राष्ट्रीय शिक्षक दिवस है यानी प्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं महामहिम राष्ट्रपति ड़ॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन। डॉ. राधाकृष्णन ने मानव–मूल्यों पर आधारित शिक्षा पद्धति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आंकड़ों के ज्ञानार्जन और दूसरी विधाओं में महारत हासिल करने से पहले किशोरों और युवाओं को स्वयं के भीतर आत्मविश्वास को जागृत करने का प्रशिक्षण दिया जाना बेहद जरूरी है।
आज का समाज मानवीय मूल्यों के हर्स के दौर से गुजर रहा है। इसलिए आज शिक्षा को कहीं ज्यादा मूल्य आधारित बनाना जरूरी हो गया है। अजीब विरोधाभास है कि हम लोग ज्ञान के क्षेत्र में जैसे–जैसे आगे बढ़ रहे हैं‚ नैतिकता के क्षेत्र में उतने ही पीछे होते जा रहे हैं। फलस्वरूप रोजमर्रा की जिंदगी में हमें वर्तमान परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने में अनेक दिक्कतों से गुजरना पड़ता है। अच्छी बात है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति‚ २०२० में इस विरोधाभास को समझने की कोशिश की गई है। डॉ. राधाकृष्णन के बताए रास्ते आज के समय में और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं। डॉ. राधाकृष्णन कहते हैं कि जब मनुष्य स्वतंत्रता में पूर्णता पाने के साथ सबको तरजीह देते हुए एक–दूसरे के विकास में सहयोग करते हुए जीवन–पथ पर अग्रसर होता है‚ तभी उसके द्वारा अर्जित शिक्षा सार्थक होती है। शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी बाधाएं चाहे जितनी जटिल हों‚ उनका पुख्ता समाधान शिक्षक‚ अभिभावक और सरकार के आपसी विश्वास और दीर्घकालीन प्रयत्नों से ही संभव है। इस संबंध में डॉ. राधाकृष्णन की राय है कि एक आत्म–अनुशासित और आध्यात्मिक शिक्षक ही विद्यार्थियों को अनुशासन के मार्ग पर चलने को मोटिवेट कर सकता है क्योंकि शिक्षक का व्यक्तित्व और कृतित्व स्टूडेंट्स के लिए प्रेरणास्रोत होता है। सही मायने में शिक्षक तो वह है‚ जो विद्यार्थियों को सार्थक जीवन जीने की कला सिखाए।
शब्दों की जानकारी हासिल करने‚ गुणा–भाग सीख लेने का मतलब साक्षर होना है‚ न कि शिक्षित होना। शिक्षा का वास्तविक अर्थ छात्रों के भीतर शिष्टाचार‚ रचनाधर्मिता व आंतरिक क्षमताओं का विकास करना है। सच्चा शिक्षक वह है जो अपने शिष्यों को करुणा‚ प्रेम‚ सहनशीलता‚ क्षमा और सौहार्द जैसे उदात्त मानवीय मूल्यों से संस्कारित करे ताकि वे भावी जीवन में चुनौतियों का सामना सहजता से कर सकें। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के आंतरिक सुणों की बाहर की ओर अभिव्यक्ति है। शिक्षा ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान और कौशल‚ दोनों प्रदान करती है। शिक्षक अपने देश का भविष्य भी तय करता है‚ इसलिए शिक्षक का कार्य सिर्फ ज्ञान देना ही नहीं है‚ बल्कि देश के भावी युवा–कर्णधारों के भीतर बौद्धिक चेतना और लोकतांत्रिक भावना जागृत करना भी है। शिक्षक दिवस देश के लाखों शिक्षण संस्थानों में धूमधाम से मनाया जाता है‚ लेकिन क्या डॉ. राधाकृष्णन की कल्पना के मुताबिक आज भी समाज में शिक्षकों को हम वह मान–सम्मान दे पाए हैं‚ जिसके असलियत में वे हकदार हैं। हम इंजीनियरों‚ डॉक्टरों‚ आईएएस‚ आईपीएस‚ नेताओं‚ उद्योगपतियों‚ साधु–संतों और फिल्मी कलाकारों से मिलकर जितना गद्गद् होते हैं‚ उनके साथ सेल्फी लेने लगते हैं‚ क्या ऐसा तब भी महसूस करते हैं‚ जब अपने किसी पुराने शिक्षक से मिलते हैं। जाहिर है‚ भारतीय जनमानस और सरकार को शिक्षकों की महती भूमिका का नये सिरे से मूल्यांकन करना होगा। शिक्षकों को भी आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है। डॉ. राधाकृष्णन ने कहा है कि कोई भी शिक्षक अपने छात्रों को तब तक सीखने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर सकता जब तक खुद ज्ञान की सीमाओं का विस्तार करने में रु चि नहीं रखता। छात्रों को पढ़ाना खुद के पढ़ने जैसा ही है। संचार–क्रांति के इस दौर में युवा पीढ़ी को अपने ऐकेडमिक सेशन से संबंधित सिलेबस‚ सब्जेक्ट के नोट्स और अन्य सहायक सामग्री आसानी से मिल जाती हैं। कुछ दुर्लभ है तो वह है–युवाओं के समग्र व्यक्तित्व–विकास की संभावना।
पढ़ाई–लिखाई‚ भाषा–शैली‚ इतिहास–भूगोल और गणित–विज्ञान का अध्ययन तभी सार्थक है‚ जब इन विषयों का ज्ञान नौजवानों में मानवीय मूल्य विकसित करे। चीन के बाद भारत की युवा आबादी मोबाइल–इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। चिंता की बात यह है कि स्कूल की पढ़ाई से फ्री होते ही बच्चे और युवा मोबाइल‚ टीवी‚ यूट्यूब और फेसबुक में लीन हो जाते हैं। जब ये साधन नहीं थे‚ तब शिक्षा ग्रहण करने वाले नौजवानों का बड़ा वर्ग स्वतः ही किताबों से जुड़ा रहता था। फलस्वरूप उनमें स्वाध्याय की प्रवृत्ति तो विकसित होती ही थी‚ जमीन से जुड़े संस्कार भी पनपते थे। इंटरनेट पर विद्यार्थियों के लिए क्या उपयोगी है क्या अनुपयोगी‚ यह तय करने का विवेक एक संवेदनशील‚ कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक ही जागृत कर सकता है। डॉ. राधाकृष्णन का यह भी कहना है कि शिक्षक कभी रिटायर नहीं होता‚ वो अपने चा







