फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ का बायकाट हुआ। फिर भी निर्माता कहते हैं कि वह अच्छी कमाई कर रही है। सच जो हो‚ हमारी इस टिप्पणी का उद्देश्य यह बताना है कि ‘ब्रह्मास्त्र’ के साथ ही हम ‘फिल्म निर्माण’ और ‘प्रदर्शन’ के एक नये युग में प्रवेश कर रहे हैं। यह हैः ‘मेटावर्स तकनीक’ से बनाई जाती फिल्मों का युग! ब्रह्मास्त्र आधी ‘मेटावर्स तकनीक’ और आधी पुरानी तकनीक से बनाई गई फिल्म है। उसे कुछ तो रियल लेाकेशनों पर शूट किया गया है‚ और कुछ खास ‘कंप्यूटराइज्ड स्पेशल इफेक्टों’ से बनी फिल्म हैं। ॥ अगर हम साहित्यिक नजर से बात करें तो हम इन्हें ऐसी ‘जादुई फिल्म’ कह सकते हैं‚ जिनका जादू अब तक के फिल्मी जादुईपन से अलग है। हम ‘रामायण’ या ‘महाभारत’ को याद करें। उनके ‘मायावी दृश्य’ कुछ ‘स्पेशल इफेक्ट एक्सपर्टों’ के जरिए बनाए गए थे जिनकी कृत्रिमता साफ दिखती थी। लेकिन ‘मेटावर्स तकनीक’ ने ऐसे चामत्कारिक सीनों को बनाना आसान कर दिया है। अब एक फिल्म को सिर्फ कंप्यूटर में बना सकते हैं। यह मेटावर्स तकनीक का जादू है कि आप चाहें तो काल के पार जा सकते हैं। इस लोक से उस लोक के आर पार जा सकते हैं। सूरज में जाकर साबुत लौट सकते हैं। आपकी आंख आग बरसा सकती हैं। फिर भी आप जस के तस बने रह सकते हैं.। अगर आपने अपने फिल्म चैनलों पर मारवेल सीरीज की ‘ओटीटी’ वाली ‘कैप्टन अमेरिका’ सीरीज देखी है या आपने ‘डॉक्टर स्टेंज’ देखी है‚ या आपने ‘ट्रांसफॉरमर’ या ‘वंडर वुमैन’ फिल्में देखी हैं तो आपको हमारी बात समझ में आ जाएगी कि ‘ब्रह्मास्त्र’ भी किस तरह से बहुत कुछ ‘मेटावर्स संचालित ‘ यानी कंप्यूटर से सृजित स्पेशल इफेक्टों से बनाई गई है। फिल्म की कहानी कहती है कि नायक के पास ईश्वर का दिया ब्रह्मास्त्र है‚ जिसके कारण न आग उसे जला सकती है‚ न प्रलय उसे गला सकती है। सारी कहानी ब्रह्मास्त्र को खलनायक से बचाने और उसका सही उपयोग करने की उठापटक को कहती है‚ जिसके अंत में नायक ही जीतता है। ऐसी ही कहानियां हॉलीवुड पहले ‘बैटमैन’‚ ‘स्पाइडरमैन’‚ ‘सुपरमैन’ आदि के जरिए कहता रहा है। ऐसे नायकों के पास अलौकिक शक्ति होती है‚ और खलनायक उसे पाने के चक्कर में रहता है‚ लेकिन अंत में जीत अलौकिक शक्ति वाले नायक की ही होती है। लेकिन ये पुरानी फिल्में कुछ सच्ची ‘फिल्मी लोकेशनों’ और कुछ ‘स्टूडियो सेट्स’ पर फिल्माई जाती थीं। उनके नायक ‘आदमी’ की तरह ही दिखते थे। इनके हीरो हमारी दुनिया के लिए खतरा बने खलनायकों से हम सबको बचाया करते थे। उनके जरिए हमें अमेरिका अपना रक्षक लगता था। इसीलिए हमारे दिलोदिमाग में अमेरिका अभय देने वाला नजर आता है। यह हालीवुड की पावर थी। आजकल फिल्मी चैनलों में दिखतीं फिल्में यथा ‘डॉक्टर स्टेंज’ आदि हॉलीवुड के ही उत्पाद हैं लेकिन ये स्टूडियोज के उत्पाद से अधिक ‘मेटावर्स के जादू’ से बनाई गई हैं। इनके अलौकिक व चमत्कारी सीन ‘मेटावर्स इफेक्ट’ से बनाए गए हैं।
यह ‘मेटावर्स’ क्या हैॽ यह ‘मेटावर्स’ हमारी ‘साक्षात यूनीवर्स’ यानी इस ‘ब्रह्मांड़’ के समांतर ‘वर्चुअल यूनीवर्स’ यानी ‘आभासी दुनिया’ है‚ जो कंप्यूटर और इंटरनेट और नये–नये एप्स के जरिए सृजित की जाती है। ‘मेटावर्स एक्सपर्ट’ ऐसी फिल्मों के जादुई सीनों को बना सकते हैं। आपको किसी चमत्कारी अवतार की तरह बना और दिखा सकते हैं। आप एक फूंक से दुनिया में आग लगा सकते हैं। धरती को प्रलय में डुबा सकते हैं। ऐसे–ऐसे तीर–तमंचे चला सकते हैं कि आप एक ‘समांतर आभासी दुनिया’ बना सकते हैं। ब्रह्मास्त्र हिंदू माइथोलोजी में संदर्भित हथियारों यथा जलअस्त्र‚ नंदीअस्त्र‚ वायु अस्त्र आदि नाना अस्त्रों की लीला है। इनको हमने ‘रामायण’ व ‘महाभारत’ सीरियलों में देखा है‚ लेकिन उनमें चलते ‘तीर’ कृत्रिम लगते थे। कंप्यूटराइज्ड सीन कृत्रिम लगते हुए भी सहज लगते हैं।
और इसीलिए आज हम ऐसी फिल्मों के ‘मेटावर्सी युग’ में प्रवेश कर रहे हैं‚ जो साक्षात दुनिया की जगह‚ एक ‘आभासी दुनिया’ को ही साक्षात दुनिया की जगह दिखाती हैं। हॉलीवुड की फिल्मों में तो आजकल ‘मेटावर्सी’ फिल्मों का बोलबाला है। इसीलिए ऐसी फिल्में बहुत से लोगों को बहुत ‘रियल और रोचक’ नहीं लगतीं। ‘कंप्यूटराइज्ड गेम्स’ की तरह लगती हैं। और हम लोग तो ‘साक्षात यथार्थ नाटक’ देखने के ही आदी हैं। कंप्यूटराइज्ड गेम्स के नहीं। इसलिए ऐसी एकाध फिल्म भले चल जाए लेकिन जल्द ही हम ऐसी फिल्मों से बोर हो सकते हैं।







