सनातन धर्म में किसी भी शुभ मुहूर्त का प्रारंभ गणेश वंदना से होता है। गणेश जी की प्रतिष्ठा संपूर्ण भारत में समान रूप से व्याप्त है। आम तौर पर एक कहावत भी प्रचलित है–आओ‚ अमुक कार्य का श्रीगणेश करें यानी कार्य का शुभारंभ करें। सनातन संस्कृति के देवताओं की फेहरिस्त में गणेश जी एकमात्र ऐसे देव हैं‚ जिनके बारे किंवदंती प्रचलित है कि उन्होंने अपने ज्ञान के आधार पर स्वयं को पूजा–अर्चना का प्रथम अधिकारी बनाया। धर्मशास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने कार्तिकेय और गणेश के बीच एक प्रतियोगिता आयोजित की–कि जो अपने वाहन पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वही प्रथम पूजनीय होगा।
गणेश जी ने अपने पिता शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। कार्तिकेय अपने मयूर वाहन पर सवार होकर पृथ्वी का चक्कर लगाकर लौटे। किंतु देवाधिदेव महादेव ने कहा कि गणेश तुमसे पहले ब्रह्मांड की परिक्रमा कर चुका है‚ माता–पिता की परिक्रमा करके उसने साबित कर दिया कि माता–पिता ब्रह्मांड से भी बढ़कर हैं। वस्तुतः गणेश जी ने संसार को इस तथ्य से अवगत कराया कि माता–पिता ही हमारे सर्वस्व हैं। और माता–पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
धर्म के दस लक्षणों में बुद्धि का सर्वाधिक महत्व है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है–यस्य बुद्धिर्बलम तस्य‚ निर्बुद्धेः तु कुतः बलम यानी जिसके पास बुद्धि है‚ वही बलशाली है क्योंकि बुद्धि के बिना शारीरिक बल भी महत्वहीन हो जाता है। गौरतलब है कि सनातन संस्कृति में बुद्धि के प्रतीक एवं अधिष्ठाता गणेश जी को माना गया है। गणेश जी के सिर को गज यानी हाथी के रूप में प्रदर्शित करना मेधा शक्ति का परिचायक है। दरअसल‚ हाथी के बड़े आकार का सिर विवेक और प्रज्ञाशक्ति के अद्भुत समन्वय को दर्शाता है। असलियत में‚ बुद्धि तो हरेक के पास होती है‚ किंतु विवेक के बिना बुद्धि विध्वंसात्मक गतिविधियों की ओर उन्मुख हो जाती है‚ जबकि गणेश जी तो स्वयं विघ्नहर्ता और किसी भी किसी भी शुभ कार्य के मार्ग में आने वाले अवरोधों के उन्मूलन करने वाले देवता हैं। इसलिए सनातन धर्म की परंपरा में प्रत्येक शुभ कार्य का प्रारंभ गणेश वंदना से किया जाता है। गणपति बप्पा का विशाल उदर करु णा‚ उदारता और पूर्ण स्वीकारोक्ति का द्योतक है। असल में जिस समाज में‚ जिस परिवेश में करु णा‚ उदारता और हरेक परिस्थिति के प्रति सहज स्वीकृति की भावना निर्मित होने लगती है‚ वहां श्रद्धा‚ आस्था और सत्य का स्वाभाविक प्रकटीकरण होने लगता है।
महाराष्ट्र में गणेश जी को मंगलकारी देवता के रूप में पूजा जाता है। गौरतलब है कि लोकमान्य तिलक ने स्वाधीनता आंदोलन में चेतना जागृत करने के उद्देश्य से १८९३ में गणेशोत्सव का आगाज किया। तिलक ने भारतीय जनमानस की गणपति बप्पा के प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति को सांस्कृतिक महोत्सव से संयुक्त कर दिया। लोगों की बौद्धिक क्षमता का इस्तेमाल रचनात्मकता की ओर प्रवृत्त कर राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ऊर्जा और >ंचाई प्रदान की। गणेश जी को एकदंत भी कहा जाता है‚ जो निश्चित तौर पर पूर्ण एकाग्रता का प्रतीक है‚ जबकि उनके हाथों में विराजमान अंकुश पूर्ण सजगता का परिचायक है। गणेश जी दूसरे कर में जो पाश धारण किए हुए हैं‚ वह प्रतीक है आत्मनियंत्रण का। दरअसल‚ जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिकता के मार्ग पर अग्रसर होता है‚ तो उसके प्रारब्धरूपी विकर्म और पुरातन संस्कारों का आवरण बिखरने लगता है‚ धीरे–धीरे उसकी प्राणदायिनी शक्ति और आत्मचेतना संपूर्ण शरीर में अपना विस्तार करती है‚ उस स्थिति में आध्यात्मिक ऊर्जा मुक्त होकर एक फैलाव ग्रहण करती है‚ उस विशेष अवस्था में यदि व्यक्ति विवेक और आत्म संयम से स्वयं को नियंत्रित न कर पाए तो वह विध्वंस और पतन का कारण भी बन सकती है।
गणेश जी का वाहन चूहा भी सिंबोलिक है। दरअसल‚ चूहा उन षड़विकारों को आसानी से कुतर देता है‚ जो आध्यात्मिक प्रगति के पथ पर बाधा बनकर आते हैं। गौरतलब है कि गणेशसुभाषितानि में गणपति का आवाह्न किया गया है–‘हे विघ्न–विनाशक‚ बुद्धिदायक हमारे मार्ग में आने वाले सभी अवरोधों को दूर कर हमें ज्ञान के आलोक से आलोकित करो‚ ज्ञान की अग्नि से हमारे समस्त प्रकार के बंधनों‚ अंधविश्वासों और विकर्मों को तिरोहित कर दो। धर्मशास्त्रों में ऐसा वर्णन भी मिलता है कि भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के दर्शन से झूठा कलंक लगने की संभावना रहती है। जिस तरह योगेश्वर श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि चुराने का आरोप लगा था लेकिन सनातन संस्कृति की विशेषता यह भी है कि तमाम तरह के पापों से मुक्त होने के उपाय भी बताए गए हैं। निम्न मंत्र का पाठ कर लेने से भी दोष निवारण हो जाता है–
सिंह प्रसेनम अवधीत‚ सिंहो जाम्बवता संतः
सुकुमार मा रोदीस्तव ह्येष स्वतंत्रः
कहने का अभिप्राय यह है कि यदि जाने–अनजाने चंद्रमा के दर्शन हो भी जाएं तो गणेश स्तुति करने एवं कृष्ण–स्यमंतक को पढ़ने और श्रवण करने से व्यक्ति दोषमुक्त हो जाता है‚ और मान्यता यह भी है कि हर दूज के चंद्र दर्शन से भी व्यक्ति दोषमुक्त हो जाता है।
जब हम ‘भारत के लोग’ अपना नया स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं‚ बाबा नागार्जुन की एक प्रसिद्ध कविता का वह सवाल पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है‚ जिसमें पहले वे पूछते ैहैंः किसकी है जनवरी‚ किसका अगस्त हैॽ बाबा अपने सवाल को कौन त्रस्त‚ कौन पस्त और कौन मस्त तक भी ले जाते हैं‚ तो लगता है कि उन्हें आज की तारीख में हमारे सामने उपस्थित विकट हालात का पहले से इल्म था।
इन हालात की विडम्बना देखिएः एक ओर तो अब हमारे नेता देश को समता‚ स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित संपूर्ण प्रभुत्व–संपन्न‚ समाजवादी‚ पंथनिरपेक्ष‚ लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का २६ नवम्बर‚ १९४९ को अंगीकृत‚ अधिनियमित और आत्माÌपत संकल्प को संविधान की पोथियों में भी चैन से नहीं रहने देना चाहते; और दूसरी ओर गैर–बराबरी का भस्मासुर न सिर्फ हमारी बल्कि दुनिया भर की जनतांत्रिक शक्तियों के सिर पर अपना हाथ रखकर उन्हें धमकाने पर आमादा है कि लोकतंत्र की अपनी परिकल्पनाओं को लेकर किसी मुगालते में न रहें।
अमीरी का जाया यह असुर उनके सारे के सारे मूल्यों को तहस–नहस करने का मंसूबा लिए उन्मत्त होकर आगे बढ़ा आ रहा है‚ और आरजू या मिनती कुछ भी सुनने के मूड में नहीं है। अभी जब हम अपना पिछला गणतंत्र दिवस मनाने वाले थे‚ गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने का दावा करने वाले ऑक्सफेम इंटरनेशनल ने एक सर्वेक्षण में बताया गया था कि आर्थिक विषमता की‚ जो सभी तरह की स्वतंत्रताओं और इंसाफों की साझा दुश्मन है‚ दुनिया भर में ऐसी पौ–बारह हो गई है कि पिछले साल बढ़ी ७६२ अरब डॉलर की संपत्ति का ८२ फीसदी हिस्सा एक प्रतिशत धनकुबेरों के कब्जे में चला गया है‚ अधिसंख्य आबादी को जस की तस बदहाल रखते हुए। इस संपत्ति के रूप में धनकुबेरों ने गरीबी को सात बार सारी दुनिया से खत्म कर सकने का सार्मथ्य इस एक साल में ही अपनी मुट्ठी में कर लिया तो क्या आश्चर्य कि गरीबों के लिए ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ का अर्थ एक संचार सेवाप्रदाता कंपनी के झांसे का शिकार होना भर हो गया है। तिस पर अनर्थ यह कि ५० प्रतिशत अत्यंत गरीब आबादी को आर्थिक वृद्धि में कतई कोई हिस्सा नहीं मिल पाया है‚ जबकि अरबपतियों की संख्या बढ़कर २‚०४३ हो गई है। इनमें ९० फीसदी पुरु ष हैं यानी यह आर्थिक ही नहीं लैंगिक असमानता का भी मामला है‚ पितृसत्ता के नये सिरे से मजबूत होने का भी। बताने की जरूरत नहीं कि यह अनर्थ भूमंडलीकरण की वर्चस्ववादी नीतियों से पोषित अर्थ नीति का अदना–सा ‘करिश्मा’ है‚ और यह गरीबों के ही नहीं‚ बढ़ते धनकुबेरों के प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी हादसे से कम नहीं है क्योंकि इन कुबेरों ने यह बढ़त कठिन परिश्रम और नवाचार से नहीं‚ बल्कि संरक्षण‚ एकाधिकार‚ विरासत और सरकारों के साथ साठगांठ के बूते कर चोरी‚ श्रमिकों के अधिकारों के हनन और ऑटोमेशन की राह चलकर स्पर्धा का बेहद अनैतिक माहौल बनाकर पाई है। निश्चित ही यह इस अर्थनी ति की निष्फलता का द्योतक है क्योंकि इन कुबेरों द्वारा संपत्ति में ढाल ली गई पूंजी अंततः अर्थ तंत्र से बाहर होकर पूरी तरह अनुत्पादक हो जानी है‚ और उसे इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ना कि कई अरब गरीब आबादी बेहद खतरनाक परिस्थितियों में भी ज्यादा देर तक काम करने और अधिकारों के बिना गुजर–बसर करने को मजबूर है।
अपने देश की बात करें तो यहां २०१७ में उत्पन्न कुल संपत्ति का ७३ प्रतिशत हिस्सा ही एक प्रतिशत सबसे अमीरों के नाम रहा है। यह विश्वव्यापी औसत ८२ से कम है‚ लेकिन देश की जिस अर्थव्यवस्था के अभी हाल तक ‘दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था’ होने का दावा किया जाता रहा है‚ उसमें अमीरों द्वारा सब–कुछ अपने कब्जे में करते जाने की रफ्तार इतनी तेज हो गई है कि २०१६ में ५८ प्रतिशत संपत्ति के स्वामी एक प्रतिशत अमीरों के कब्जे में अब ७३ प्रतिशत संपत्ति है यानी २०१७ में उनकी कुल संपत्ति में २०.७ लाख करोड़ की बढ़ोतरी हुई‚ जो उसके पिछले साल ४.८९ लाख करोड़ रु पये ही थी। चूंकि हमने बेरोकटोक भूमंडलीकरण को सिर–माथे लेकर अनेकानेक विदेशी कंपनियों को देश में कमाया मुनाफा देश से बाहर ले जाने की छूट भी दे रखी है‚ इसलिए विदेशी अरबपतियों को खरबपति बनाने में भी हमारा कुछ कम योगदान नहीं है। ऐसे में यह समझने के लिए अर्थशास्त्र की बारीकियों में बहुत गहरे पैठने की जरूरत नहीं कि यह अमीरी ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक विकास का फायदा देकर यानी ‘सबका साथ‚ सबका विकास’ के नारे को सदाशयता से जमीन पर उतारकर संभव ही नहीं थी।
इसलिए विकास के सारे लाभों को लगातार कुछ ही लोगों तक सीमित रखकर हासिल की गई है। तथाकथित आर्थिक सुधारों के उस मानवीय चेहरे पर अमानवीयतापूर्वक तेजाब डालकर‚ जिसकी चर्चा २४ जुलाई‚ १९९१ को देश में भूमंडलीकरण की नीतियों का आगाज करते हुए उसके सबसे बड़े पैरोकार तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने की थी।
गैर–बराबरी के ये आंकड़े हमारे लिए इस लिहाज से ज्यादा चिंतनीय हैं कि ये हमारे दुनिया का सबसे ‘महान’ जनतंत्र होने के दावे की कनपटी पर किसी करारे थप्पड़ से कम नहीं हैं। इसलिए और भी कि जहां कई अन्य छोटे–बड़े देशों ने भूमंडलीकरण के अनर्थों को पहचानना और उनसे निपटने के प्रतिरक्षात्मक उपाय करना शुरू कर दिया है‚ हमारे सत्ताधीश कतई किसी पुनर्विचार को राजी नहीं हैं। उन्हें इस सवाल से कतई कोई उलझन नहीं होती कि अगर इस जनतंत्र के सात दशकों का सबसे बड़ा हासिल यह एक प्रतिशत की अमीरी ही है‚ तो बाकी निन्यानवे प्रतिशत के लिए इसके मायने क्या हैंॽ
बड़े–बड़े परिवर्तनों के दावे करके आई नरेन्द्र मोदी सरकार को भी अपने चार सालों में इस अनर्थ नीति को बदलना गंवारा नहीं है। भले ही यह नीति कम से कम इस अर्थ में तो भारत के संविधान की घोर विरोधी है कि यह किसी भी स्तर पर उसके समता के मूल्य की प्रतिष्ठा नहीं करती और उसके संकल्पों के उलट आर्थिक ही नहीं‚ प्राकृतिक संसाधनों के भी अंधाधुंध संकेंद्रण पर जोर देती है। यह सरकार इस सीधे सवाल का सामना भी नहीं करती कि किसी एक व्यक्ति के अमीर बनाने के लिए कितनी बड़ी जनसंख्या को गरीबी के हवाले करना पड़ता है‚ और क्यों हमें ‘हृदयहीन’ पूंजी को ब्रह्म और ‘श्रम के शोषक’ मुनाफे को मोक्ष मानकर ‘सह्रदय’ मनुष्य को संसाधन की तरह संचालित करने वाली अर्थव्यवस्था के लिए अनंतकाल तक अपनी सारी लोकतांत्रिक–सामाजिक नैतिकताओं‚ गुणों और मूल्यों की बलि देते रहना चाहिएॽ
एक ओर इन सवालों के जवाब नहीं आ रहे और दूसरी ओर इन्हें पूछने वाले हकलाने लग गए हैं‚ तो साफ है कि हमारे लोकतंत्र में जनतांत्रिक विचारों की कमी खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है। यह कमी ऐसे वक्त में कोढ़ में खाज से कम नहीं है कि गरीबों को और गरीब और अमीरों को और अमीर बनाने वाली आर्थिक नीति के करिश्मे अब किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। वे सारे लाभों को अमीर देशों के लिए सुरक्षित कर उन्हें और अमीर जबकि गरीब देशों को और गरीब बना रही हैं। एक प्रतिशत लोगों की अमीरी की यह उड़ान हमें कितनी महंगी पड़ने वाली है‚ जानना हो तो बताइए कि गरीबों के लिए इस गैरबराबरी से उबरने की कल्पना भी दुष्कर हो जाएगी तो वे क्या करेंगेॽ







