मध्य यूरोपीय देश पोलैंड़ की स्वास्थ्य मंत्री मार्टा टेमिडो की पेशेवर ईमानदारी के चर्चे हर किसी की जुबां पर हैं। गर्भवती भारतीय महिला को देश के एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में भेजे जाने और इस दौरान महिला का निधन होने की घटना के बाद देश की स्वास्थ्य मंत्री ने पद से इस्तीफा दे दिया। ॥ स्वाभाविक रूप से आप कहेंगे तो इसमें नया क्या हैॽ यह तो होता रहता है। भारत में नहीं लेकिन विदेशी मुल्कों में राजनेता ईमानदारी और नैतिकता के मामले में अव्वल हैं। हां‚ भारत में ऐसा कुछ देखना या सुनना विरले ही नसीब होता है। पौलैंड़ जो क्षेत्रफल में मध्य प्रदेश जितना बड़़ा है‚ राजनीतिक शुचिता के मामले में वह हमसे कोसों आगे है। किसी गर्भवती महिला को अस्पताल में जगह नहीं मिलने की वजह से उसकी मौत की जिम्मेदार खुद को मानना‚ वाकई बड़़ी बात है। यह किसी भी नेता या शख्सियत के लिए खासा कठिन होता है कि वह दूसरों की गलती का ठीकरा अपने पर ले। मार्टा टेमिड़ो की इस संवेदनशीलता ने विश्व भर में उनकी छवि को ज्यादा विराट बना दिया। हालांकि ऐसी ही नैतिकता का उदाहरण हमारे नेताओं ने भी दिया है।
अलबत्ता उनका कालखंड़ करीब ५० वर्ष पीछे का है। देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने तो १९५६ में तीन महीने के अंतराल पर दो रेल हादसों की वजह से रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। पहली दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए जब उन्होंने इस्तीफा दिया तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उसे अस्वीकार कर दिया‚ मगर तीन महीने के बाद घटित दूसरे हादसे के बाद जब शास्त्री जी ने त्यागपत्र दिया तो प्रधानमंत्री ने कहा कि वह इस्तीफा इसलिए स्वीकार कर रहे हैं ताकि यह एक नजीर बने इसलिए नहीं कि हादसे के लिए किसी भी रूप में शास्त्री जिम्मेदार हैं। इनके अलावा उस दौरान देश के चौथे वित्त मंत्री टी.के. कृष्णनामचारी ने मुंद्रा घोटाला (१९५८)‚ ९० के दशक में लाल कृष्ण आड़वाणी और शरद यादव ने जैन हवाला कांड़ में कथित तौर पर नाम आने के बाद इस्तीफा दिया था। वैसे कोरोना के दौरान देशवासियों ने बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे़ की संवेदनहीनता के अलावा देश भर के ज्यादातर अस्पतालों की निरंकुशता और निष्ठुरता को देखा और महसूस किया। खैर‚ राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही तो स्वाभाविक रूप से वैसे नेता भी अब सियासत में नहीं हैं। ‘नैतिकता’ तो उनके शब्दकोष से करीब–करीब गायब हो चुका है।







