भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का संवेदनशील‚ भावुक कर देने वाला सर्वोच्च परिसर में दिया जाने वाला भाषण मुझे बहुत कुछ याद दिला गया। जब राष्ट्रपति को गर्वनर बनाया गया तो उन्हें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के साथ वार्ता करने का मौका जब मिला–तो उन्होंने जेल में बंद पडे कैदियों की हालत पर बातचीत की। छोटी–छोटी धाराओं में लोग जेलों में बंद हैं‚ पर उनकी जमानत नहीं होती। होती भी है तो रिहाई नहीं हो पाती। कभी–कभी तो मुकदमे से बरी हो जाने पर भी जेल अधिकारी उन्हें जेल से निकालना भूल जाते हैं।
न तो घर पर कोई है–वकील को रखने वाला और न ही किसी के पास पैसा है‚ वकील को देने के लिए। इन्हीं वजह से‚ थोडी–थोडी गलती पर लोग जेलों में जिंदगी बिता देते हैं। पीछे पूरा परिवार तबाही और शोषण का शिकार। इसी प्रकार‚ वकालत की शुरुआत ही में मैं जब अपने सीनियर नागेवर प्रसाद जी के साथ पटना लोअर कोर्ट जाती तो देखती कोर्ट रूम के बगल वाले रूम में कैदी बैरक में बैठे होते। मूत्रालय न होने की वजह से जो उसी बैरक में मूत्र त्याग करते। बदबू से परिसर गंच्चित रहता। कोर्ट चलते रहते–पीठाधीश‚ वकील‚ मुवक्किल सब क्या करतेॽ
सन् १९४५ की एक बात है। दरभंगा के गांव का १६ वर्षीय एक लडका बोका ठाकुर हत्या के एक मामले में पकडा गया। उसके पास एक गाय थी जिसकी हत्या गला रेत कर रात में कर दी गई थी पडोसी द्वारा। सुबह बोका जब सोकर उठ कर उसे देखने गया तो गाय का सर धड से अलग था। हंसिया भी पास ही पडा था। पता लगा कि यह काम उसके पडोसी का था।
गाय को मातृवत प्यार करने वाला बोका शांत न रह सका और उसने पडोसी का गला उसी हंसिए से काट डाला। बोका को पकड लिया गया। उसकी पैरवी करने वाला कोई नहीं था। लिहाजा‚ वह इस जेल से उस जेल जाता रहा पर उसकी ट्रायल बिना पैरवी के नहीं चलनी थी‚ सो नहीं चली। इतने में पता चला जाति से बढई बोका अपने काम में बडा माहिर था। उसे पागल घोषित कर कांके मेंटल हॉस्पिटल ले जाया गया जहां वह ०७.०९.१९४५ से रहने लगा। वहां वह ताबूत बनाने लगा। उसके बनाए ताबूत अत्यंत महंगे दामों में बिकने लगे। इस तरह वह ३७ वर्षों तक कांके मानसिक अस्पताल में रहा। उसे सोने की जगह नहीं दी जाती थी। वह खडे–खडे सोता था और न ही पहनने को चप्पल। वह इशारों से अपनी बात कहता। मुझे उसने कहा–उसकी पत्नी भी थी। मैंने उसकी खबर अखबार में पढी। विश्व के उस सबसे पुराने अंडरट्रायल प्रिजनर को मैंने पटना हाई कोर्ट से छुडाया–ढाई वर्ष उम्रकैद काटने के बाद–अच्छे चाल–चलन पर १४ वर्षों में उम्रकैद खत्म हो जाती है। उसी समय अखबारों में रुदल साह‚ उम्र ७० वर्ष‚ मुजफ्फरपुर के रहने वाले की खबर छपी कि वह १९४७ से जेल में था। उसकी जेल से रिहाई १६ वर्षों बाद भी नहीं हुई थी। उस पर पत्नी की हत्या का मुकदमा था पर २१ वर्ष ट्रायल चलने के बाद उसकी रिहाई हो गई। उसके भी १६ वर्ष बाद १९८२ में उसकी रिहाई मैंने पटना हाई कोर्ट से करवाई। दोनों मुकदमे विश्व के २६ देशों के अखबारों में पहले पेज पर बॉक्स में छपे। तो क्या हुआॽ ‘न्यायपालिका कसौटी पर’ मेरी पुस्तक छपी–पार्लियामेंट एनेक्सी में लाल कृष्ण आडवाणी और नीतीश कुमार द्वारा रिलीज की गई २००१ में। तो क्या हुआॽ आज भी जेलों के हालात जस के तस हैं।
जेलों में दिन भर का भोजन‚ नाश्ता २०१ रुपये के भीतर बनता है। एक बैरक में रहना पडता है। शौचालय अंदर से भीतर तक मल से भरे रहते हैं। जेलों की बाउंड्री वाल के ईद–गिर्द हल्का होना पडता है। क्यू में लगे रहना पडता है। सबको सोने की जगह नहीं मिलती‚ बिस्तर भी नहीं मिलता। तीन कंबलों में २–३ कैदियों को जाडे की रात बितानी होती है। गंदा‚ अपच्चित खाना‚ मार खाना आम बात है और बिताने पडते हैं वर्षों‚ दशकों का जीवन इस आशा में कि कब बाहर का सूरज देखेंगे‚ खुली हवा में रहेंगे‚ परिवार शायद देखने को ही न मिले। महिला कैदियों को आवश्यक दिनों में कपडे नहीं मिलते‚ नहाने को नहीं मिलता‚ दवा नहीं मिलती। यह सब गरीबों‚ आदिवासियों‚ पिछडी जातियों का नसीब है। आज आदिवासी‚ अति संवेदनशील‚ भावुक महिला राष्ट्रपति भी न्याय के दरवाजे पर‚ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को यही कुछ कह रही हैं–और गेंद जजेज के पाले में डाल कह रही है–अब सब आपके हाथों में है। पुलिस‚ जेल व्यवस्था‚ कानून‚ अदालत‚ वकील‚ न्यायधीश चाहें तो कुछ भी सकते हैं–इस पार या उस पार।







