि अगर शादी के बाद तुम्हें विपरीत स्थितियों का सामना करना पडे या अपमानित होना पडे तो तुम अकेली नहीं हो।

दूसरी जिम्मेदारी शैक्षणिक संस्थाओं और मीडिया की है। सभी स्कूल और कॉलेजों में स्थायी प्रशिक्षित सलाहकार नियुक्त किया जाना चाहिए जो भारतीय समाज की पुरुषवादी मानसिकता और जीवन की व्यावहारिक जटिलताओं से भी छात्र का परिचय करवाए और अपने जीवन साथी को उसका अपेक्षित सम्मान देना सिखाए। मीडिया और टीवी धारावाहिकों में ‘चुप रहकर सहने वाली स्त्री’ और उसके खिलाफ षडयंत्र रचने वाली एक खलनायिका स्त्री के महिमामंडन पर रोक लगे और सकारात्मक पक्षों को उकेरा जाए। हम अपनी चुप्पी के संस्कारों को तोडें तो जरूर कुछ नया गढ पाएंगे–अपने लिए और अपने समाज के लिए। लेकिन सबसे जरूरी है बेटियों के लिए मां के घर के दरवाजे का खुला होना।

अधिकांश लडकियों को एक अलिखित आचार संहिता रोकती है‚ वे सोचती हैं कि मां–बाप की जिम्मेदारी उन्हें पढा–लिखा कर पैरों पर खडे होने की कूवत देने और अपनी मर्जी के लडके से ब्याह करने की इजाजत देने के बाद समाप्त हो जाती है और शादी के बाद की समस्याओं से अब उन्हें अकेले निबटना है। आखिर‚ एक बिंदु पर आकर उनके शॉक एब्जॉर्बर्स बिल्कुल फेल हो जाते हैं‚ और सामने ‘डेड एंड’ पाने के बाद ही वे ‘बचाव के लिए चीख’ का इस्तेमाल करती हैं। अचानक एक दिन आत्महत्या के खयाल का दौरा पडने पर इतना बडा कदम उठा लेती हैं

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