देश में बाढ़ महोत्सव सा कुछ चल रहा है। ओडि़सा में बाढ़‚ असम में बाढ़‚ मुंबई दिल्ली में लोकल लेवल की बाढ़‚ बाढ़–ही–बाढ़ देख तो लें‚ नौजवान बाढ़ देखने जा रहे हैं‚ और बाढ़ के साथ सेल्फी ले रहे हैं। कई नौजवानों का एक ही काम है कि हर आइटम के साथ सेल्फी लें॥। बाढ़ हर साल आती है एक सी कहानी है। बाढ़ तो दूर की बात है दिल्ली में कई महत्वपूर्ण सड़़कें ऐसी हैं‚ जो एक घंटे की बारिश में बिल्कुल डूब जाती हैं और छह छह फुट पानी में कइयों को डुबाने का इंतजाम कर देती हैं। बरसों से योजनाएं बन रही हैं‚ योजनाएं सफल ना हो पा रही हैं‚ बाढ़ तो हर साल सफल हो ही रही है। अब बाढ़ को महोत्सव का दर्जा दिया जाना चाहिए‚ जिस मसले का हल ना ढूंढा जा सकता हो और जो मसला नियमित हो‚ उसे महोत्सव का दर्जा मिल ही जाना चाहिए। बाढ़ महोत्सव के तहत बाढ़ टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकता है। देशी–विदेशी पर्यटकों को दिल्ली की उन सड़कों पर लाया जानना चाहिए‚ जो एक घंटे की बारिश में डूब जाती हैं–उन सड़कों को वेनिस इन दिल्ली–बताया जाता है कि वेनिस में परिवहन का काम नावों के जरिये होता है। हमारी दिल्ली में ऐसे बहुत वेनिस तैयार हो जाते हैं। वेनिस इन दिल्ली नाम से इश्तिहार कैंपेन चलाया जा सकता है। जो समस्या हल ना हो पा रही हो‚ उसे महोत्सव घोषित कर दिया जाए‚ तो कुछ कमाई का जुगाड़ लग सकता है।
बाढ़ महोत्सव में पर्यटकों को हेलीकाप्टर दर्शन कराया जा सकता है‚ हेलीकाप्टर से डूबे हुए शहर को देखें‚ तमाम मंत्री मुख्यमंत्री बरसों से बाढ़ की समस्या को इस तरह से खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे हेलीकाप्टर लेकर बाढ़ग्रस्त इलाकों को दौरा करते हैं। पर्यटकों को भी दौरा कराया जाए‚ कुछ कमाई हो सकती है। बाढ़ महोत्सव में भीड़ बढ़ने लगेगी‚ तो कोई अभिनेत्री ऐसी घोषणा कर सकती है कि वह फलां बाढ़ग्रस्त इलाके में इतने बजे वस्त्रमुक्त होंगी। भारत में वस्त्रहीनता दो वजहों से आती है। एक तो गरीबी की वजह से और दूसरी छिछोरगर्दी की वजह से‚ कहना अनावश्यक है छिछोरगर्दी का कमाऊ बाजार बहुत बड़ा और मुनाफेवाला है।
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