बीते दो दिनों में देश का उत्तर–पूर्व इलाका दो वजहों से राष्ट्रीय चर्चा में है। एक ओर जहां ‘पूर्वोत्तर भारत के शिवाजी’ कहे जाने वाले अहोम सेनापति लचित बरफुकन का ४००वीं जयंती मनाई जा रही है‚ वहीं असम–मेघालय के बीच कथित सीमा विवाद में ६ लोगों की मौत के बाद भड़़की हिंसा चिंतित करती है। ॥ इन दो घटनाक्रमों से इतर एक अहम बात यह है कि अमूमन उत्तर–पूर्व की चर्चा तभी होती है‚ जब कोई घटना घटित हो जाए। यही स्थिति कमोबेश दक्षिण को लेकर भी है। दरअसल‚ हिंदी भाषी या उत्तर भारत को ही संपूर्ण देश मान लिया जाना इसकी वजह है। कुछ हद तक दिल्ली का राजधानी होना भी। आजादी के अमृत महोत्सव का सबसे सकारत्मक पक्ष यह रहा कि देश भूले–बिसरे नायकों को खोज पाया। खासकर जिनका संबंध पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत से था। ठीक है कि भाषा और संस्कृति में भिन्नता है‚ लेकिन ईमानदारी से बहुत कम प्रयास हुए। इसमें हाल में ही यहां वाराणसी में संपन्न काशी तमिल संगम’ संस्कृतिक आदान–प्रदान का बेहतरीन उदाहरण है। जहां बड़़ी संख्या में तमिलनाडु़ के विभिन्न हिस्सों से आए लोग तीन दिनों तक चले समागम में मौजूद रहे। इस प्रकार के कार्यक्रमों से आपसी समझ बेहतर होती हैं। काशी को जहां भारत की आध्यत्मिक–सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है‚ वहीं तमिल भाषा को सबसे पुरानी भाषाओं में गिना जाता है। आजादी के समय तो तत्कालीन काशी नरेश ने काशी को वेटिकन की तर्ज पर विशेष दर्जा देने की मांग की थी। खैर‚ भारतीय संस्कृति जितनी विविध है ऐसे में उसकी सांस्कृतिक एकता को एक–दूसरे की समझ के माध्यस से ही मजबूत किया जा सकता है। कश्मीर हो‚ पंजाब हो या उत्तर–पूर्व। अलगाववाद की भावना को विदेशी ताकतें खाद–पानी देती हैं। इसके अलावा तमिलनाडु़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ‘धरतीपुत्र’ का मुद्दा उछाला जाता है। भले इन सब के पीछे संकीर्ण तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ होता है‚ मगर आगे चलकर यही राष्ट्रीय एकता के लिए संकट पैदा करते हैं। उत्तर–पूर्व का मामला ज्यादा संवेदनशील है। कुल मिलाकर देश में ७ अंतरराज्यीय सीमा विवाद–असम–मेघालय‚ असम–मिजोरम‚ हरियाणा–हिमाचल‚ लद्दाख–हिमाचल‚ महाराष्ट्र–कर्नाटक‚ असम–अरुûणाचल और असम–नगालैंड के बीच हैं। यहां सीमांकन और राज्यों के अपने दावे–प्रतिदावे हैं‚ जिन्हें शीघ्र ही सुलझाया जाना चाहिए। सांस्कृतिक मेलजोल ही राष्ट्रीयता की भावना को अमरता प्रदान करती है।
मुंबई के 30 लाख वोटर्स का नाम कटेगा!
महाराष्ट्र में मतदाता सूची के SIR यानी विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान के तहत एक अहम आंकड़ा सामने आया है. सूबे...







