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एंटीबायोटिक अब जान नहीं बचा पा रही,एक और दवा हो गई बेअसर!

UB India News by UB India News
September 12, 2022
in स्वास्थ
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एंटीबायोटिक अब जान नहीं बचा पा रही,एक और दवा हो गई बेअसर!
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भारत में बहुत सारे मरीजों पर अब ‘कारबापेनेम’ दवा का असर नहीं होगा। इसकी वजह है कि उन मरीजों के शरीर में इस दवा के प्रति सूक्ष्म जीवाणु रोधक (एंटीमाइक्रोबियल) क्षमता विकसित हो गई है। ‘कारबापेनेम’ एक शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवा है। इसे मुख्य रूप से आईसीयू में भर्ती निमोनिया और सेप्टिसीमिया के मरीजों को दिया जाता है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। एंटीबायोटिक के बेअसर को होने को लेकर ना तो यह इकलौती और पहली खबर है और ना ही आखिरी है। दुनियाभर में एंटीबायोटिक के बेअसर होने को लेकर इस तरह की रिपोर्ट लगातार आ रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन दवाओं के बेअसर होने से दुनियाभर में लाखों लोगों की मौत हो रही है।

दुनियाभर में 19 लाख लोगों की मौत
साल 2019 में एंटीबायोटिक दवाओं के असर को लेकर एक स्टडी हुई थी। स्टडी में सामने आया था कि उस साल दुनिया भर में 12 लाख लोगों की मौत ऐसे बैक्टिरिया से हुए संक्रमण के कारण हुई जिन पर दवाओं का असर नहीं हुआ। मेडिकल टर्म में दवाओं के असर नहीं करने की स्थिति को एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) कहा जाता है। ऐसा उस स्थिति में होता है जब बैक्टिरिया, वायरस, फंगस या पैरासाइट समय के साथ बदलते रहते हैं। ऐसी स्थिति में उन पर दवाओं का असर नहीं होता है। ऐसे में निर्धारित बीमारी के लिए दी जाने वाली दवाई रोगी पर असर नहीं करती है। इसका परिणाम होता है कि संक्रमण से उसकी मौत हो जाती है।

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एंटीबायोटिक का हो रहा धड़ल्ले से इस्तेमाल
दुनियाभर में पिछले कुछ साल में एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग बेतहाशा बढ़ा है। भारत में एंटीबायोटिक दवाओं का यूज पिछले 10 साल में प्रति व्यक्ति 30% बढ़ा है। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन सेंट लुइस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020 में भारत में 1629 करोड़ एंटीबायोटिक दवाएं बिकीं। पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस यानी PLOS के मुताबिक, कोविड की पहली लहर जून 2020 से सितंबर 2020 तक 21.64 करोड़ डोज अतिरिक्त बेची गई। अधिक प्रयोग के कारण ये एंटीबायोटिक अब बेअसर साबित हो रहे हैं। यशोदा हॉस्पिटल्स हैदराबाद के कंसल्टेंट फिजिशियन और डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. हरि किशन बूरुगु का कहना है कि समस्या कई स्तरों पर है। इनमें बिना डॉक्टर की सलाह के रोगियों द्वारा एंटीबायोटिक का उपयोग, नीम हकीमों और यहां तक की कुछ योग्य डॉक्टरों द्वारा भी एंटीबायोटिक दवाओं के गैर जरूरी उपयोग की अनुमति देना शामिल है।

पहले इलाज हो जाता था अब हो रही मौत
स्थिति यह है कि अब सामान्य रोग और संक्रमण से लोगों की जान जा रही है। इससे पहले सामान्य रोग से लोगों की जान नहीं जाती थी। 2019 में लांसेट में बेअसर हो रही दवाओं को लेकर एक रिपोर्ट छपी थी। इसमें वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के रिसर्च के हवाले से बताया गया था कि दक्षिण एशिया के देशों में 2019 में एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) से 389,000 से अधिक लोगों की जान गई। इस बारे में आईसीएमआर में सीनियर साइंटिस्ट रह चुकी डॉक्टर कामिनी वालिया ने कहा था कि एएमआर एक ग्लोबल इमरजेंसी है। डॉ. वालिया का कहना था कि बैक्टीरिया का प्रतिरोधी बन जाना एक ऐसी ग्लोबल हेल्थ इमर्जेंसी बन चुकी है जिसे दुनिया की कोई भी सरकार अनदेखा नहीं कर सकती। उनका कहना था कि हमें एंटीबायोटिक के यूज की मॉनिटरिंग करनी होगी। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि वे दवाएं भविष्य के लिए प्रभावी रहें।

47% दवाओं को मंजूरी ही नहीं
लांसेट मैगजीन में रीजनल हेल्थ-साउथ ईस्ट एशिया’ में में हाल ही में एंटीबायोटिक को लेकर चिंताजनक सर्वे आया है। इसमें बताया गया कि भारत के प्राइवेट हेल्थ सेक्टर में साल 2019 में इस्तेमाल की गईं 47% से अधिक एंटीबायोटिक दवाओं के लिए केंद्रीय औषधि नियंत्रक की मंजूरी नहीं ली गई थी। स्टडी के अनुसार देश में 85 से 90% प्रतिशत तक एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। रिसर्च के अनुसार पिछले अनुमानों की तुलना में एंटीबायोटिक दवाओं की खपत की दर में कमी आई है। हालांकि, बैक्टीरिया से होने वाले विभिन्न रोगों से व्यापक रूप से लड़ने वाली एंटीबायोटिक दवाओं का अपेक्षाकृत काफी अधिक इस्तेमाल हुआ है। रिसर्च के रिजल्ट से पता चलता है कि 2019 में वयस्कों के बीच डिफाइन्ड डेली डोज (प्रतिदिन डोज की दर) 5,07.1 करोड़ रही।

कोरोना काल में सबसे अधिक एजिथ्रोमाइसिन
स्टडी में सामने आया कि कोरोना काल में देश में लोगों ने जमकर एजिथ्रोमाइसिन का यूज किया। रिपोर्ट के प्रमुख रिसर्चर डॉ मुहम्मद एस हाफी ने कहा कि भारत एजिथ्रोमाइसिन समेत बड़े पैमाने पर एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। उनका कहना था कि एजिथ्रोमाइसिन जैसे एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किफायत के साथ किया जाना चाहिए। आमतौर पर एजिथ्रोमाइसिन का इस्तेमाल बैक्टीरियल इंफेक्शन के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल न्यूमोनिया, कान, फेफेड़े, साइनस, स्किन, गले के इंफेक्शन को खत्म करने के लिए किया जाता है। कोरोना काल के दौरान कई राज्य सरकारों ने कोविड के इलाज के प्रोटोकॉल में एजिथ्रोमाइसिन एंटीबायोटिक दवा को रखा था। इस वजह से इसका खूब इस्तेमाल हुआ। स्थिति यह थी कि लोगों ने कोरोना संक्रमित होने के बाद डॉक्टरों से बिना पूछे भी खुद से ही एजिथ्रोमाइसिन खरीद-खरीद कर खाई।

एंटीबायोटिक कैसे करता है काम
एंटीबायोटिक दवा सामान्य रूप से बैक्टीरिया से लड़ती है। इनका काम शरीर में नुकसानदायक बैक्टीरिया को खत्म करना होता है लेकिन अनावश्यक रूप से लेने पर यह दवाएं शरीर के फायदेमंद बैक्टीरिया को भी खत्म कर देती हैं। इससे कई तरह की परेशानियां हो जाती हैं। दूसरी तरफ बैक्टिरियां खुद को खत्म होने से रोकने के लिए खूब जोर लगाते हैं। ऐसे में वे जीन की बनावट यानी अपनी मूल स्थिति में बदलाव कर के नए तरह के प्रोटीन बनाने लगते हैं। बैक्टीरिया में इतनी क्षमता होती है कि वे कोशिका की दीवार की मरम्मत कर सकते हैं। साथ ही कोशिका की दीवार के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच बना सकते हैं कि दवा उसमें प्रवेश ही ना कर सके। इस स्थिति में जब किसी दवा को बार-बार खाया जाता है तो बैक्टीरिया पहचानने लगते हैं कि दवा कितनी देर तक असरदार रह सकती है। ऐसे में वे उस प्रोटीन का बनना रोक देते हैं और नए प्रोटीन बना कर खुद को बचाए रखने में रखने में कामयाब होते हैं।

खुद ना बनें डॉक्टर, सलाह जरूर लें
किसी भी सूरत में खुद से डॉक्टर बनने का प्रयास ना करें। एंटीबायोटिक्स तभी लें, जब डॉक्टर ने उसे लेने की सलाह दी हो। बीमारी में रोजाना नियमित समय पर गोलियां लें और कोर्स जरूर पूरा करें। अगर कोर्स पूरा करने के बाद एंटीबायोटिक गोलियां बच गई हों, तो उन्हें वापस कर दें या फेंक दें। बिना डॉक्टर के कहे एंटीबायोटिक खुद से कभी न लें, भले ही रोग के लक्षण एक समान हों। इसके अलावा डॉक्टर पर कभी एंटीबायोटिक्स देने के लिए दबाव न बनाएं, डॉक्टर को जरूरी लगेगा तो वह खुद ही आपको एंटीबायोटिक लिख देंगे।

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