प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से साफ-साफ कहा कि ‘अब युद्ध का जमाना नहीं है’। उन्होंने यह बात शुक्रवार को उज्बेकिस्तान के समरकंद में SCO शिखर सम्मेलन से इतर एक द्विपक्षीय बैठक के दौरान कही। मोदी ने रूस-यूक्रेन संघर्ष का जिक्र करते हुए पुतिन से कहा कि अब ‘डेमोक्रेसी, डायलॉग और डिप्लोमेसी’ का वक्त है।
मोदी ने पुतिन से यूक्रेन युद्ध के कारण खाद्यान्न, ईंधन और उर्वरक की कमी के रूप में अन्य देशों के सामने आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए पहल करने का भी आग्रह किया। पुतिन ने मोदी से पहले अपनी बात रखी थी। उन्होंने रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत की स्थिति को स्वीकार हुए कहा था कि उनका देश संघर्ष को जल्द से जल्द रोकने की पूरी कोशिश करेगा।
पुतिन से मोदी की अपील वॉशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स के वेब पेज की मुख्य खबर थी। इसे अमेरिकी मुख्यधारा की मीडिया ने व्यापक कवरेज दी थी। वॉशिंगटन पोस्ट के खबर की हेडलाइन थी, ‘मोदी ने यूक्रेन में युद्ध के लिए पुतिन को फटकार लगाई।’
वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘मोदी ने पुतिन को आश्चर्यजनक रूप से सार्वजनिक फटकार लगाते हुए कहा: ‘आधुनिक दौर युद्ध का युग नहीं है और मैंने आपसे इस बारे में फोन पर बात की है।’ रिपोर्ट में कहा गया, ‘पुतिन ने मोदी से कहा, ‘मैं यूक्रेन में संघर्ष पर आपका रुख जानता हूं, मैं आपकी चिंताओं से अवगत हूं, जिनके बारे में आप बार-बार बताते रहते हैं। हम इसे जल्द से जल्द रोकने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, विरोधी पक्ष यूक्रेन के नेतृत्व ने वार्ता प्रक्रिया छोड़ने का ऐलान किया और कहा कि वह सैन्य माध्यमों से यानी ‘युद्धक्षेत्र में’ अपना लक्ष्य हासिल करना चाहता है। फिर भी, वहां जो भी हो रहा है, हम आपको उस बारे में सूचित करते रहेंगे।’
‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की हेडलाइन थी, ‘भारत के नेता ने पुतिन को बताया कि यह युद्ध का दौर नहीं है।’ उसने लिखा, ‘मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यूक्रेन के हमले के बाद पुतिन के साथ पहली आमने-सामने की बैठक के एक दिन बाद ये टिप्पणियां कीं। जिनपिंग ने रूसी राष्ट्रपति की तुलना में अधिक शांत लहजा अपनाया और अपने सार्वजनिक बयानों में यूक्रेन के जिक्र से बचने की कोशिश की।’
पुतिन के साथ अपनी मुलाकात के दौरान मोदी यूक्रेन के मुद्दे को काफी चतुराई से उठाया। मोदी ने पहले तो जंग में फंसे भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकालने के लिए यूक्रेन और रूस का शुक्रिया अदा किया और कहा कि वह इसके लिए दोनों देशों के आभारी हैं, लेकिन साथ ही पुतिन से ये भी कहा कि युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं है। मोदी ने कहा, युद्ध समाधान नहीं खुद समस्या है।
रूस ने यूक्रेन पर इसी साल 24 फरवरी को हमला किया था। उस वक्त पुतिन ने कहा था कि 7 दिन में फैसला हो जाएगा, और यूक्रेन को रूस फतह कर लेगा। 7 महीने बीत चुके हैं, और यूक्रेन के कई इलाकों में अब रूस की सेना को पीछे हटना पड़ रहा है। रूस का दांव उल्टा पड़ गया है। युद्ध की बजह से यूक्रेन तो पूरी तरह बर्बाद हो गया है, लेकिन रूस के हालात भी अच्छे नहीं हैं। रूस में बेरोजगारी और मंहगाई बढ़ रही है, और इसका असर पूरी दुनिया पर हो रहा है।
क्रूड ऑयल और प्राकृतिक गैस की कीमतें बढ़ गई हैं। यूक्रेन और रूस मिलकर दुनिया भर में फर्टिलाइजर्स (उर्वरक) की सप्लाई करते हैं। भारत भी यूक्रेन से फर्टिलाइजर मंगवाता है, लेकिन युद्ध के कारण यूरिया की सप्लाई बंद है। खाद की किल्लत हो रही है और गेहूं की पैदावार पर भी इसका असर पड़ा है। कुल मिलाकर यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग न यूक्रेन के लिए अच्छी है, न रूस के लिए और न पूरी दुनिया के लिए। दिक्कत की बात यह है कि रूस इतना आगे बढ़ चुका है कि पुतिन के लिए अपनी फौज को वापस लौटने का आदेश देना मुश्किल है। यूक्रेन भी अब बातचीत के मूड में नहीं हैं। इसीलिए मोदी ने पुतिन को इशारा दिया कि जिद से कुछ नहीं होगा। उन्होंने पुतिन से कहा कि डिप्लोमेसी और डायलॉग से ही रास्ता निकल सकता है।
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में मोदी ने बताया कि कैसे भारत ने वैक्सीन और दवाएं भेजकर दुनिया के बाकी देशों की मदद की। उन्होंने कहा कि भारत अब स्टार्टअप का हब बन रहा है, लेकिन कुछ देश तरक्की में रुकावट पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी का इशारा पाकिस्तान की तरफ था, जिसने भारत को मध्य एशिया को ‘ट्रांजिट राइट्स’ यानी अपने यहां से सामान गुजरने देने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। भारत का प्लान ताजिकिस्तान से अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए गैस पाइपलाइन बिछाने का है, लेकिन पाकिस्तान के रवैये के कारण यह प्रोजेक्ट बरसों से लटका है। शिखर सम्मेलन में मोदी ने मांग की कि सभी देशों को बेहतर कनेक्टिविटी के लिए ‘ट्रांजिट राइट्स’ मिलने चाहिए।
भारत ने भूख से तड़प रहे अफगानिस्तान के लोगों की मदद की कोशिश की थी, लेकिन पाकिस्तान ने गंहूं से भरे ट्रकों को रास्ता देने में बहुत आनाकानी की। मोदी की स्पीच को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सुना, और एक अलग ही रास्ता पकड़ लिया। उन्होंने अफगानिस्तान को SCO में शामिल करने का आह्वान किया। शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो मौजूद थे। भुट्टो ने माना कि शहबाज शरीफ और नरेंद्र मोदी के बीच ‘हार्ड टॉक’ हुई थी। जब भुट्टो से पूछा गया कि क्या पाकिस्तान अगले साल भारत में होने वाले SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेगा, तो उन्होंने जवाब दिया कि पाकिस्तान ने अभी इस बारे में फैसला नहीं किया है।
पुतिन ने मोदी को यह कहकर आश्चर्यचकित कर दिया कि मुझे पता है कि शनिवार को आप अपना जन्मदिन मनाने वाले हैं। पुतिन ने कहा कि रूसी परंपरा के मुताबिक हम कभी एडवांस में बधाई नहीं देते, क्योंकि यह शुभ नहीं माना जाता। पुतिन ने कहा, ‘लेकिन मैं आपको ये जरूर बताना चाहूंगा कि हमें आपके जन्मदिन की जानकारी है। रूसी परंपरा के मुताबिक, मैं आपको एडवांस में बधाई नहीं दे सकता। मैं आपको शुभकामनाएं देता हूं। मैं रूस के दोस्त भारत को भी शुभकामनाएं देता हूं।’
क्यों नहीं मिले पीएम मोदी और शी जिनपिंग समरकंद में ?
बीजिंग में अक्टूबर में होने जा रहे बेहद महत्वपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन से पहले घरेलू मोर्चे पर राजनीतिक दबाव एक बड़ी वजह मानी जा रही है, जिसकी वजह से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बातचीत समरकंद में नहीं हो सकी. वह भी तब जब अप्रैल 2020 में दोनों देशों के सैनिकों के पूर्वी लद्दाख में हिंसक संघर्ष के बाद उपजे सीमा विवाद और तनावपूर्ण हुए संबंधों के बाद उजबेकिस्तान के समरकंद में 22वीं शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में दोनों नेता पहली बार एक मंच पर साथ आए थे. हालांकि चीन के विश्लेषकों की मानें तो दोनों नेताओं के बीच बहुचर्चित द्विपक्षीय बातचीत के नहीं हो सकने के पीछे भारत का कड़ा रवैया जिम्मेदार रहा.
एक-दूसरे का अभिवादन तक नहीं किया मोदी-जिनपिंग ने
चीनी विश्लेषकों का मानना है कि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सीमा तनाव की वजह बने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जमावड़े को भारत हिंसक संघर्ष से पहले की यथास्थिति वापसी पर अड़ा हुआ था. इसके अलावा चीन को लेकर अमेरिकी नीतियो की तरफ नई दिल्ली का झुकाव भी एक वजह था. इस वजह से दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय बातचीत से किनारा करना बेहतर समझा. गौरतलब है कि उजबेकिस्तान के समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक से पहले यह माना जा रहा था कि मोदी-शिनपिंग के बीच भले ही औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत नहीं हो, लेकिन कुछ मिनटों की अनौपचारिक बातचीत तो हो ही जाएगी. हालांकि यह कयास भी धरे के धरे रह गए. एससीओ की बैठक के बाद फोटो खिंचवाने के लिए एक मंच पर आए दोनों नेताओं ने एक-दूसरे का अभिवादन तक नहीं किया और फोटो ऑप्स के बाद एक-दूसरे की तरफ बगैर देखे निकल गए.
रिश्तों पर जमी बर्फ की परत और मोटी हुई
दोनों नेताओं के बीच परस्पर द्विपक्षीय बातचीत नहीं होने के दो निहितार्थ सामने आ रहे हैं. पहला, दुनिया की दो बड़ी आबादी वाले राष्ट्र, जिनकी सेना भी बहुत बड़ी और क्षमतावान है, ने पूर्वी लद्दाख में जारी सैन्य तनाव का समाधान निकालने का एक बेहतरीन अवसर गंवा दिया. दोनों नेताओं के बीच इसके पहले 2019 में ब्राजील में परस्पर द्विपक्षीय बातचीत हुई थी. यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 2017 में हैम्बर्ग में जी-10 शिखर वार्ता के दौरान अनौपचारिक बातचीत से ही दोनों देश डोकलाम विवाद का हल निकालने में सफल रहे थे. दूसरे निहितार्थ के अनुसार समरकंद में मोदी-जिनपिंग का नहीं मिलना यह बताता है कि गलवान घाटी के हिंसक संघर्ष के बाद दोनों देशों के परस्पर संबंधों पर जमी बर्फ की परत अब और मोटी हो चुकी है. गलवान घाटी के हिंसक संघर्ष दोनों देशों के बीच पनपा तनाव हाल के दौर सबसे संवेदनशील विवाद माना जा रहा है. यह समझना मुश्किल है कि एससीओ शिखर सम्मेलन के इतर दोनों नेताओं के बीच कोई औपचारिक-अनौपचारिक बैठक क्यों नहीं हुई. हालांकि यह भी संभव है कि घरेलू मोर्चे पर विद्यमान स्थितियों के दबाव में दोनों नेताओं ने बैठक से किनारा करना बेहतर समझा हो.
शी जिनपिंग छवि को नहीं पड़ने देना चाहते कमजोर
माना जा रहा है कि संविधान में संशोधन कराने के बाद शी जिनपिंग अगले महीने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की 20वीं कांग्रेस में चीन के राष्ट्रपति बतौर तीसरे कार्यकाल की रजामंदी पर मुहर लगवाने में सफल रहेंगे. इसके बाद वह आधुनिक चीन के सबसे शक्तिशाली नेता बतौर अपना स्थान इतिहास में पक्का कर लेंगे. जिनपिंग की ताकत की बराबरी माओ जेडांग या माओत्से तुंग से ही की जा सकती है. शी जिनपिंग के विचार और चीन को लेकर उनकी दृष्टि को सीपीसी के संविधान में भी दर्ज किया जा सकता है. इसके साथ ही उनके नाम के साथ चेयरमैन या सर्वोपरि नेता की उपाधि भी जुड़ सकती है. ऐसे में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने से महज एक महीने दूर शी जिनपिंग ने पीएम मोदी से बातचीत नहीं कर अपनी छवि पर क्षेत्रीय संप्रभुत्ता से समझौता करने का दाग लगने से परहेज किया. खासकर यह देखते हुए भी कि बीजिंग यही बात बार-बार कहता आ रहा है कि भारत ने ही पहले-पहल वास्तविक नियंत्रण रेखा का अतिक्रमण किया, जिसकी परिणति गलवान घाटी के हिंसक संघर्ष के रूप में सामने आई. भारत भी यही आरोप चीन पर लगातार लगाता आ रहा है और संघर्ष से पहले की यथास्थिति बरकरार रखने के मसले पर अड़ा हुआ है.
संप्रभुत्ता से जुड़े मसलों पर बीजिंग का कठोर रवैया
यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि पिछले हफ्ते सीमा विवाद की वजह बने कुछ बिंदुओं से पीएलए सैनिकों के पीछे हटने की स्वीकारोक्ति बीजिंग ने अनिच्छा के साथ की थी. भारत ने पहले सैनिकों के पीछे हटने की बात स्वीकार ली थी. इसके बीद चीन-भारत ने सैनिकों के कुछ प्वाइंट्स से पीछे हटने के बारे में एक संयुक्त बयान जारी किया गया. इस बयान में अगस्त 2021 की बातचीत के बाद सैनिकों के पीछे हटने का जिक्र चीन ने नहीं किया. जाहिर है चीन के कट्टर राष्ट्रवाद के प्रदर्शन के लिहाज से यही स्थिति मुफीद बैठती है. जाहिर तौर पर शायद ही किसी को शक हो कि अगले महीने कांग्रेस बैठक के बाद शी जिनपिंग बेहद ताकतवर नेता बनकर नहीं उभरेंगे. इसके बावजूद शी अपनी अवाम को दिखाना चाहते हैं कि आने वाले सालों में और आक्रामकता के साथ नेतृत्व देने की क्षमता उनमें है. सीपीसी की भी यही लाइन रहती है कि संप्रभुत्ता से जुड़े मसलों पर रत्ती भर भी पीछे नहीं हटा जाएगा. ताइवान के खिलाफ चीनी सेना का आक्रामक युद्धाभ्यास इसका ताजा उदाहरण है. ऐसे में भारत केंद्रित सीपीसी के रणनीतिकार मानते हैं कि समरकंद में मोदी-जिनपिंग की औपचारिक या अनौपचारिक बातचीत को नई दिल्ली की जीत के तौर पर देखा जाता. ऐसे में इससे किनारा करना ही श्रेयस्कर रहा.
कूटनीतिक मोर्चे पर भी बीजिंग-नई दिल्ली में है भारी मतभेद
यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए बीजिंग प्रशासन भारत से लगातार ताइवान से तनाव के बीच आधिकारिक बयानों में चीन की एक राष्ट्र नीति का जिक्र करने को कहता आया है. चीन ताइवान पर अपना हक जताता है और इस कारण बयानों में एक राष्ट्र की बात करता है. यह अलग बात है कि नई दिल्ली ने बीजिंग को इस मसले पर कोई भाव नहीं दिया. चीनी विश्लेषकों को भी लगता है कि दोनों देशों के रिश्ते बेहद ठंडे हो चुके हैं. हालांकि उनमें भी दोनों नेताओं के बीच मुलाकात नहीं होने को लेकर अलग-अलग राय है. शंघाई की फुदान यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के लिन मिनवांग कहते हैं, ‘दोनों नेताओं के बीच बैठक को लेकर स्थितियां अभी पूरी तरह से बनी नहीं हैं. आलम यह है कि भारत की कई नीतियां अमेरिका की चीन विरोधी नीतियों से मेल खाती हैं. ऐसे में अगर दोनों नेताओं के बीच परस्पर मुलाकात होती, तो उसके भी अच्छे परिणाम नहीं मिलने वाले थे. इसे समझ शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी ने एससीओ की शिखर वार्ता में परस्पर बैठक से परहेज किया.’ लिन आगे कहते हैं, ‘सच तो यह है कि भारत-चीन के रिश्ते सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं. ऐसे में यदि भारत-चीन सीमा पर अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति आ भी जाए तो भी भारत की विदेश कूटनीति अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति में आने वाली नहीं. चीन को घेरने की अमेरिकी नीतियों पर हामी भर और सहयोग के जरिए भारत काफी आगे बढ़ चुका है.’







